प्रमोद तिवारी
बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान आंदोलन से व्यवस्था परिवर्तन का संकल्प लेकर निकली यात्रा के स्पष्ट संकेत हैं कि तैयारी कमजोर है. बाबा जल्दबाजी में हैं. और गलतफहमी में भी. बाबा को स्वाभिमानी भारत बनाने के लिये स्वाभिमानी भारतीय नागरिकों की ऊर्जावान फौज चाहिए न कि शुगर, ब्लडप्रेशर, कैंसर और हृदय रोग से पीडि़त बीमारों की. निसंदेह बाबा रामदेव आज के दिन पूरे देश में लोकप्रियता के शीर्ष पर हंै. उनका दावा है कि उनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संपर्क में आने के बाद करोड़ों लोग लाभान्वित हुए हैं. उनके शिविरों में अब तक ३ करोड़ लोग आ चुके हैं. और न जाने कितने ही लोगों ने टीवी पर उन्हें देखकर योग सीखा है. वे सब के सब ऋणी हैं. जिसने भी बाबा के तीन प्राणायाम सीख लिए वह उनका मुरीद हो गया. संभव है बाबा सही भी हों. अब अगर टीवी वाले बाबा के अनुयाइयों को छोड़ भी दिया जाये तब भी ये ३ करोड़ लोग कम नहीं है. अगर यह मु_ी तानकर खड़े हो जाएं देश की भ्रष्ट व्यवस्था की चूलें हिल सकती हैं. लेकिन यह तो तब संभव हो जब बाबा के सामने अपार श्रृद्घा से बैठे लोग बीमार देश के भ्रष्ट रक्त संचार के निदान के लिए आये हों. दरअसल बाबा जिन्हें अपना भक्त अनुयाई या ईमानदार लोकतंत्र का सिपाही समझ रहे हैं वे वास्तव में उनके बीमार हैं. वे अपने शारीरिक कष्ट से पीडि़त लोग हैं. ये लोग अपना कष्ट निवारण चाहते हैं न कि देश का. बाबा को लगता है कि उनके शिविरों में उमड़े लोगों से हाथ उठवाकर, वचन भरवाकर, नारे लगवाकर वे दो-चार साल में ही भारत को महाशक्ति बना देंगे. लेकिन वे भूल रहे हैं कि समग्र क्रांति जैसे इतिहास बीमारों से नहीं बनाये जाते. यहां बीमारी से आशय केवल शारीरिक बीमारी से नहीं है.
शरीर तो बाद में बीमार होता है. उसके पहले कर्म, मन और चरित्र बीमार होता है. जो लोग ब्लडप्रेशर, शुगर, कैंसर, गठिया, हृदय रोग लिए बैठे हैं ये आखिर हैं तो इसी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के ही अंग. बाबा के शिविरों में उमडऩे वाली भीड़ों में क्या कर चोर, मिलावट खोर, रिश्वतखोर, जरायम पेशा, स्वार्थी, लोभी और लम्पट लोग नहीं आते? सच्चाई तो यह है कि अधिकांश बीमारों की जड़ में यदि 'योगगुरु' किसी विधान से झांक सकें तो उन्हें नेताओं से पहले अपने ही भक्तों, अनुयाइयों और श्रृद्घालुओं के चाल, चरित्र और चेहरे को ही बदलना पड़ेगा. बाबा राम देव से पहले काशी के करपात्री महाराज जी ने भी एकबार इसीतरह की कोशिश की थी. उस जमाने में टीवी और संचार-प्रचार माध्यमों का इसकदर बोल-बाला नहीं था, सो आम जनमानस उनकी तिलमिलाहट, हड़बड़ाहट और नतीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं धर सका. जबकि बाबा रामदेव के अंतर्राष्ट्रीय योगी रूप-स्वरूप की कोख ही संचार क्रांति है. इसीलिए भारत स्वाभिमान पर सबकी नजर है और इसकी तीखी प्रतिक्रिया हो रही है. करपात्री जी ने राम राज्य परिषद की स्थापना की थी. और बीमार देश की बीमार राजनीति को दुरुस्त करने के लिए चुनाव में अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे. जैसा कि बाबा रामदेव का संकल्प है. इन प्रत्याशियों का वो हश्र हुआ कि धर्म को तत्काल समझ में आ गया कि उसका राजनीति हस्तक्षेप देश को स्वीकार नहीं है. भले ही देश बीमार हो.. लाचार हो.
तो क्या यह समझा जाये कि बाबा की देश के प्रति चिंता, पीड़ा, कर्तव्य और संकल्प का कोई मानी नहीं है. उनका राष्ट्र के प्रति सोच अर्थहीन है. कतई नहीं.. देश की भ्रष्ट व्यवस्था को तो बदलना ही होगा. इसके लिए धर्म गुरुओं, योग गुरुओं और राज गुरुओं को एकजुट होकर जोर लगाना होगा. धर्मगुरु नागरिक आचरण को स्वस्थ्य बनाने का आंदोलन छेड़ें. योगगुरु नागरिक स्वास्थ्य को हष्टपुष्ट बनाने का आंदोलन छेड़ें और राजगुरु स्वस्थ शरीर और स्वस्थ आचरण वाले नागरिकों को राजनीति की बागडोर की दिशा में आगे आने का अवसर दें. बाबा रामदेव ने तो अपनी ताल ठोंक दी है. 'योगगुरुÓ की भूमिका में उन्होंने देश भर में स्वस्थ शरीर के प्रति जबरदस्त जागरुकता पैदा करने में सफलता हासिल भी की है. लेकिन धर्म गुरुओं और राज गुरुओं की उन्होंने अनदेखी कर दी. अनदेखी क्या कर दी एक तरह से उनके विरुद्घ ही डुगडुगी पीट डाली. हाल के दिल्ली, राजस्थान, उत्तरांचल की सभाओं और आस्था चैनल पर बाबा एक ही बात कह रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन को आगे बढ़ाना है. देश को चोर, लुटेरे और डाकुओं से बचाना है. ये चोर, डाकू, लुटेरे कौन हैं? ये वही लोग हैं जो सत्ता पर बारी-बारी से आते-जाते हैं या निरंतर उस पर काबिज रहते हैं. अर्थात नेता, अफसर और ठोंगी धर्माचरणी. फिर तो ये वही चेहरे हुए जो समय-समय पर बाबा के शिविरों में आकर उनकी रौनक बढ़ाते रहे हैं. फिर तो बाबा की जंग अपने चेलों से ही हुई. इसतरह के तमाम विरोधाभाष भी बाबा के आंदोलन के साथ-साथ चल रहे हैं. तभी तो मायावती जैसे उन्नीस-बीस राजनीतिक और अनेक धर्मगुरु बाबा पर गुर्रा रहे हैं. उनका मखौल बना रहे हैं. जब समय है एक ओजस्वी जवानी के जोश को मजबूत किनारों से बांधने का तो उसकी धारा को छितराने की कोशिश की जा रही है. इसतरह लगता है अकेला चना भाड़ फोडऩे निकला है, भाड़ को लगता है कि चने में उसे फोडऩे भर का बारूद भी है. यह सिहरन कम नहीं है.
शरीर तो बाद में बीमार होता है. उसके पहले कर्म, मन और चरित्र बीमार होता है. जो लोग ब्लडप्रेशर, शुगर, कैंसर, गठिया, हृदय रोग लिए बैठे हैं ये आखिर हैं तो इसी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के ही अंग. बाबा के शिविरों में उमडऩे वाली भीड़ों में क्या कर चोर, मिलावट खोर, रिश्वतखोर, जरायम पेशा, स्वार्थी, लोभी और लम्पट लोग नहीं आते? सच्चाई तो यह है कि अधिकांश बीमारों की जड़ में यदि 'योगगुरु' किसी विधान से झांक सकें तो उन्हें नेताओं से पहले अपने ही भक्तों, अनुयाइयों और श्रृद्घालुओं के चाल, चरित्र और चेहरे को ही बदलना पड़ेगा. बाबा राम देव से पहले काशी के करपात्री महाराज जी ने भी एकबार इसीतरह की कोशिश की थी. उस जमाने में टीवी और संचार-प्रचार माध्यमों का इसकदर बोल-बाला नहीं था, सो आम जनमानस उनकी तिलमिलाहट, हड़बड़ाहट और नतीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं धर सका. जबकि बाबा रामदेव के अंतर्राष्ट्रीय योगी रूप-स्वरूप की कोख ही संचार क्रांति है. इसीलिए भारत स्वाभिमान पर सबकी नजर है और इसकी तीखी प्रतिक्रिया हो रही है. करपात्री जी ने राम राज्य परिषद की स्थापना की थी. और बीमार देश की बीमार राजनीति को दुरुस्त करने के लिए चुनाव में अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे. जैसा कि बाबा रामदेव का संकल्प है. इन प्रत्याशियों का वो हश्र हुआ कि धर्म को तत्काल समझ में आ गया कि उसका राजनीति हस्तक्षेप देश को स्वीकार नहीं है. भले ही देश बीमार हो.. लाचार हो.
तो क्या यह समझा जाये कि बाबा की देश के प्रति चिंता, पीड़ा, कर्तव्य और संकल्प का कोई मानी नहीं है. उनकी राष्ट्र के प्रति सोच अर्थहीन है. कतई नहीं.. देश की भ्रष्ट व्यवस्था को तो बदलना ही होगा. इसके लिए धर्म गुरुओं, योग गुरुओं और राज गुरुओं को एकजुट होकर जोर लगाना होगा. धर्मगुरु नागरिक आचरण को स्वस्थ्य बनाने का आंदोलन छेड़ें. योगगुरु नागरिक स्वास्थ्य को हष्टपुष्ट बनाने का आंदोलन छेड़ें और राजगुरु स्वस्थ शरीर और स्वस्थ आचरण वाले नागरिकों को राजनीति की बागडोर की दिशा में आगे आने का अवसर दें. बाबा रामदेव ने तो अपनी ताल ठोंक दी है. 'योगगुरु' की भूमिका में उन्होंने देश भर में स्वस्थ शरीर के प्रति जबरदस्त जागरुकता पैदा करने में सफलता हासिल भी की है. लेकिन धर्म गुरुओं और राज गुरुओं की उन्होंने अनदेखी कर दी. अनदेखी क्या कर दी एक तरह से उनके विरुद्घ ही डुगडुगी पीट डाली. हाल के दिल्ली, राजस्थान, उत्तरांचल की सभाओं और आस्था चैनल पर बाबा एक ही बात कह रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन को आगे बढ़ाना है. देश को चोर, लुटेरे और डाकुओं से बचाना है. ये चोर, डाकू, लुटेरे कौन हैं? ये वही लोग हैं जो सत्ता पर बारी-बारी से आते-जाते हैं या निरंतर उस पर काबिज रहते हैं. अर्थात नेता, अफसर और ठोंगी धर्माचरणी. फिर तो ये वही चेहरे हुए जो समय-समय पर बाबा के शिविरों में आकर उनकी रौनक बढ़ाते रहे हैं. फिर तो बाबा की जंग अपने चेलों से ही हुई. इसतरह के तमाम विरोधाभास भी बाबा के आंदोलन के साथ-साथ चल रहे हैं. तभी तो मायावती जैसे उन्नीस-बीस राजनीतिक और अनेक धर्मगुरु बाबा पर गुर्रा रहे हैं. उनका मखौल बना रहे हैं. जब समय है एक ओजस्वी जवानी के जोश को मजबूत किनारों से बांधने का तो उसकी धारा को छितराने की कोशिश की जा रही है. इसतरह लगता है अकेला चना भाड़ फोडऩे निकला है, भाड़ को लगता है कि चने में उसे फोडऩे भर का बारूद भी है. यह सिहरन कम नहीं है.
बाबा रामदेव की संकल्प यात्रा
बाबा रामदेव धोखे में हैं. उन्हें लग रहा है कि उनके योग शिविरों में उमडऩे वाली भीड़ उनके श्रृद्घालुओं की है, भक्तों की है, अनुयाइयों की है. जबकि ये सबके सब बाबा के 'बीमार' हंै. उन्हें देश की बीमारी की नहीं अपनी बीमारी की फिक्र है. वे योग के पास इसलिए आये हैं क्योंकि रोग उनके पास आ गया है. रोग दूर होते ही वे अपनी-अपनी जीवन चर्या में लौट जाएंगे, जहां चोरी, लूट, डकैती सब है. और इसी भ्रष्ट कीच में वे भी सने हैं. कुछ चाहे... कुछ अनचाहे... अगर ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि ५० लाख की आबादी वाले कानपुर महानगर से व्यवस्था परिवर्तन का संकल्प लेकर निकलने वालों की संख्या केवल एक सैकड़ा के आस-पास ही रही. यह संख्या भी यात्रा के समापन पड़ाव तक पहुंचते-पहंचते अंगुलियों पर गिनी जाने लायक ही रह गई. आयोजकों ने कहा कि मौसम साथ नहीं था. तेज धूप थी. अरे भैया, मौसम साथ होता.. तेज धूप नहीं होती तो देश को बाबा की वाणी में इतना अनुकूलन और छांव का एहसास क्यों होता. वैसे बाबा जो चाह रहे हैं, देश भी वही चाह रहा है. लेकिन देश न बाबा से बनता है और न ही नेताओं से. देश बनता है नागरिकों से. और भारत का नागरिक आज-कल विदेशों में बनता है. यही देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है.

