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शनिवार, 28 मई 2011

मार्शल का बाईस्कोप

खुदा ही खुदा / हाले शहर
एक कनपुरिये ने बाहर रहने वाले अपने रिश्तेदार को फोन किया कि जब आना तो फला सड़क से मत आना, उधर खुदा पड़ा है. रिश्तेदार जब कुछ दिनों बाद छुट्टी हो गयी तो आये. लेकिन यह क्या उनके घर की हर सड़क खोद कर पाइप डाले जा रहे थे. वे जैसे-तैसे घर पहुंचे तो मुंह से निकला यहां तो चारो ओर खुदा ही खुदा है.
जेएनयूआरएम से पैसे की बरसात क्या हुई, सारे शहर में सीवर लाइनें पडऩा शुरू हो गया. कोई प्लान नहीं कि अगर इस सड़क पर डालें तो इधर का ट्रैफिक उधर से निकल जायेगा. उसके बाद दूसरी तरफ डालें. एक साथ चारो ओर सड़कें खोद दी गईं. बड़े-बड़े पाइप सड़कों के किनारे डाल दिये गये. पूरा शहर जाम से जाम लड़ाने लगा. घंटे-दो घंटे के जाम दस बारह घंटे में बदलने लगे. इस पर भी तुर्रा यह कि कहीं घटिया पाइप पड़ रहे हैं, कहीं चिटके, कहीं रिजेक्टेड. कभी महाना, कभी पाटनी, तो कहीं स्वयं नगर आयुक्त और एडीएम घटिया पाइप पकड़ चुके हैं. सोचिये तब क्या होगा जब यह पाइप लाइन चालू होगी. सीवर से भरी और जब इसके लीकेज से कोई माल रोड धसेगी, बैठेगी और फिर खुदेगी. क्या होगा तब उस पूरे इलाके का? व्यापार, रोजमर्रा के  काम सब ठप्प हो जायेंगे. आखिर टूटे पाइपों को जमीन के अन्दर दफन करने से सीवर लाइनों के चालू होने के बाद जिन्न निकलेगा उसे कौन, कहां, कैसे दफन कर पायेगा? भाई कह रहे हैं उसमें भी फायदे हैं, आसपास के बड़े एरिया में रूमफ्रेशनर और रोड पर रुमाल की बिक्री बढ़ जायेगी.
बीमार अस्पताल, हेल्दी साहब स्वास्थ्य महकमा इस समय ज्यादा परेशान है.  कारण कई हैं. एक तो ऊपर से धन की बरसात इतनी हो रही है कि सम्भालना मुश्किल. उसकी बंदरबाट और खाने-पीने की लड़ाई में सीएमओ मर रहे हैं. जांच की आंच इतनी तेज कि बेचारे दो मंत्री भी उसमें जल गये. अपने शहर का भी नुकसान हुआ. विभाग में सारे घर के बदल डालूंगा स्टाइल में तूफान आया. संविदा के डाक्टरों को हटाया गया. सीएमओ परिवार कल्याण पद खत्म कर दिया. उम्मीद  थी कि इससे कुछ फर्क पड़ेगा. राहुल गांधी आरटीआई में सूचनाएं क्या मांगते हैं, अपने शहर के युवक कांग्रेसी भी खड़े हैं, अस्पतालों में दस रुपये का नोट लगाये एप्लीकेशन लिये. विभाग की सेहत पर कोई फर्क नहीं है वह अजगर करें न चाकरी, पंक्षी करे न काम... को मूलमंत्र बनाये हैं.
अब देखिये शहर की एक तहसील में तैनात बड़े वाले डा. साहब अपना ट्रान्सफर शहर के नजदीक चाहते हैं. क्योंकि साहब का अपना अस्पताल श्यामनगर में चल रहा है. ऐसे में पचास किमी दूर (हफ्ते में दो दिन ही सही) अपनी कार से जाना, मतलब सरकारी अस्पताल को स्वस्थ करना और अपने अस्पताल को बीमार करना. बस बड़े साहब ने और बड़े साहब के यहां अर्जी लगाई और गांधी जी भी पहुंचा दिये. तहसील में तैनात एक छोटे डा. साहब की भी अर्जी और गांधी जी ऊपर पहुंच गये, कि बड़े वाले पन्डित जी को हटाकर मुझे चार्ज दे दो.
शहर के नजदीक जिन डाक्टर साहब को वहां से हटाकर कल्यानपुर भेजकर वह जगह खाली करानी है, वह डाक्टर साहब चवन्नी खर्च करने को तैयार नहीं हैं. उन्हें पता है कि जब उन दो का पैसा जमा है और उनको इधर-उधर भेजा जायेगा तो मुझे कल्यानपुर पहुंचा ही दिया जायेगा.
अब शहर के बड़े साहब चक्कर में हैं कि कल्यानपुर ट्रान्सफर वो भी बगैर चवन्नी के, सवाल ही नहीं उठता. बस अब न देने वालों के चक्कर में देने वाले भी परेशान हैं. अस्पताल तो तब सुधरेंगे जब व्यवस्था सुधरेगी और व्यवस्था तब सुधरेगी जब साहब बैठकर काम करेंगे. अभी तो मई-जून बस इसीलिये है कि कौन कहां कब से तैनात है और कितने देकर कहां जाना चाहता है.
टांग खिचाई का मिशन
कांग्रेस प्रदेश में सरकार बनाने का दावा कर रही है. लेकिन कांग्रेसियों का अपना राष्ट्रीय कार्यक्रम टांग खिचाई खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. जिले में इस समय कांग्रेस की दो सीटें हैं. देहात और नगर मिलाकर कुछ चौदह सीटें है. अब कांग्रेस को सरकार बनानी है तो दो को पांच छह में बदलना पड़ेगा. हालत यह है कि इन दो में ही अभी भाभई मची है. सीसा वाली सीट सामान्य हो गई है, यहां वाले नेता जी का नाम कभी बिल्हौर के लिये उछलता है तो कभी दूसरी जगहों से. नेता जी ताक रहे हैं कि कहां से हमारे श्री श्री श्री १००८ हमें प्रकाश फैलाने के लिये भुजेंगे. दूसरे वाले पहले से ही चतुर चौकन्ने हैं. उन्हें मालूम है कि उनके लिये प्रकाश नहीं अंधेरा किया जायेगा. वैसे भी पुरानी विधानसभा दो हिस्सों में बट गयी है. विरोधी कभी उनको इधर-उधर खिसकाने के शोशे छोड़ते हैं तो कभी मनोज तिवारी जैसे भोजपुरी गायक का तराना छेड़ देते हैं. पूर्वांचल जिन्दाबाद. अपने भारी भरकम नेता जी भी तेल और तेल की धार पहचानना जानते हैं, उन्होंने बगल की छावनी पर निगाह गड़ा दी है. मुस्लिमों की बड़ी संख्या, ऊपर से रिश्तेदार विधायक के पुराने समर्थक, सब मिलकर आराम से बेड़ा पार कर देंगे. रिश्तेदार विधायक जी तो कमल खिलाने महराजपुर चले गये हैं. करो कितनी टांग खिचाई करोगे? लेकिन बाकी सीटों का क्या होगा? क्या ऐसे होगा मिशन २०१२ पूरा?
अनुराग अवस्थी 'मार्शल'

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

मार्शल का बाईस्कोप

भ्रष्टाचारी कनकैयाबाजी

अनुराग अवस्थी 'मार्शल'

देश, मनमोहनी सोनिया की मायावी साथियों के साथ भ्रष्टाचार और कालेधन, आय से अधिक सम्पत्ति पर मुलायम रवैय्ये आक्रोशित उद्विलत, उत्तेजित और उद्विग्न है।
ये सब ढील देकर पेेंच लड़ाया करते हैं किसी भी कानूनू का मंझा इतना मजबूत नहीं है  कि भ्रष्टाचार की पतंग को कन्ने से काट सके। एक कटती भी है तो इसे और ये इनके राजा-रानी खुद ही लूट कर दुबारा उड़ा देते है। देश की जनता इनकी लगातार उड़ती पतंगो को देख कर परेशान है। अब अन्ना का लंगर इनकी पतंगो को रोक पायेगा इस पर है सबकी निगाहे, लेकिन कुछ दिग्विजय राजा इन लगरों की ही कमजोर कर पतंगों के लगातार उडऩे की हवा तैयार कर रहे है।
ऊपर जब यह हाल है तो बीच वाले भी मौज मार रहे है। ए.सी कमरे में बैठकर नीचे डी सी पंखे की हवा से भी महस्म लोगों के लिए बनाने वालों के कानूनों ने व्यवहार किया है कि 'अंधेर नगरी बनाकर सब राजा मौज ही मौज कर हरे है
फर्जी पायजट प्लेन उड़ा रहे है पता

किसी को चल ही नहीं रहा है। एग्जाम के लिए तैयार पेपर गलत बन जा रहे हैं, लीक हो जा रहे है।
जो काम सुप्रीम कोर्ट नहीं कर सकता उसे ककवन गांव प्रधान बीडीओ ने कर दिखाया। गांव में कल १४९ बी पी एल थे, इनमें से कुछ मर चुके, कुछ गांव छोड़कर चले गये कुछ लखपति हो गये, स्वयं इसमे गांव प्रधान पति भी शामिल है। सूची छोटी नहीं हुई। इन्द्रा आवास के लिए ४५००० रुपये बाटने का नम्बर आया तो सूची २१८ की हो गयी। नीचे से ऊपर तक दस जगह दस्तखतख् सस्तूति होती हुई रुपया आ गया और बंटने लगा।
सी बी आई इन्क्वायरी की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में रिट होती है और फैसला तीन-छ: और बारह महीने तक नहीं होता है। यही कारण है कि आरूषि हत्याकाण्ड में भी सबूत नहीं मिलते है।
वि.वि.के फार्मों पर हीरोइनों की फोटो चिपकी मिलती है। तब पता चलता है कि ठेके पर फार्म भरे जा रहे हैं।
बी.एड. का सेशन एक साल का होता है ले किन चार साल से एक्जाम ही नहीं हुए है। सेशन चल रहा है।
अब तो साफ हो गया है कि जिम्मेदारों की फौज 'अजगर करै न चाकरी पंक्षी करै'। को अपना मुल मंत्र बनाये है।
 जहां नजर डालिए या तो मुंगेरीलाल मिलेगें या नटवरलाल मुगेरीलाल ए सी कमरे में बैठकर नीति बना डालते है। उन्हें मालूम ही नहीं है कि जहंा इस योजना को लागू होना है वहां स्टाफ कितनी है, मौसम कैसा रहता है, दिक्कते क्या आती है।
व्यवहारिकता से कोसों दूर अपना मुंगेरी कल्पना की उड़ान मेें चावला को पीछे छोड़ता अपना मुंगेरी ११७० रु० में  गेंहू खरीदने का आदेश कर देता है और बेचारा किसान १०७० में आढ़ती को गेहूं  बेंचकर अपने घर जाता है। फिर यही आढ़ती सरकारी बोरों में गेहूँ  पैक कर ११७० रु० लें लेता है। कु छ दक्षिणा बांट देता है। सरकारी स्टाफ के नटवरलाल अपना काम पूरी इमानदारी से कर रहे है। जहां मौका मिले एक के तीन बना रहे है। नटवरलाल पुलिस प्रशासन न्यायपालिका आयकर पत्रकारिता एन जी ओ सभी क्षेत्रों में फैले हैं।
मुंगेरीलाल और नटवरलाल से बचाने के लिए देश में सरकार को अन्ना हजारे आयात  करने पड़ेगे। इतने अन्ना कहां से आयेंगे। अन्ना आयेंगे तो उनके साथ शान्ति भूषण किरन बेदी,  केजरीब ल कहां से लाये जायेंगे।
एक अन्ना और शान्तिभूषण पर ही ग्रहण लग रहे है। बाकी का क्या होगा। अब तो जरूरत इस बात की है कि हर आदमी को अपनी डयूटी खुद पूरी करनी पड़ेगी। उसे जन्म मृत्यु, आय जनगणना, पल्सपोलियो ड्राइविंग लाइसेन्स खुद जाकर बनवाने पडेगा।
अवैध कब्जा खुद हटाना होगा। वरना पहली बार के बाद दुबारा जुर्माना ५०० रुपये तिबारा और ज्यादा चौबारा ज्यादा। वरना चौराहे सड़कें जाम ही रहेंगी। सरकारी कब्जा हटाओ अभियान चलता ही रहेगा। गांवा में चकरोड कभी खाली नहीं होंगा।
जिम्मेदारी को मुगेंरीलाल और नटवरलाल बनने से रोकना पड़ेगा। वरना इस देश में हर जान जोन के बाद एक डिवाइडर बनेगा। एक सी बी आई इन्क्वायरी होगी, एक मंत्री इस्तीफा देगा। तब तो सड़क डिवाइडर बन जायेंगे सी बी आई के पास इतने मुकदमे होंगे जितने लेखपालों के पास १२२ बी की फाइलें और पूरा मंत्रीमण्डल जेल पहुंच जायेगा। देश और प्रदेश तब भी नहीं सुधरेगा।
 नियम कानून की जानकारी हर व्यक्ति  को दी जायेगी। फिर कानून का पालन हर आदमी के लिए अनिवार्य कर दिया जाये। कानून तोडऩे पर जुर्माना फिर कड़ी सजा।
तीसरे कानून का राज स्थापित करने की जिम्मेदारी जिनकी है इसके लिए हर महीने गांधी छाप की मोटी गड्डियां लेते हैं उनको हर्रा खोरी करने पर पहले वार्निंग फिर नुकसान की वसूली और फिर नौकरी से बाहर। कड़े कानून, कड़ाई से पालन उल्लघन पर कड़ा दण्ड। वरना सारे विश्व में हम भिखारियों और सांप का देश माने जाते थे, अब मुंगेरीलाल और  नटवरलाल का देश माने जाये।
और अंत में  
कलमाड़ी अन्दर, कनुमोझी का नम्बर, राजा बना है बन्दर, फिर भी एक-एक बेइमान सिकन्दर क्योंकि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और।1

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

मार्शल का बाईस्कोप

भ्रष्टाचार: व्यवहार से बना खरपतवार

अन्ना साड़ से घूम रहे हैं देश में भ्रष्टाचारी। भ्रष्टाचार पहले व्यवहार हुआ, फिर जबरार हुआ, फिर शिष्टाचार हुआ। पहले सरकारी आदमी घूस चुपके से लेता था, आम आदमी उसे व्यवहार के नाम पर कुछ दे देता था। व्यवहार का कोई रेट नहीं होता है। हम शादी बारात में रुपये से आगे... चाहे जो कुछ दे दें। फिर रेट तय हुआ और ये नजराना से जबराना हो गया। उतना ही देना पड़ेगा। अब ये शिष्टाचार में बदल गया है। मतलब जैसे मिलने पर जय राम जी की, जय भीम, पांव लागी होता है वैसे ही घूस, पैसा तो देना ही देना है। मुझे लगता है भ्रष्टाचार अब खरपतवार बन गया है। शिष्टाचार चाहो तो न करो, लेकिन खेत-खलिहान में खरपतवार तो उग ही  जाता है। अब खरपतवार काटे बगैर कुछ नहीं होगा।
अब व्यवहार से शुरू हुये खरपतवार बन चुके इस भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये अपने अन्ना भाई आ चुके हैं। सारा देश उनके साथ उपवास, कैण्डल मार्च में शामिल है। मेरे एक मित्र हैं व्यूरोक्रेसी में ऊपर तक पहुंच रखने वाले छोटे अफसर। कहते हैं जब सब मार्च निकाल रहे हैं तो भ्रष्ट कौन है? भ्रष्ट तो हम सब हो चुके हैं, बताइये क्या बगैर हेलमेट लगाये और गाड़ी के सभी कागज लिये बगैर चलना, पुलिस के द्वारा रोकने पर मैं प्रेस/नेता... का हवाला देकर निकलना या फिर पचास का नोट देकर बचना क्या है? स्टेशन पर लगी लाइन में जुगाड़ से टिकट लेने का प्रयास करना क्या है? शहर में आये सर्कस/जातू/म्यूजिकल नाइट/मैच में सक्षम होते हुये भी फ्री पास झटकना क्या है?
मैं फिर कह रहा हूं भ्रष्टाचार शुरू ऊपर से होता है खत्म नीचे से होगा। अन्ना के साथ अनशन पर बैठने से ही नहीं, अन्ना की तरह अपने जीवन को पाक-साफ बनाकर। घूस लेंगे नहीं। घूस देंगे नहीं। अपना काम ईमानदारी से करेंगे, नियम से चलेंगे, न कानून तोड़ेंगे न खींसे निपोरनी पड़ेंगी।
बाबा साहब अमर रहें
बाबा साहब को श्रद्धांजलि समर्पित हो गयी। गांधी जयंती, रामनवमी, अम्बेडकर जयंती सब या तो एक दिन की छुट्टी का नाम है या वोट बढ़ाऊ अभियान का दूसरा नाम। डा. अम्बेडकर ने हमें वो संविधान दिया, जो हमें स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीने की राह सिखाता है। कुछ लोगों ने अम्बेडकर की अवहेलना की और कुछ ने इसे हाईजैक कर लिया। आरक्षण को लेकर आज लोग आमने-सामने हो रहे हैं। क्या सरकारी नौकरियां इतनी हैं कि सबको मिल जायें तो फिर जो एक बार आरक्षण का लाभ पा गया उसको दुबारा क्यों? क्या एक युवा आईएएस, पीसीएस या बैंक में आने के बाद भी दलित या पिछड़ा बना रहता है तो फिर घुरहू मोची का नम्बर कब आयेगा। प्रोन्नति में आरक्षण का क्या काम? कार्यदक्षता, ईमानदारी और अनुभव के बल पर ही प्रोन्नति होनी चाहिये, लेकिन नहीं देश और समाज से बड़ा है अपना वोट बैंक। इस मामले में सभी नेता लगभग एक ही हैं...। किससे क्या उम्मीद करेंगे।
सपा-बसपा आगे, भाजपा कांग्रेस पीछे
उत्तर प्रदेश चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। सब कुछ ठीक रहा तो जुलाई में पालिकाओं के चुनाव और दिसम्बर जनवरी में विधानसभा के। बसपा की तैयारी लगभग पूरी है। प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं। कार्यकर्ताओं के सम्मेलन और बैठकें होती रहती हैं। कैडर और बूथ लेबिल पर भर्ती, पदाधिकारी, लिस्ट रजिस्टर चला ही करता है। अनुसूचित सीटों के प्रभारी नौशाद अली मुस्लिमों को एकजुट करते घूम रहे हैं। खुद प्रत्याशियों और विधायकों ने बूथ इन्चार्ज बनाने शुरू कर दिये हैं। समाजवादी पार्टी ने भी पहले लिस्ट निकाल दी है।
भाजपा-कांग्रेस अभी सो रही है। कांग्रेस तो फिर भी पर्यवेक्षक घुमाकर बायोडाटा इक_ा कर रही है, इसी बहाने कुछ गर्मी बनाये है। भाजपाई परेशान हैं कि टिकट कब घोषित होंगे? कौन फाइनल करेगा? गडकरी, अडवाणी या जेटली? गडकरी के गुप्तचरों की टीम घूम रही है। शाही जी टिकट देंगे तो क्या होगा, वे तो प्रेमलता के चश्मे से देखते हैं। पार्टी समरसता दिवस मना रही है और हालत यह है कि पूरी पार्टी अपने दोनों अध्यक्षों के खिलाफ खड़ी है। श्याम बिहारी, द्रोण, पचौरी, पाटनी, गोपाल अवस्थी, बालचन्द्र, रामदेव...। पार्टी के बड़े नेता कलराज आये थे और कार्यक्रम की सूचना आधे नेताओं को नहीं दी गई। बड़ी पार्टी ज्यादा काम, कार्यकर्ता का कामतमाम। भाजपा संगठनात्मक कामों का एजेंडा और रूपरेखा ऐसा बनाती है जैसे नीचे वाले सब ठलुआ हैं या पार्टी से वेतन भोगी। आज मशाल जुलूस, कल हनुमान चालीसा पाठ,  परसों स्थापना दिवस, नरसों पदयात्रा, फिर चार दिन तक यात्रायें चलेंगी...। कार्यकर्ता कह रहा है प्रत्याशी कौन पार्टी कर रहे है व्यक्ति नहीं संगठन को मानिये।
भाजपा कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टियां हैं राष्ट्र पहले है, पार्टी हित बाद में। अभी इन्हें अन्ना, राडिया, पवार, रामदेव के चक्रव्यूह से बाहर आने में समय लगेगा। अक्टूबर में टिकट होंगे तब प्रत्याशी गाल फुलाये लोगों को मनायेंगे या प्रचार करेंगे। अपने गप्पू भइया ने तो कह दिया है पार्टी अक्टूबर में अगर टिकट देगी भी तो नहीं लड़ेंगे।
और आखिरी बात
पिपराइच में विधानसभा का उपचुनाव और विषधन में ग्राम सभा का उपचुनाव। जाति, धर्म, पैसा, दबाव, जोड़तोड़ दलीय समझौते सभी कुछ आइने के तरह साफ हैं। अन्दाजा लगा लीजिये कि कैसे होंगे अगले कुछ महीनों में होने वाले पालिका चुनाव और फिर विधानसभा के चुनाव।1


अनुराग अवस्थी 'मार्शल

रविवार, 10 अप्रैल 2011

मार्शल का बाईस्कोप

हम नहीं सुधरेंगे...

गुजराती, मराठी, उत्तर भारतीय..... पर हिन्दुस्तानी नहीं।
उतारो चश्मा, कभी तो भारतीय बनो।
धोनी के छक्के से भारतीय टीम के विश्वकप जीतते ही सारा देश भारतीय रंग में रंग गया। गंावो में खेतों से कस्बो नगरों की गलियों से दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों तक उल्लास, हर्ष, गौरव से जति, धर्म, आयु, गरीब अमीर, मजदूर, मालिक की सभी दीवारों टूट गयी। महिला हो या पुरूष, बच्चे हों या बूढ़े सभी क्रिकेट में भारत के विश्व विजेता बनने पर इतने खुश थे जैसे उनकी अपनी एक करोड़ की लाटरी खुल गयी। सारा देश टीम इन्डिया की कर रहा था। सचिन ० पर आउट हुए थे, फिर भी उनकी चर्चा थी, गम्भीर का शतक नहीं बन पाया इसका अफसोस था। धोनी पूरे टूर्नामेंट में नहीं चल पाये थे, लेकिन फाइन मे कप्तानी का हक अदा कर दिया था इसका सन्तोष था। जातिवाद का जहर और हिन्दू मुस्लिम की खाई कुछ छणों कई दिनों तक पट चुकी थी।
टेलीविजन सेट पर युवराज और भज्जी के आंसू देखकर केवल पजांब की आंखे नहीं सारे भारत की आंखे नम हो गयी थी। खुशी से।
हर भारतीय जब जाति प्रान्त और धर्म की दीवारें तोड़ कर हिन्दुस्तानी बन गया।
तो ऐसा लगा कि अगर देश प्रेम से ओतप्रोत एक  सौ इक्कीस करोड़ की इस  आबादी को रचनात्मक दिश दे दी जाये तो देश में असम्भव कुछ भी नहीं रह जायेगा। दूसरी तरफ भारत का मस्तक हिमालय की तरह ऊँचा हो जाने पर भी नेता अपनी सोंच से ऊपर नहीं उठ सके। हर मुख्यमंत्री अपनी प्रान्तीय दीवारों में कैद रहा। शीला दीक्षित को विराट कोहली और दिखे। नरेन्द्र मोदी को गुजराती युसुफ पठान और मुनाफ पटेल। बहन जी को सुरेश रैना और ..........। महाराष्ट्रीय चाहवाण को सचिन....। झारखण्ड के रमन सिंह को धोनी उत्तराखण्ड के निशंक को ......। पंजाबी बादल को भज्जी...........।
अपनी सनक को ड्रीम प्रोजेक्ट का नाम देकर अरबों रूपये बरबाद करने वाले कंगालों के पास अगर एक तो भी हर खिलाड़ी को बराबर बराबर बांट जाता लेकिन और उतना ही रुपया मिलता जितना आज मिला लेकिन तब शायद गुजराती, पंजाबी, मराठी,... के खेल से बाहर निकलकर हर खिलाड़ी और ज्यादा गौरववित होता। सोंच के इस घटिया स्तर पर हर राजनैतिक नेता बराबर निकला चाहें वह राष्ट्रवाद की बात करने वाले भाजपाई मोदी है, सर्वजन का मुलम्मा चढ़ाये मायावती, कांग्रेस को भारत का पर्याय मानने वाली शीला या बाकी और मुख्यमंत्री। शर्म है इनकी सोच और समझ पर सारे भारत को हम सबको।
अनुराग अवस्थी 'मार्शल'

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

मार्शल का बाईस्कोप

गरीबी और अमीरी का कन्फ्यूजन

अनुराग अवस्थी 'मार्शल'
भारत ने पाक पर जीत क्या दर्ज की, सारा देश जैसे जवान हो गया। मूंगफली बेचने वाले से लेकर सोनिया, मनमोहन तक सब धोनी-आफरीदी के मुकाबले पर आंखे गड़ाये थे। दुनिया के अरब पतियों की सूची में एक दर्जन भारतीयों के शामिल होने के बावजूद चकटों ने एक चाकलेट तक ईनाम में देने का एलान नहीं किया था। उधर पाकिस्तानियों को देखो, २५-२५ एकड़ जमीन देने का वायदा तो वहां के गवर्नर ने कर रखा था।
इसके अतिरिक्त मैच फिक्स करने पर जान-माल की धमकी भी थी। जो भी वीआईपी मोहाली पहुंचे थे, उनमें से  क्रिकेट से कितनों को प्यार था, देश पर कौन न्योछावर होना चाहता है, इसका थर्मामीटर तो नहीं है। लेकिन सारे देश के टीवी पर आंकें गड़ा देने के बाद स्टेडियम के सहारे लोगों के दिलों में उतर जाने का क्रेज जरूर था।
विजय माल्या से अनिल अम्बानी तक और आमिर से सुनील सेट्टी तक सोनिया से मीरा कुमार तक सब मोहाली में थे। लेकिन कंगलों की तरह। वैसे सचिन और धोनी के पास बहुत कुछ है। क्रिकेट ने उन्हें रुपया, पैसा, नाम, शोहरत, स्टेट्स सब कुछ दिया है। देश के करोड़ों लोगों की भावनायें और आशीर्वाद उनके साथ रहता है। लेकिन हाकी, फुटबाल बहुत से खेल ऐसे हैं कि अगर इनमें से कोई माल्या अपनी एक बोतल का एक ढक्कन खोल दे तो इन खेलों की दशा और दिशा ठीक हो जाये।
हम हिन्दुस्तानी जानते हैं तीन असली मित्र होते हैं-बूढ़ी पत्नी, पुराना कुत्ता और टेंट का पैसा। जवानी में पत्नी को शोपीस और बाकी जहां मौका लग जाये। हमारे एक डाक्टर मित्र ने तो पत्रियां भी कई कर ली हैं ताकि बुढ़ापे में भी एकरसता के नीरज रस के बजाय काकटेल सा मजा मिलता रहे।
इसलिये दानराज कर्ण के देशवासी हम अब कमाओ जोड़ो और इक_ा करो कि पालिसी पर चल रहे हैं। माया-मुलायम तो समझ में आता है। उन्हें पार्टी बननी पड़ती है। इन सब कामों में पैसा लगता है। इसीलिये बेचारे सीबीआई की भी झेल रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट की भी। लेकिन अब हसनअली और बलवा को इतने पैसे का क्या करना था। भगवान न करे यह पैसा भी पावर में बैठे पवारों का निकले।
'सार्इं इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।Ó कबीरदास ने कही थी दो रोटी की भूख के लिये। वक्त बदला, भूख बदली, मीनू बदला, खाने वाला पार्टनर बदला, होटल की टेबिल बदली, बस उसी का नतीजा है कि छत्तीस हजार करोड़ और एक लाख छियत्तर हजार करोड़ रुपये अन्दर हैं लेकिन भूख है कि खत्म ही नहीं हो रही है।
ईट ट्रिंक और बी मैरी पर चलने वाले, बफे और क्लिंटन ट्रस्ट बनाकर करोड़ों डालर सामाजिक कामों में लगाते घूम रहे हैं। कोई खत्म करने के लिये पैसा खर्च कर रहा है तो कोई शिक्षा के लिये।
एक हम हैं जो साफ पानी के लिये सरकार ती तरफ ताक रहे हैं या एनजीओ बनाकर माल साफ कर रहे हैं। ६५ साल होने जा रहे हैं साफ पानी हर आदमी को नहीं मिल पा रहा है, साफ हवा का पता नहीं है। इनमें फैलने वाली बीमारियों को ठीक करने के लिये हम विदेशों में प्रतिबन्धित दवाओं को भी हजम कर जाते हैं, ऐसा शानदार है हमारा हाजमा।
रोटी-कपड़ा और मकान के बजाय फिलहाल हम हवा-पानी ही ठीक कर लें तो ठीक रहेगा। सामान्य प्रदूषण हो या रेडियोएक्टिव संक्रमण हम जहाजों में कूड़ा भरकर बंबई, चेन्नई में उतार रहे हैं।
अवैध घुसपैठियों को देखकर मुझे लगता है भारत एक भारतीय धर्मशाला है, जहां आकर किसी को भी ठहरने, खाने-पीने, गोपनीय स्थल में झांकने, अच्छा लग जाने पर यहीं बस जाने और जब चाहे चले जाने की खुली मौज है।
कभी मुझे ऐसा लगता है कि भारत एक बड़ा कूड़ादान है जहां चीन अपने कैंसर फैलाने वाले खिलैने, अमेरिका, इग्लैंड अपना बचा कूड़ा जहाजों से फेंक सकते हैं।
कभी ऐसा दिखता है भारत लोहे, हीरे, ग्रेनाइट की खानों की एक खान है, जहां विदेशी कम्पनियों को खुले आम खुदाई की छूट है।
कभी ऐसा लगता है भारत भ्रष्टाचार का जिन कांवेट पार्क है। जहां शेर, चीता, हाथी की तरह खादी पहनकर खुलेआम लूटने और चिंघाडऩे की नेताओं को छूट है।
भारत एक प्रयोगशाला है जहां इन्सानों पर रिसर्च और निर्माण के लिये दवाओं का प्रयोग किया जाता है।
भारत एक महासर्कस है जहां मोका मिलते ही कोई जमूरा मूर्तियां लगाने लगता है, कोई चावल बांटने लगता है, तो कोई फ्रिज टीवी की बात करता है।
अपने सहारा श्री को छोड़ दिया जाये तो शायद बाकी धनकुबेरों ने वो तकनीकि इजाद कर ली है, जिससे शायद वो बन्द मु_ी में ऊपर जा सकेंगे।
नीचे तक यह बीमारी महामारी बन गयी है। पैसा निकलेगा तो प्रवचन, भागवत, उर्स, तकरीर के नाम पर । खेल के मैदान, पुस्तकालय, वाचनालय, धर्माथ चिकित्सालय, बृद्धाश्रम, गरीबों के स्कूल नि:शुल्क कोचिंग के लिये किसी गली कूचे के सेठ से लेकर दिल्ली बम्बई के धनकुबेर के पास पैसा और समय नहीं है। क्योंकि धर्म-कर्म के नाम पर आम आदमी भी जल्दी पैसा लुटाता है इसलिये धर्मधारण करने के बजाय माल पैदा करने का साधन बन गया है। नाम की भूख और माइक उन्हें समाज के लिये समर्पित होने के बजाय टीवी कैमरे के प्रति समर्पित कर देता है।
५ अप्रैल
हम ३६४ दिन तो खाते हैं। एक दिन का व्रत रख लीजिये, ५ अप्रैल का। अन्ना के साथ हजारों नहीं करोड़ों लोग हैं। आप भी हो जाइये। भ्रष्टाचार की भूख ऊपर से शुरू होती है फिर नीचे आती है। यह खत्म नीचे से होगी। एक दिन भूखे रहकर। वरना ये नेता पूरा देश खा लेंगे।1