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सोमवार, 11 जुलाई 2011

फेसबुकनामा

कम हो गये चार आने

चवन्नी की विदाई का वक्त है पूरे मुल्क के साथ कानपुर का दिल भी बुझा-बुझा सा है. क्योंकि ये वो अमीर शहर है जिसने हमेशा चवन्नी को भी सर आंखों पर उठाया है. दस बीस बरस में चवन्नी भी उसके ज़हन से गैर हाजिर हो जाएगी. वो चवन्नी जो कभी कानपुर की ज़बान और बयान के आगे आगे चलती थी.
अगर किन्ही हजऱत में मर्दानगी कम है तो उनके लिए कहा जाता था कि 'अमां उनकी चवन्नी कम है'. अगर कोई मोहतरम अक्ल से पैदल हैं तो उनके लिए गढ़ा गया जुमला था कि 'अमां फलां साहब चवन्नी गिराए घूमते हैं.' और अगर कोई कंजूस है तो उसके लिए- 'अमां छोडि़ए वो तो रूपए में पांच चवन्नी बनाते हैं.' हालांकि के बावजूद चवन्नी के फेयरवेल के दिन जो मुहावरा मैने सबसे ज्यादा सुना वो'चवन्नीछाप' का था, जिसे सुनकर शायद चवन्नी भी टूटे हुए दिल वाली हो जाती होगी.
जहां तक मेरी जानकारी है ये मुहावरा 80 के दशक में कानपुर में उपजा और बाद में पूरे हिन्दोस्तान में बीमारी की तरह फैला. होता यूं था कि कानपुर से एक दौर में नौटंकी की पार्टियां पूरे देश में जाती थीं. इनमें उत्तेजक प्रसंग आने पर दर्शक मंच की तरफ चवन्नियां उछालते थे. बाद में ये चलन सिनेमा हाल तक जा पहुंचा. इन्ही लोगों को चवन्नी छाप कहा जाता था. मुहावरा पूरी तरह इंसानी मिजाज़ बताने के लिए था लेकिन बाद में चवन्नी का मिजाज़ भी इसी से तय होने लगा. दुनिया ये भूल गई कि इसी चवन्नी से बचपन अपने बेशुमार ख्वाब खरीद लेता था.
बहुत पुरानी बात नहीं है जब पतंगों की कीमत चवन्नी हुआ करती थी. दो चवन्नी मिलाकर मै और मेरा भाई सुपर कमांडो ध्रुव नागराज या डोगा की एक कामिक्स किराए पर लाते थे,जिसे पढ़ते पढ़ते ही मै निराला, मीर और तहलका तक पहुंचा. 25 पैसे में इनाम खोलने का एक कूपन मिलता था जिसमें कभी कभी घड़ी और मिथुन या धरमिंदर का बड़ा पोस्टर तक हाथ लग जाता था. शक्तिमान का स्टिकर भी चवन्नी में ही था. मांएं अपने बच्चों को नजऱ और हाय से बचाने के लिए चवन्नी की शरण में ही जाती थी. फिर बच्चे अपनी करधनी और गले से चवन्नी लटकाए घूमते थे. यही नहीं आंख दुखने पर मां जो देसी ट्यूब (जिसे आम जुबान में गल्ला कहते हैं,) बच्चे के लगाती थी वो भी चवन्नी का मिलता था. इसके साथ ही संतरे की वो सदाबहार टाफियां भी याद आती हैं जो मेरे पूरे बचपन भर 'चवन्नी की दो वाली' संज्ञा से ही नवाज़ी जाती रहीं. (अंग्रेजी में मजबूत कुछ बच्चे इन्हे आरेंज वाली टाफी भी कहते थे). इसी तरह कुछ टाफियों का नाम 'चवन्नी वाली' भी था. संतरे की फांक जैसा लैमनजूस या लैमनचूस (पता नहीं इसका सही नाम क्या होता है,) भी चवन्नी का ही मिल जाता था.
बचपने का रिजर्व बैंक यानि गुल्लक को तोड़कर अपनी अमीरी दिखाने के लिए जब सिक्कों की कुतुब मीनार बनाई जाती थी तो उसकी सबसे ऊपरी मंजिल भी चवन्नी से ही बनती थी. ये भी कहा जाता था कि चवन्नी को अगर कड़वे तेल में डुबो कर रेलगाड़ी के नीचे रख दो तो वो चुम्बक बन जाती है, कई दफा ये प्रयोग मैने भी सेन्ट्रल स्टेशन और गोविन्दपुरी की पटरियों पर आजमाया लेकिन सफल नहीं रहा. चवन्नी को उंगली की चोट से देर तक घुमाने की प्रतियोगिताएं भी खूब होती थी जिसमें इनाम वही चवन्नी होती थी. स्कूल के बाहर काला वाला तेज़ाब मिला हुआ चूरन भी चवन्नी में एक पुडिय़ा मिल जाता था जो कि जबान पर छाला निकालने के लिए काफी होता था. इसी तरह आइसक्रीम के ठेलों पर डिस्को नाम की एक आकर्षक चीज (पन्नी में भरा ठंडा रंगीन मीठा पेय) का दाम भी 25 पैसे था.
लेकिन फिर एक वक्त और भी आया जब इसी चवन्नी के दिन ऐसे बदले कि सफर पर जाते वक्त ढूढ ढूढ के चवन्नियां रखी जाने लगी. भिखारियों को देने के लिए. और भिखारी भी इन्हे, देने वालों को चवन्नीछाप कहके वापस कर देने लगे. बच्चों ने चवन्नी लेकर दुकान जाना बंद कर दिया और अगर कोई बच्चा पहुंच गया भी तो दुकानदार ने बनियागिरी दिखाते हुए उसका दिल तोड़कर उसे ये कहते हुए लौटा दिया कि चवन्नी नही चलेगी. जबकि मुझे घर के पास वाला बनारसी आज भी याद है जिसने मुझे 25 पैसे की इमली की गोली एक बिस्सी यानी 20 पैसे में इस शर्त के साथ दी थी कि मै पंजी या 5 पैसे उसे बाद में दे दूंगा. हालांकि मै उन्हे कभी दे नहीं पाया और पता नहीं बनारसी दादा कहां चले गए. चवन्नी के बंद होने पर व्यवहारिक रूप से कोई क्षोभ जरूरी नहीं है. लेकिन फिर भी चूंकि ये घटना अतीत के खूबसूरत पन्ने दोबारा पलट गई है इसलिए माहौल का जज्बाती होना लाजिमी है. पहले बनारसी दादा गए, फिर बचपन गया और आज बचपन के खजाने का सबसे बड़ा सिक्का यानि चवन्नी भी रूखसत हो गई.1
अरविन्द त्रिपाठी

सोमवार, 27 जून 2011

फेसबुकनामा

फेसबुक पर लाइकिस्टों की आई बाढ़

जब से सोशल नेटवर्किंग का युग आया है, फेसबुक सबसे जबरदस्त रूप में सफल हुआ है.  इसकी आज की लोकप्रियता का आलम ये है की आज सभी खासोआम इसमें सदस्य के रूप में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. इसमें जुडऩे और खोजने की गति बहुत तेज है. कुल जमा तीन साल पहले भारत में इंटरनेट पर उतरा फेसबुक भारत में नेटीजनों की पहली पसंद बनता जा रहा है. देश में जितने इंटरनेट यूजर हैं उसमें से एक तिहाई फेसबुकिया हो गये हैं जिनकी अनुमानित संख्या 2.8 करोड़ है. इंटरनेट की दुनिया में फेसबुक का यह विस्तार इस अमेरिकी कंपनी के लिए सुखद सूचना है क्योंकि एशियाई बाजारों में भारत ही वह सबसे बड़ा बाजार है जिसपर कब्जा करने के बाद फेसबुक में व्यापार की अच्छी संभावना पैदा हो सकती है.
इस सबके बावजूद एक बड़ी समस्या है 'लाइक' यानी 'वाह-वाह' की. बहुत बार प्रस्तोता किसी गंभीर मुद्दे पर बहस चाहता है और उसके फेस्बुकिया  साथी सिर्फ लाइक करके निकल लेते हैं, तब उसकी हालत बहुत बुरी हो जाती है.
बहुत बार तो ऐसा होता है कि आपने अपना स्टेटस अपडेट किया नहीं की बीस-पच्चीस लाइकिस्ट तत्काल सक्रीय रूप से अपना मत दे बैठते हैं. किस मुद्दे  की पोस्ट है, इससे उनका कोई मतलब ही नहीं होता. यद्यपि ऐसी वाहों का कवि सम्मेलनों और मुशायरों में बहुत आवश्यक होती हैं. परन्तु यारों की फेस्बुकिया महफि़लों में ऐसी झूठी बड़ाई और मुद्दे की गंभीरता की अनदेखी से इस साईट में सदस्य बने गैर-गंभीर साबित हो रहे हैं. ये समस्या हाल में महिला साहित्यकार डा. सरोज गुप्ता ने बड़ी शिद्दत से उठायी. उन्होंने लिखा ''बहुत हो गया ,अपना सर दुखाते ,आपका सर खाते ,आज 'वाह -वाह' करती हूँ ,इसमें बहुत धार है! बहुत लायकिंग मिलती है.
.सुबह हो गयी -वाह ! चाय पी रही हूँ -वाह !
मुझे जुखाम हो गया -वाह!
फलां की अंत्येष्टि है -वाह!
राहुल की कैटरीना से शादी हो गयी -वाह.
 पुलिस ने बलात्कार किया -''वाह -वाह !'' जहां चाहे ''वाह'' लगाओ और प्रभु के गुण गाओ और फेस्बुकियों को अपना चहेता बनाओ! सुप्रभात -वाह -वाह -वाह!!!''
इस स्टेटस को अभी पचास से अधिक लाइक और पच्चासी से अधिक कमेंट मिले. जिसमें ज्यादातर ऐसे थे जो बीच बहस में इस तरह ऐंठ गये जैसे नम्बर घटवाने-बढ़वाने का खेल हो रहा हो.
निश्चल श्रीवास्तव ने कहा-  बात जहां से बोली जाये अगर सामने वाले को उसी जगह पर लगे तो परिणाम आयेगा ही. फिर चाहे वाह हो या आह.
प्रियांक पाठक को निश्चल की बात अच्छी नहीं लगी और उसने कहा कि सभी को अपनी पसन्द और नापसन्द जाहिर करने का हक है. इसलिये केवल वाह वाह करने वालों का विरोध नहीं किया जाना चाहिये.
इस वाह और आह में इतना तनाव बढ़ा कि दोनों में एक दूसरे से रिश्तेदारी कायम करनी पड़ी और सरोज गुप्ता को समझौता कराना पड़ा.
सरोज गुप्ता ने कहा कि- फेसबुक पर भरे पेट वाले लोगों का जमावड़ा है. अत: गम्भीर बातों, गम्भीर समस्याओं और राष्ट्रचिन्तन के मुद्दे पर  गम्भीर बहस नहीं हो रही है.
आशा मेहता ने वाह वाह से शुरुआत ही की और कहा- इस वाह में आम इन्सान की आह छिपी है. अदभुत अभिव्यक्ति या यूं कहें फेसबुक की गतिविधियों पर अदभुत कटाक्ष है. इस वाह में भी वे फेसबुक के लाइकिस्टों की गतिविधियों के प्रति अपने अन्दर के गुस्से को छिपा नहीं सकीं.1
अरविन्द त्रिपाठी

शनिवार, 18 जून 2011

फेसबुकनामा

जूता-कथा

रोज-रोज जूता. जिधर देखिये उधर ही 'जूतेबाजी'. जूता नहीं हो गया, म्यूजियम में रखा मुगल सल्तनत-काल के किसी बादशाह का बिना धार (मुथरा) का जंग लगा खंजर हो गया. जो काटेगा तो, लेकिन खून नहीं निकलने देगा. बगदादिया चैनल के इराकी पत्रकार मुंतजऱ अल ज़ैदी ने जार्ज डब्ल्यू बुश के मुंह पर जूता क्या फेंका? दुनिया भर में 'जूता-मार'  फैशन आ गया . ... न ज्यादा खर्च. न शस्त्र-लाइसेंस की जरुरत. न कहीं लाने-ले जाने में कोई झंझट. एक अदद थैले तक की भी जरुरत नहीं. पांव में पहना और चल दिये. उसका मुंह तलाशने, जिसके मुंह पर जूता फेंकना है.
जार्ज बुश पर मुंतजऱ ने जूता फेंका. वो इराक की जनता के रोल-मॉडल बन गये. जिस कंपनी का जूता था, उसका बिजनेस घर बैठे बिना कुछ करे-धरे बढ़ गया. भले ही एक जूते के फेर में मुंतजऱ अल ज़ैदी को अपनी हड्डी-पसली सब तुड़वानी पड़ गयीं हों. क्यों न एक जूते ने दुनिया की सुपर-पॉवर माने जाने वाले देश के स्पाइडर-मैन की छवि रखने वाले राष्ट्रपति की इज्जत चंद लम्हों में खाक में मिला दी हो. इसके बाद तो दुनिया में जूता-कल्चर ऐसे फैला, जैसे जापान का जलजला. जिधर देखो उधर जूता. सबसे ज्यादा 'जूतम-जाती' की हवा चली दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सर-जमीं पर. यानि भारत में.
जहां तक मुझे याद है, पहला जूता देश के एक हिंदी अखबार के संवाददाता ने मौजूदा केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंवरम् के ऊपर एक प्रेस-वार्ता में फेंका गया. जूता फेंकने वाले पत्रकार की दलील थी कि, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजधानी दिल्ली में भड़के सिक्ख-दंगों की जांच में ढिलाई को लेकर गुस्से का इजहार है. मामले को तूल देने का मतलब पत्रकार या फिर विरोधी दलों की दुकान चलवाने के लिए मुद्दा तैयार कर देना था. सो न चाहकर भी बिचारे गृहमंत्री खून सा घूंट पी कर रह गये. पत्रकार को माफ कर दिया. गृहमंत्री को राजनीति करनी थी. सत्ता के गलियारों में कहीं एक अकेला जूता, आवाज न पैदा कर दे. ये सोचकर गृहमंत्री चुप्पी लगा गये. लेकिन जिस अखबार में पत्रकार नौकरी करता था, वहां राजनीति हो गयी.
पता नहीं देश के गृहमंत्री के मुंह पर फेंका गया जूता, कब अखबार और उसके मालिकों की ओर उडऩे लगे? और सरकार, अखबार मालिकों से कौन सा पुराना हिसाब इस जूते ही आड़ में पूरा या चुकता कर ले. इसलिए बिना देर किये, जूता फेंकने वाले पत्रकार को नौकरी से बर्खास्त करके 'बिचारे' की श्रेणी में ला दिया गया . बेरोजगार करके. सल्तनत भी खुश और अखबार मालिक भी. इससे न सल्तनत को सरोकार था. न अखबार के मालिकान को, कि आवेश में फेंके गये एक जूते का वजन पत्रकार और उसके परिवार पर कितना भारी पड़ेगा?
इसके बाद तो जिसे देखो, वो ही घर से जूता पहनकर निकलता और जिसका मुंह उसे अपने हिसाब-किताब से ठीक लगता, उसके मुंह पर फेंक आता. जूता नहीं हो गया, मानो घर में मरा हुआ चूहा हो गया. गृहमंत्री पर एक पत्रकार द्वारा जूता फेंकने की नौबत क्यों आई? जूता फेंकने के बाद मुद्दा ये उछलना चाहिए था. मगर मुद्दा उछला सिर्फ गृहमंत्री पर जूता फेंका गया. एक अखबार के पत्रकार ने फेंका. जिस वजह से फेंका, वो वजह आज भी वैसी ही है. गृहमंत्री भी वही हैं. संभव है कि आरोपी पत्रकार ने जूता भी संभालकर रख लिया हो.
इसके बाद देश के जाने माने योग-गुरु बाबा रामदेव की ओर जूता उछाल दिया गया. भरी सभा में. मामला जूते के इस्तेमाल का था . पैर में नहीं. किसी के मुंह पर . सो जूता, योग-गुरु, और जूते का मालिक सब सुर्खी बन गये. दो-चार दिन सबने चटकारे लेकर 'जूता-बाबा' कांड पर चटकारे लिये. बात में जूता, जूता-मालिक के पैर में पहन लिया गया. जूते का मालिक अपने घर में और बाबा अपने आश्रम में खो-रम गये. देश में दो-चार छोटे-मोटे और भी जूता-कांड हुए. ये अलग बात है कि बदकिस्मती के चलते वे उतनी सुर्खी पाने में कामयाब नहीं हो सके, जितने बाकी या पहले हो चुके जूता-कांडों को चर्चा मिली.
अब फिर देश के एक कद्दावर नेता को भीड़ के बीच जूतियाने की 'बंदर-घुड़की' दी गयी. मारा या उनकी ओर जूता उछाला नहीं गया. शायद ये सोचकर कि बार-बार जूता फेंकने से, जूता और जूते की मार का वजन कम हो जाता है. कुछ दिन पहले ये बात भारत आये इराकी पत्रकार मुंतजऱ अल ज़ैदी ने मुझे भी इंटरव्यू के दौरान सुनाई और समझायी थी. मुंतजऱ साहब की दलील थी, कि बार-बार, और हर-किसी पर जूता फेंकने से, जूते की चोट कम हो जाती है. या यूं कहें कि रोज-रोज जूता फेंकने से जूते की 'इज्जत' को ठेस पहुंचती है.
इस बार जूते के शिकार होते होते बचे कद्दावर नेता जनार्दन द्विवेदी. देश की राजधानी दिल्ली में. और जूता दिखाने वाला था सुनील कुमार नाम का कथित पत्रकार. कथित इसलिए कि देश की पत्रकार जमात ने ही इस बात से इंकार कर दिया कि वो पत्रकार भी है. पत्रकार जमात की दावेदारी के मुताबिक हमलावर एक शिक्षक है. जूता उठाने वाला कौन है? इससे ज्यादा जरुरी सवाल ये है कि उसने जूता उठाया क्यों? उसने अपनी मर्जी से जूता उठाया, या फिर किसी विरोधी या असंतुष्ट ने उसे उकसाकर, नेता जी के ऊपर जूता सधवाया. सवाल ये भी पैदा होता है कि जब जूता उठा लिया, तो फिर उछाला, या नेता जी पर जड़ा क्यो नहीं? जो भी हो. न तो मैं जूता फेंकने वाला हूं. न ही किसी को उकसाकर, किसी और पर जूता फिंकवाने वाला. चाहे कोई किसी पर फेंके और किसी के मुंह पर जूता पड़े. बे-वजह फटे में भला टांग क्यों अड़ाऊं? हां इतना जरुर लग रहा है, कि अगर देश में इसी तरह जूते का बेजा इस्तेमाल होता रहा तो, वो दिन दूर नहीं होगा, कि आपके पैर को अपना जूता कितना ही भारीलगे, लेकिन जिसके मुंह पर जूता फेंका जायेगा, उसके मुंह के लिए जूते का वजन कम हो जायेगा. मैं तो खुले दिल-ओ-दिमाग से यहीं कहूंगा कि जूते का हर समय इस्तेमाल ठीक नहीं. वरना एक दिन वो आ जायेगा, कि आज जिस जूते से इंसान खौफ खाता है. आने वाले कल में वही जूता अपनी 'इज्जत' बचाने की लड़ाई लडऩे के लिए विवश हो जायेगा. और एक दिन वो भी आ जायेगा जब देश की 'जूता-बिरादरी' के अस्तित्व की लड़ाई लडऩे वाले संगठन गली-कूचों में पैरोडी गाते फिर रहे होंगे- जूते को न उठाओ, जूते को रहने दो, जूता जो उठ गया तो...जूता कहीं का न रह जायेगा....1           
 अरविन्द त्रिपाठी

फेसबुकनामा

फेसबुक में आई और छाई
'सिल्ट वार्ता'

कई  वर्षों पूर्व हेलो कानपुर के एक अंक में 'सिल्ट' की महिमा पर एक व्यंगात्मक लेख प्रस्तुत किया गया था. जो आज के शहर के हालातों को देखते हुए मौजूं हो चला. तब ये और सुखिऱ्यों का हिस्सा बना जब इसे आजकल की नव-तकनीक यानी फेसबुक का प्रयोग कर के आप सभी की नजर किया गया.मूल लेख एक बार फिर आपके सामने है -
'मैंने चारों तरफ नजर घुमाई , मुझे हर कहीं सिल्ट नजर आई.' सिल्ट क्या है.. मुझसे एक उत्सुक छात्र ने पूंछा. मैंने कहा, 'सिल्ट नाले नालियों में जमा गन्दगी है, जिससे शहर की सीवर लाइनें चोक हो जाती हैं और बरसात में शहर नरक हो जाता है.' उत्सुक छात्र बोला रहे न आप सिल्ट के सिल्ट. इतने बड़े हो गए अभी तक सिल्ट का मतलब नहीं जान पाए. सिल्ट नाले... नालियों की गन्दगी नहीं है ,ये नगर निगम और जलसंस्थान की सालाना बंदगी है. सिल्ट टेंडर है,सिल्ट कमीशन है, सिल्ट ठेका है, सिल्ट मौका है. सिल्ट सभासद की दारू है, सिल्ट इंजीनियरों का मुर्गा है, अधिकारियों का अधिकार है. सिल्ट केवल सिल्ट नहीं समूची सरकार है. मैंने कहा नहीं बेटा सिल्ट शहर की गन्दगी हटाने के बीच बहुत बड़ा रोड़ा है. वो बोला नहीं सर, सिल्ट मिस्टर अरोरा है. इसी सिल्ट ने उसका जीवन संवारा है.पहले उसके पास साईकिल नहीं थी अब कर है ,बंगला है और बीबी के लिए जेवरातों का बड़ा पिटारा है. ये सिल्ट, सिल्ट नहीं शहर की आत्मा है. जैसे आत्मा अजर अमर है , वैसे ही सिल्ट को न तो कोई नाले से हमेशा के लिए निकाल सकता है और न ही हमेशा के लिए बना रहने दे सकता है. जैसे आत्मा का वस्त्र बदल जाता है, वैसे ही सिल्ट का जमादार बदल जाता है. एक जमादार उसे नाले में बहाता है दूसरा उसे पुन: नाले में डाल देता है. उत्सुक छात्र के जागरूक उत्तर के बाद मैंने चारों तरफ नजर घुमाई मुझे हर कहीं सिल्ट नजर आई.'
इसी बीच देश में एक बड़ी घटना घट गयी है.  वैसे तो हम सभी हर बड़ी घटना के लिए तैयार रहने लगे हैं. गांधी की ह्त्या से शुरू हुआ सिलसिला निगमानंद की असामयिक मौत तक जारी है. हम सभी बस. 'अरे ....' करके चुप रह जाते हैं. आता हूँ, उस खास घटना पर नहीं तो आप सभी कहेंगे, क्या आप भी 'सिल्ट' की ही तरह से फ़ैल जाते हो? तो मित्रों, विगत दिनों वर्धा-आश्रम से बापू का चश्मा खो गया है. ये बात भी फेसबुक में सुर्खियाँ बटोर रही है. इसी बीच प्रमोद तिवारी जी की 'सिल्ट' आ गयी. वैसे वो चश्मा भी खोज रहे थे. उन्होंने सुझाया था की अब देश में नाक और कान वाले तो रहे नहीं अत: चश्मा देश से बाहर चला गया होगा.
तभी 'सिल्ट' की समस्या पर आर. विक्रम सिंह जी ने कहा 'प्रमोद जी, सिल्ट उठाने का नगर-संयोजक आप को बनाया जाता है. आप समिति बनाइये और उठ्वाइये इसे. मैंने इस स्थिति में ये जान लिया की जरूर चश्मा इन्हीं के पास है, क्योंकि चश्मा लगाने के लिए इनके पास नाक और कान हैं, यानी वो मान और सक्रियता है, जिससे समस्या को समझा जा सके. अन्यथा देश में वैसे भी अपमान योग चल रहा है. अब देखो बाबा को, वो रामलीला मैदान, दिल्ली में अपना अपमान करा कर लौटा है. हवाई जहाज से चढ़कर देश-देश घूमकर अब वो भी अपना और अपमान कराएगा. प्रमोद जी ने भी आगे बढ़कर सिल्ट उठाने की जिम्मेदारी लेने में अपनी सक्षमता दिखाई. प्रज्ञा विकास ने इस 'सिल्ट' को बेहतरीन सिल्टमय प्रस्तुति कहा. व्यंग्यकार राजेन्द्र पंडित ने भी इसे सराहा. हद तो तब हो गयी जब इस हलकी-फुलकी फुहार के बीच कुछ फेसबुकिये साथी अपने घर और गली का पता बताने लगे. धन्य हो- 'फेसबुक की सिल्ट-गाथा'.1
अरविन्द त्रिपाठी

शनिवार, 28 मई 2011

फेसबुकनामा

फेसबुक बनी फेकबुक
 भाइयों और बहनों, भारतीयों की युवाशक्ति के समय को बर्बाद करने का गोरों का खेल जारी है. क्रिकेट, फ़ुटबाल,बालीबाल, टेनिस,टेबिल टेनिस  जैसे खेल वे हमारे देश में लाये. हमारे देश के इतिहास में इन और ऐसे बहुत से खेलों के बारे में कोई आख्यान या विवरण नहीं मिलता है. अभी क्रिकेट का आई.पी.एल. चल रहा है. हज़ारों करोड़ रुपया विज्ञापन और विभिन्न मदों में बहाया गया. देश का सैकड़ों घंटे का बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ. बिजली सहित तमाम संसाधन जो देश के विकास में व्यय होने चाहिए व्यर्थ के शौक में बेकार हुए. मैच-फिक्सिंग और सट्टा से ये मैच ओत-प्रोत रहे. अब एनी खेलों को भी इसी तरह से आगे लाया जाएगा. अभी भारतीय जन-मानस राष्ट्र-मंडल खेलों में हुए घपले-घोटाले को भूला नहीं है.उसके नायक जेल में हैं. क्रिकेट के राष्ट्रनायकों का तिलिस्म भी आम जनता में आना बाकी है. वास्तव में हमारे देश के लोगों के पास खेलों के लिए कभी समय ही नहीं रहा. हमारे देश के संस्कार में श्रम मूलक सभ्यता का सर्व-मान्य होना इसका एक ख़ास कारण रहा है. ब्रिटिश काल में ही भारतीय समाज ने सिनेमा के बारे में जाना. शुरुआत में सिनेमा अंग्रेजों के मनोरंजन का साध्य था. बाद में ये धार्मिक, पौराणिक  और ऐतिहासिक प्रतीकों के माध्यम से भारतीय एकता का माध्यम बनता गया. अंग्रेजों ने कभी नहीं सोचा था की उनकी इस विधा का भारतीय एकीकरण में इस तरह प्रयोग हो जाएगा ठीक भारतीय रेलों की ही तरह . इस सब के बावजूद गांधी जी ने एक ही सिनेमा देखा था 'राम राज्य' वो आजीवन उसकी कामना करते रहे. उनकी प्रथम पुस्तक 'हिंद स्वराज' में उनके बहुत सारे प्रश्न और उनके ही शब्दों में दिए गये जवाब यदि कभी भी लागू कर दिए गए होते तो देश की दशा और दिशा कुछ और ही होती.
आज के अतिव्यस्त समाज में सोशल नेट्वर्किंग के माध्यम से देश-दुनिया में अपने से जुड़ों से जुड़े रहने का एक सफल तरीका आम चलन में है. इंटरनेट के प्रयोग ने आज लोगों के बीच की दूरी को कम कर दिया है. चैट रूम और  सोशल नेट्वर्किंग अब आम प्रयोग में है. आज 76 साल के अशोक जैन भी फेसबुक में हैं और 15 साल से तरुण पाण्डेय भी फेसबुक में हैं. मात्र 24 साल के मि. जुकरबर्ग और उनकी सहयोगी टीम ने जिस फेसबुक का निर्माण किया था आज वो दुनिया में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. जो जितना देर से इसका सदस्य बनता है उसे लगता है की मैं अभी तक यहाँ क्यों नहीं आया. उसे अपने तरीके यानी अपनी पसंद और रुचियों के पूरे देश-दुनिया के लोगों का साथ मिलने में देर नहीं लगने वाली. बस करना है, थोड़ा इंतज़ार. कहना ये है की राम की ही तरह यहाँ भी यही हाल है की - 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी'. सच ही है की जिसे इसका दुरूपयोग ही करना है तो आसानी से इसका दुरूपयोग कर पा रहा है, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण करने का कोई माध्यम नहीं है. कोई नियम-क़ानून नहीं है. आमना-सामना नहीं होने के कारण झूठी बातें, झूठी रुचियाँ, झूठे आदर्श , झूठे प्यार, झूठे मनुहार आदि का बोलबाला रहता है.इस सम्बन्ध में राजेश राज की पंक्तिया गौरतलब हैं-
इस तरह रिश्ते निभाता है ज़माना आजकल,
फेस बुक पर हो रहा मिलना मिलाना आजकल.
 इस तरफ हम हैं, उधर है कौन? क्या मालूम पर, इक भरोसे पर है सुनना-सुनाना आजकल .
सुख्यात कवि और शायर, राजनेता,समाजसेवी, युवा शक्ति सभी अपने संगी-साथिओं के साथ आज फेसबुक पर हैं.पर हाल बुरा है. अफीम जैसा बहुत बुरा नशा है. बहुत समय इसमें जाया हो रहा है. आयु सम्बन्धी नैतिकता का कोई मायने नहीं रह गया है. इस सबसे बढ़कर गिरोहबंदी भी इसकी बड़ी बुराई और बिमारी है. कुछ ख़ास लोगों के साथ मिलकर दूसरों पर हावी होने का खेल भी जारी रहता है. किसी को हतोत्साहित करने और उसपर हावी होने का काम भी किया जाता है. झूठी शान दिखाने के क्रम में कानपुर के एक समाजसेवी संगठन साह्वेस के संचालक ने एक पूर्व सहयोगी रहे वैभव मिश्रा को जान से मारने की धमकी दी. ऐसी घटनाएं आम होने लगी हैं. वरिष्ठ पत्रकार राजेश श्रीनेत कहत हैं भाई, जिसमें फेस करने की हिम्मत नहीं वह फेसबुक पर क्यों आते हैं, समझ में नहीं आता। अच्छी भली सोशल नेटवर्किंग साइट का कबाड़ा कर रखा है। लोगों की समझ में यह नहीं आता कि यह टाइम पास के लिए नहीं बनाई गई है।इन फेस्बुकिया एक्टिविस्टों में अब पत्रकार होने का भ्रम पैदा हो गया है. चौथा  स्तम्भ, पंचम स्तंभ, जैसे समूह बनाए जाते हैं. कुछ ख़ास समाज्सेविओं ने भी गिरोहबंदी करते हुए समूह बना लिए हैं जो एक-दूसरे की बड़ाई दिनभर करते रहते हैं.
कुछ तो ऐसे हैं की उनके पास एक की लैपटॉप या कम्प्यूटर है पर आई.दी. कई हैं, जिन्हें वे अकेले ही चलाते हैं . इस समस्या की चपेट में आये धर्मेन्द्र सिंह कहते हैं की उनका विरोधी इस तरह से काम कर रहा है. पर शायद उन्हें याद नहीं रहा की कभी वो भी इन्हीं हथियारों ऑयर इसी तकनीक का प्रयोग करके यहाँ तक आये हैं. उनकी सफलता में इसी फेसबुक का ही हाथ रहा है.1     
 हेलो संवाददाता