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मंगलवार, 7 जून 2011

अकेला चना निकला भाड़ फोडऩे



प्रमोद तिवारी

बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान आंदोलन से व्यवस्था परिवर्तन का संकल्प लेकर निकली यात्रा के स्पष्ट संकेत हैं कि तैयारी कमजोर है. बाबा जल्दबाजी में हैं. और गलतफहमी में भी. बाबा को स्वाभिमानी भारत बनाने के लिये स्वाभिमानी भारतीय नागरिकों की ऊर्जावान फौज चाहिए न कि शुगर, ब्लडप्रेशर, कैंसर और हृदय रोग से पीडि़त बीमारों की. निसंदेह बाबा रामदेव आज के दिन पूरे देश में लोकप्रियता के शीर्ष पर हंै. उनका दावा है कि उनके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संपर्क में आने के बाद  करोड़ों लोग लाभान्वित हुए हैं. उनके शिविरों में अब  तक ३ करोड़ लोग आ चुके हैं. और न जाने कितने ही लोगों ने टीवी पर उन्हें देखकर योग सीखा है. वे सब के सब ऋणी हैं. जिसने भी बाबा के तीन प्राणायाम सीख लिए वह उनका मुरीद हो गया.  संभव है बाबा सही भी हों. अब अगर टीवी वाले बाबा के अनुयाइयों को छोड़ भी दिया जाये तब भी ये ३ करोड़ लोग कम नहीं है. अगर यह मु_ी तानकर खड़े हो जाएं देश की भ्रष्ट व्यवस्था की चूलें हिल सकती हैं. लेकिन यह तो तब संभव हो जब बाबा के सामने अपार श्रृद्घा से बैठे लोग  बीमार देश के भ्रष्ट रक्त संचार के निदान के लिए आये हों. दरअसल बाबा जिन्हें अपना भक्त अनुयाई या ईमानदार लोकतंत्र का सिपाही समझ रहे हैं वे वास्तव में उनके बीमार हैं. वे अपने शारीरिक कष्ट से पीडि़त लोग हैं. ये लोग अपना कष्ट निवारण चाहते हैं न कि देश का. बाबा को लगता है कि उनके शिविरों में उमड़े लोगों से हाथ उठवाकर, वचन भरवाकर, नारे लगवाकर वे दो-चार साल में ही भारत को महाशक्ति बना देंगे. लेकिन वे भूल रहे हैं कि समग्र क्रांति जैसे इतिहास बीमारों से नहीं बनाये जाते. यहां बीमारी से आशय केवल शारीरिक बीमारी से नहीं है.
शरीर तो बाद में बीमार होता है. उसके पहले कर्म, मन और चरित्र बीमार होता है. जो लोग ब्लडप्रेशर, शुगर, कैंसर, गठिया, हृदय रोग लिए बैठे हैं ये आखिर हैं तो इसी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के ही अंग. बाबा के शिविरों में उमडऩे वाली भीड़ों में क्या कर चोर, मिलावट खोर, रिश्वतखोर, जरायम पेशा, स्वार्थी, लोभी और लम्पट लोग नहीं आते? सच्चाई तो यह है कि अधिकांश बीमारों की जड़ में यदि 'योगगुरु' किसी विधान से झांक सकें तो उन्हें नेताओं से पहले अपने ही भक्तों, अनुयाइयों और श्रृद्घालुओं के चाल, चरित्र और चेहरे को ही बदलना पड़ेगा. बाबा राम देव से पहले काशी के करपात्री महाराज जी  ने भी एकबार इसीतरह की कोशिश की थी. उस जमाने में टीवी और संचार-प्रचार माध्यमों का इसकदर बोल-बाला नहीं था, सो आम जनमानस उनकी तिलमिलाहट, हड़बड़ाहट और नतीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं धर सका. जबकि बाबा रामदेव के अंतर्राष्ट्रीय योगी रूप-स्वरूप की कोख ही संचार क्रांति है. इसीलिए भारत स्वाभिमान पर सबकी नजर है और इसकी तीखी प्रतिक्रिया हो रही है. करपात्री जी ने राम राज्य परिषद की स्थापना की थी. और बीमार देश की बीमार राजनीति को दुरुस्त करने के लिए चुनाव में अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे. जैसा कि बाबा रामदेव का संकल्प है. इन प्रत्याशियों का वो हश्र हुआ कि धर्म को तत्काल समझ में आ गया कि उसका राजनीति हस्तक्षेप देश को स्वीकार नहीं है. भले ही देश बीमार हो.. लाचार हो.
 तो क्या यह समझा जाये कि बाबा की देश के प्रति चिंता, पीड़ा, कर्तव्य और संकल्प का कोई मानी नहीं है. उनका राष्ट्र के प्रति सोच अर्थहीन है. कतई नहीं.. देश की भ्रष्ट व्यवस्था को तो बदलना ही होगा. इसके लिए धर्म गुरुओं, योग गुरुओं और राज  गुरुओं को एकजुट होकर जोर लगाना होगा. धर्मगुरु नागरिक आचरण को स्वस्थ्य बनाने का आंदोलन छेड़ें. योगगुरु नागरिक स्वास्थ्य को हष्टपुष्ट बनाने का आंदोलन छेड़ें और राजगुरु स्वस्थ शरीर और स्वस्थ आचरण वाले नागरिकों को राजनीति की बागडोर की दिशा में आगे आने का अवसर दें. बाबा रामदेव ने तो अपनी ताल ठोंक दी है. 'योगगुरुÓ की भूमिका में उन्होंने देश भर में स्वस्थ शरीर के प्रति जबरदस्त जागरुकता पैदा करने में सफलता हासिल भी की है. लेकिन धर्म गुरुओं और राज गुरुओं की उन्होंने अनदेखी कर दी. अनदेखी क्या कर दी एक तरह से उनके विरुद्घ ही डुगडुगी पीट डाली. हाल के दिल्ली, राजस्थान, उत्तरांचल की सभाओं और आस्था चैनल पर बाबा एक ही बात कह रहे हैं  कि राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन को आगे बढ़ाना है. देश को चोर, लुटेरे और डाकुओं से बचाना है.  ये चोर, डाकू, लुटेरे कौन हैं? ये वही लोग हैं जो सत्ता पर बारी-बारी से आते-जाते हैं या निरंतर उस पर काबिज रहते हैं. अर्थात नेता, अफसर और ठोंगी धर्माचरणी. फिर तो ये वही चेहरे हुए जो समय-समय पर बाबा के शिविरों में आकर उनकी रौनक बढ़ाते रहे हैं. फिर तो बाबा  की जंग अपने चेलों से ही हुई. इसतरह के तमाम  विरोधाभाष भी बाबा के आंदोलन के साथ-साथ चल रहे हैं. तभी तो मायावती जैसे उन्नीस-बीस राजनीतिक और अनेक धर्मगुरु बाबा पर गुर्रा रहे हैं. उनका मखौल बना रहे हैं.  जब समय है एक ओजस्वी जवानी के जोश को मजबूत किनारों से बांधने का तो उसकी धारा को छितराने की कोशिश की जा रही है. इसतरह लगता है अकेला चना भाड़ फोडऩे निकला है, भाड़ को लगता है कि चने में उसे फोडऩे भर का बारूद भी है. यह सिहरन कम नहीं है.
शरीर तो बाद में बीमार होता है. उसके पहले कर्म, मन और चरित्र बीमार होता है. जो लोग ब्लडप्रेशर, शुगर, कैंसर, गठिया, हृदय रोग लिए बैठे हैं ये आखिर हैं तो इसी भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के ही अंग. बाबा के शिविरों में उमडऩे वाली भीड़ों में क्या कर चोर, मिलावट खोर, रिश्वतखोर, जरायम पेशा, स्वार्थी, लोभी और लम्पट लोग नहीं आते? सच्चाई तो यह है कि अधिकांश बीमारों की जड़ में यदि 'योगगुरु' किसी विधान से झांक सकें तो उन्हें नेताओं से पहले अपने ही भक्तों, अनुयाइयों और श्रृद्घालुओं के चाल, चरित्र और चेहरे को ही बदलना पड़ेगा. बाबा राम देव से पहले काशी के करपात्री महाराज जी  ने भी एकबार इसीतरह की कोशिश की थी. उस जमाने में टीवी और संचार-प्रचार माध्यमों का इसकदर बोल-बाला नहीं था, सो आम जनमानस उनकी तिलमिलाहट, हड़बड़ाहट और नतीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं धर सका. जबकि बाबा रामदेव के अंतर्राष्ट्रीय योगी रूप-स्वरूप की कोख ही संचार क्रांति है. इसीलिए भारत स्वाभिमान पर सबकी नजर है और इसकी तीखी प्रतिक्रिया हो रही है. करपात्री जी ने राम राज्य परिषद की स्थापना की थी. और बीमार देश की बीमार राजनीति को दुरुस्त करने के लिए चुनाव में अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे. जैसा कि बाबा रामदेव का संकल्प है. इन प्रत्याशियों का वो हश्र हुआ कि धर्म को तत्काल समझ में आ गया कि उसका राजनीति हस्तक्षेप देश को स्वीकार नहीं है. भले ही देश बीमार हो.. लाचार हो.
 तो क्या यह समझा जाये कि बाबा की देश के प्रति चिंता, पीड़ा, कर्तव्य और संकल्प का कोई मानी नहीं है. उनकी राष्ट्र के प्रति सोच अर्थहीन है. कतई नहीं.. देश की भ्रष्ट व्यवस्था को तो बदलना ही होगा. इसके लिए धर्म गुरुओं, योग गुरुओं और राज  गुरुओं को एकजुट होकर जोर लगाना होगा. धर्मगुरु नागरिक आचरण को स्वस्थ्य बनाने का आंदोलन छेड़ें. योगगुरु नागरिक स्वास्थ्य को हष्टपुष्ट बनाने का आंदोलन छेड़ें और राजगुरु स्वस्थ शरीर और स्वस्थ आचरण वाले नागरिकों को राजनीति की बागडोर की दिशा में आगे आने का अवसर दें. बाबा रामदेव ने तो अपनी ताल ठोंक दी है. 'योगगुरु' की भूमिका में उन्होंने देश भर में स्वस्थ शरीर के प्रति जबरदस्त जागरुकता पैदा करने में सफलता हासिल भी की है. लेकिन धर्म गुरुओं और राज गुरुओं की उन्होंने अनदेखी कर दी. अनदेखी क्या कर दी एक तरह से उनके विरुद्घ ही डुगडुगी पीट डाली. हाल के दिल्ली, राजस्थान, उत्तरांचल की सभाओं और आस्था चैनल पर बाबा एक ही बात कह रहे हैं  कि राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन को आगे बढ़ाना है. देश को चोर, लुटेरे और डाकुओं से बचाना है.  ये चोर, डाकू, लुटेरे कौन हैं? ये वही लोग हैं जो सत्ता पर बारी-बारी से आते-जाते हैं या निरंतर उस पर काबिज रहते हैं. अर्थात नेता, अफसर और ठोंगी धर्माचरणी. फिर तो ये वही चेहरे हुए जो समय-समय पर बाबा के शिविरों में आकर उनकी रौनक बढ़ाते रहे हैं. फिर तो बाबा  की जंग अपने चेलों से ही हुई. इसतरह के तमाम  विरोधाभास भी बाबा के आंदोलन के साथ-साथ चल रहे हैं. तभी तो मायावती जैसे उन्नीस-बीस राजनीतिक और अनेक धर्मगुरु बाबा पर गुर्रा रहे हैं. उनका मखौल बना रहे हैं.  जब समय है एक ओजस्वी जवानी के जोश को मजबूत किनारों से बांधने का तो उसकी धारा को छितराने की कोशिश की जा रही है. इसतरह लगता है अकेला चना भाड़ फोडऩे निकला है, भाड़ को लगता है कि चने में उसे फोडऩे भर का बारूद भी है. यह सिहरन कम नहीं है.

बाबा रामदेव की संकल्प यात्रा

बाबा रामदेव धोखे में हैं. उन्हें  लग रहा है कि उनके योग शिविरों में उमडऩे वाली भीड़ उनके श्रृद्घालुओं की है, भक्तों की है, अनुयाइयों की है. जबकि ये सबके सब बाबा के 'बीमार' हंै. उन्हें देश की बीमारी की नहीं अपनी बीमारी की फिक्र है. वे योग के पास इसलिए आये हैं क्योंकि रोग उनके पास आ गया है. रोग दूर होते ही वे अपनी-अपनी जीवन चर्या में लौट जाएंगे, जहां चोरी, लूट, डकैती सब है. और इसी भ्रष्ट कीच में वे भी सने हैं. कुछ चाहे... कुछ अनचाहे... अगर ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि  ५० लाख की आबादी वाले कानपुर महानगर से व्यवस्था परिवर्तन  का  संकल्प लेकर निकलने वालों की संख्या केवल एक सैकड़ा के आस-पास ही रही. यह संख्या भी यात्रा के समापन पड़ाव तक पहुंचते-पहंचते अंगुलियों पर गिनी जाने लायक ही रह गई. आयोजकों ने कहा कि मौसम साथ नहीं था. तेज धूप थी. अरे भैया, मौसम साथ होता.. तेज धूप नहीं होती तो देश को बाबा की वाणी में इतना अनुकूलन और छांव का एहसास क्यों होता. वैसे बाबा जो चाह रहे हैं, देश भी वही चाह रहा है. लेकिन देश न बाबा से बनता है और न ही नेताओं से. देश बनता है नागरिकों से. और भारत का नागरिक आज-कल विदेशों में बनता है. यही देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है.

शनिवार, 14 मई 2011

कवर स्टोरी

काकादेव चला कोटा बनने...?
विशेष संवाददाता

इस बार बहस का सेंटर प्वाइंट है काकादेव की मेडिकल कोचिंगों की टूटन। कानपुर और काकादेव आकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों में अस्सी प्रतिशत छात्र इंजीनियरिंग के लिये समर्पित होते हैं। दस प्रतिशत मेडिकल के और शेष दस प्रतिशत में बैंक, सेना, एकाउंट्स, एयरहोस्टेस, इंग्लिश स्पीकिंग आदि के।

काकादेव कोटा की राह पर चल निकला है या फिर एक बार मंडी की ओछी हरकतों और घात प्रतिघात का साक्षी बनने जा रहा है।
यह बहस तेज हो गई है। इस बार बहस के पीछे इंजीनियरिंग कोचिंगों के लम्बे-चौड़े (कुछ असली-कुछ फर्जी) दावे नहीं हैं, छात्रों के हितों को किनारे कर कारपोरेट स्टाइल के कांट्रैक्ट नहीं हैं, एक सर द्वारा दूसरे सर के पैसे मार देने के किस्से नहीं है और नहीं हैं ट्रिपल एईई के आउट पेपर से काकादेव के जुड़ाव के शक की सुई पर।
इस बार बहस का सेंटर प्वाइंट है काकादेव की मेडिकल कोचिंगों की टूटन। कानपुर और काकादेव आकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों में अस्सी प्रतिशत छात्र इंजीनियरिंग के लिये समर्पित होते हैं। दस प्रतिशत मेडिकल के और शेष दस प्रतिशत में बैंक, सेना, एकाउंट्स, एयरहोस्टेस, इंग्लिश स्पीकिंग आदि के।
इसीलिये सर्वाधिक जोड़-तोड़, आपसी प्रतिद्वन्द्विता, उठापटक, रैंकरी की खरीद-फरोख्त, विज्ञापनी चमक-दमक, एडमीशन की कमीशनबाजी भी इंजीनियरिंग कोचिंगों में ज्यादा दिखती है।
तुलनात्मक रूप से देखा जाये तो मेडिकल कोचिंगों में नैतिकता, प्रतिस्पर्धा, छात्रों के प्रति डिवोशन, सफलता के दावे, फीस, सब कुछ लिमिट में दिखता है। ऐसा नहीं है कि इंजीनियरिंग की कोचिंगों में सब व्यापारी या बेईमान भाव से जुटे हैं और ऐसा भी नहीं कि मेडिकल में सब कुछ अच्छा-अच्छा है। इंजीनियरिंग में जहां कुछ रंगे सियारों ने बदनामी का ज्यादा ढोल पीट दिया है वहीं मेडिकल में इक्का-दुक्का होने वाली इस तरह कीघटियापन की हरकतें काफी हद तक तो दबी ही रह जाती हैं।
काकादेव में मेडिकल कोचिंग में सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाम न्यू लाइट है। दो दशक से ज्यादा पुरानी न्यू लाइट कोचिंग के पास जहां उपलब्धियों का पहाड़ है वहीं फर्जी दावों का टोंटा। कोचिंग डायरेक्टर एस.पी. सिंह के आलोचकों की कमी नहीं है। लेकिन उनके विरोधी भी स्वीकार करते हैं कि वे रैंकरों की खरीद-फरोख्त में विश्वास नहीं करते हैं।
२०१० में ही न्यू लाइट का दावा है कि सीपीएमटी में उसके ३५३, बीएचयू में १९, सीबीएसई १७४... आदि छात्र सेलेक्ट हुये थे। इनमें से तीन भानु मौर्या, समग्र अग्रवाल व उदय पी यादव रैंकर थे।
यूं तो काकादेव में मेडिकल की आधा दर्जन और कोचिंग भी हैं। सबकी अपनी विशेषतायें और उपलब्धियां भी।
पैक्टजेम, न्यू स्पीड, सरदेसाई।  इनमें से प्रमुख हैं। अब एक नया नाम इनमें जुड़ा है ब्रेवगार्ड।
यह बाहर से आये बहादुरों का दल नहीं है। ब्रेवगार्ड के आठ महारथी कल तक न्यू लाइट से जुड़े थे। न्यू लाइट की इस टूटन पर काकादेव में चर्चाओं का बाजार भी गर्म है और उम्मीदों का सेन्सेक्स भी। आलोचक, समीक्षक और जानकार इसे न्यू लाइट के लिये बड़ा झटका मान रहे हैं। न्यू लाइट से एक साथ इतने लोगों का निकलना और पास में ही योजनाबद्ध ढंग से कोचिंग में क्लास शुरू कर देने को जहां लोग शेर की मांद में घुसकर चुनौती देना मान रहे हैं, वहीं ब्रेवगार्ड और न्यू लाइट के दोनों पक्ष एक दूसरे की हर गतिविधि पर बारीकी से निगाह रखते हुये सधी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
काकादेव के पुराने अखाड़चियों पर विश्वास करें तो न्यू लाइट इस झटके से उबर आयेगी। उनके अनुसार यहां जितनी भी कोचिंग चल रही हैं, उनमें से अधिकांश कभी न कभी कम या लम्बे समय तक डा. एसपी सिंह के शागिर्द रहे हैं। फिर उन्होंने अपनी कोचिंग खोल ली। इनमें से अधिकांश को अपने भाग्य, मेहनत, प्रचार-प्रसार और रिजल्ट के अनुकूल मार्केट शेयर मिल गया है। लेकिन न्यू लाइट का नम्बर एक सिंघासन आज भी अपराजेय है।
आगे भी यह रहेगा या नहीं यह कोई नहीं जानता, लेकिन पहली बार काकादेव में कोटा की तर्ज पर फैकल्टी की बात शुरू हुई है। कोर्स प्लान, बेस्ट फैकल्टी, डाउट क्लीयरेंस को अपनी स्पेशिलटी बताया जा रहा है।
व्हाट इस मोर इम्र्पाटेन्ट
इंस्टीट्यूट आर फैकल्टी। जैसे स्लोगन छापे जा रहे हैं।
जानकार जानते हैं कि सुदूर राजस्थान में कोटा कभी बन्सल क्लासेज के नाम  पर जाना जाता था। हालांकि एलन्स उनसे भी पुराने अपने को बताते हैं।
दो कमरों में चलने वाली दोनों कोचिंगें आज मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में चल रही हैं। बाद में इन्हीं की फैकल्टी टूट कर रेजोनेन्स, मोशन, वाइब्रेन्ट, कैरियर प्वाइंट बनीं। आज भी वहां एक कोचिंग से बीत-बीस फैकल्टी टूटकर दूसरे में चली जाती हैं। देश के कोने-कोने से अपने बच्चों को लेकर जाने वाले अभिभावक यहां एडमीशन के लिये कोचिंग की बिल्डिंग और विज्ञापन नहीं फैकल्टी ही देखते हैं।
इस नजरिये से देखा जाये तो काकादेव कोटा की राह पर चल निकला है। कोटा में सब कुछ अच्छा नहीं है लेकिन कोचिंग मंडी अगर कोचिंग हब बनने की दिशा में पहला कदम उठाती है तो स्वागत होना ही चाहिये।
क्या है ब्रेवगर्ड 
न्यू लाइट के राजदीप श्रीवास्तव, विजय बहादुर, आशुतोष दुबे, विपिन द्विवेदी, राकेश चौरसिया, डीडी पाण्डे, टीचर्स ने गौरव दुबे और अभय शुक्ला मैनेजर के साथ मिलकर बनाई है ब्रेवगर्ड। नौ साल से बाइस साल तक का अनुभव लिये न्यू लाइट के इन पुराने महारथियों की कसमसाहट और खुलकर कुछ कर दिखाने की तमन्ना ने इन्हें अलग होने को मजबूर किया।
ब्रेवगर्ड में फर्नीचर फिटिंग, जनरेटर सेटिंग और सिटिंग स्टूडेंट के बीच खड़े-खड़े डी.डी. सर कहते हैं, वहां हमें बन्धुआ रहना पड़ता था, आखिर हम टीचर हैं। केवल अन्डरलाइन पोर्शन पढ़ाने से हम खुद ही अनकम्र्फटेबल फील करते थे। अपनी विशेषता पर जोर देते हुये वे कहते हैं हमारे मैनेजर हमारे पार्टनर हैं और हम अलग होने के बावजूद इस सेशन के स्टूडेंट के लिये हमारे दरवाजे खुले हैं। उनका जोर है कि बिल्डिंग, इंस्टीट्यूट और ब्रान्ड नहीं फैकल्टी ही सफलता का रास्ता बनाती है।
जवाब न्यू लाइट का...
हां, मैं अडरलाइन पोर्शन ही पढ़ाने को देता हूं...। स्टूडेंट यहां सेलेक्शन कराने के लिये आया है। उसके अभिभावकों ने हमारे विश्वास पर अपने खून पसीने की कमाई से फीस जमा की है। यह कहना है डा. एस.पी. सिंह का। अपनी बात को समझाते हुये सिंह कहते हैं कि मेरा दावा है एनसीईआरटी की बुक्स से बाहर का एक भी क्वेश्चन पेपर में नहीं आता है। अगर आ जाये तो मैं पहला आदमी हूंगा जो इन पर दावा ठोंक दूंगा।
प्रमाण स्वरूप एम्स के पेपर को दिखाते हैं...हर प्रश्न के आगे बुक के किस पेज पर वह प्रश्न है लिख रखा था। बोले आप देखिये यहां हर समय टीचर की मीटिंग और क्वेश्चन पेपर पर रिसर्च हुआ करती है, पूरी टीम उसके लिये मैंने लगा रखी है। ऐसे में अगर रैलिवेन्ट चीजों के अलावा टीचर अपने सोआफ के लिये पढ़ायेगा तो छात्रों के समय का नुकसान होगा, जो मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा।
फैकल्टी के अलग होने के सवाल पर वे कहते हैं, अच्छा है, कल तक  मेरे साथ थे, खूब तरक्की करें। हां, मैं इस बार    बाहर से अच्छी फैकल्टी बुला रहा हूं और उसको पूरे सेशन के लिये कान्ट्रैक्ट  पर लूंगा।1

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

कवर स्टोरी

व्यवस्था पर मसाले की पीक
मुख्य संवाददाता 
 
अफसरशाही आम नागरिकों से तो उम्मीद करती है कि सभी लोग कानून का पालन करें और न्यायालयों के आदेशों को मानें पर क्या अफसरशाही खुद ऐसा करती है? शायद नहीं। शहर में आजकल खुले आम न्यायालय के आदेशों की वह भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की जा रही है। पर पूरी की पूरी अफसरशाहों की फौज मौन है। सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

सरकार का दावा है हर जगह कानून का राज है। सारी व्यवस्थाएं ठीक हैं। संवैधानिक कानूनों का पालन हो रहा है। न्यायालय सरकार की इस थोथी बयानबाजी से असहमत है। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या न्यायालय की यह असहमत सोच गलत है तो इसका जवाब है बिल्कुल नहीं। दरअसल न्यायालय का तमाम सरकारी दावों पर असहमत होना बिल्कुल सही है जायज है। हालांकि इस असहमति के विचार की जनक पूरी तरह से सरकार नहीं बल्कि काफी हद तक सरकारी मशीनरी है। अफसरशाही आम नागरिकों से तो उम्मीद करती है कि सभी लोग कानून का पालन करें और न्यायालयों के आदेशों को मानें पर क्या अफसरशाही खुद ऐसा कर रही है? शायद नहीं। शहर में आजकल खुले आम न्यायालय के आदेशों की वह भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर पान मसाला बिक रहा है। पर पूरी की पूरी अफसरशाहों की फौज मौन है। सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। १७ फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जी.एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली की पीठ ने पान-मसाला गुटखा के प्लास्टिक पाउचों के सम्बन्ध में एक आदेश जारी किया। इस आदेश के  तहत एक मार्च से पूरे देश में पान-मसाला के पाउचों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। इस प्रतिबन्ध को लागू करने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की थी। आदेश में स्पष्ट था कि बिक्री पर प्रतिबन्ध केवल प्लास्टिक पाउचों पर है। भविष्य में मसाला प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्वीकृति वैकल्पिक पाउचों में ही बेचा जा सकेगा। इस प्रतिबन्धात्मक आदेश के बाद भी शहर में चोरी छिपे प्लास्टिक पाउचों में मसाला की बिक्री जारी रही। उस दौरान कुछ पान-मसाला निर्माताओं ने दफ्ती की डिब्बी में मसाला बेचना शुरू भी किया लेकिन प्रशासन ने उसे भी नहीं बिकने दिया। प्रतिबन्ध लगने के पन्द्रह दिन बाद ही तमाम कम्पनियों ने एल्यूमिनियम लेयर वाले कागजी पाउचों में पान-मसाला पैक कर बेचना शुरू कर दिया। शुरुआत में तो ये पाउच लुका-छिपा कर बेचे गये लेकिन पिछले करीब एक महीने से इन कागजी पाउचों में पान-मसाला खुले आम बिक रहा है। वह भी खुदरा मूल्य से ज्यादा कीमत पर। यानी कि एक साथ दोहरे कानूनों का उल्लंघन हो रहा है। पहला है सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का और दूसरा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का। लेकिन जिले का हर प्रशासनिक अधिकारी एक ही बात कह रहा है कि न तो मसाला बिक्री पर प्रतिबन्ध हटाने का कोई नया अदालती आदेश ही मिला है और न ही मसाला बेचे जाने के बारे में कोई जानकारी ही है।
ये वाकई कमाल की बात है कि जिस शहर में के अधिकांश सरकारी दफ्तरों के भवन पान-मसाले की पीक से रंगे पड़े हों उन्हीं दफ्तरों में जाकर अपना काम करने वाले अधिकारी इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। दरअसल अधिकांश प्रशासनिक अधिकारियों को यह पता है कि शहर में पान-मसाला बेचा जा रहा है वह भी बिना स्वीकृति पाउचों में। पर मामला सर्वोच्च न्यायालय से जुड़ा है इसलिये हर अधिकारी इस बारे में अनभिज्ञता जता कर बस अपना पल्ला झाडऩे की फिराक में है बस। कुछ भी प्रशासनिक अधिकारी इस मामले में कुछ भी तर्क दें पर यह भी सच है कि इस तरह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को न मानने का अपराध तो हो ही रहा है और इसके लिये पाउच बनाने वाले मसाला निर्माता, बेचने वाले दुकानदार, खरीदने वाले उपभोक्ता और सब कुछ देख कर अनदेखा करने वाले शहर के प्रशासनिक अधिकारी सभी दोषी हैं।1

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

कवर स्टोरी

प्रेस क्लबऔर अन्ना इफेक्ट


कहने को तो प्रेस क्लब का अपना एक संविधान है। लेकिन हकीकत यह है कि पूरे के पूरे प्रेस क्लब का इस संविधान से  कोई लेना-देना नहीं है। हर साल प्रेस कांफ्रेंस शुल्क के जरिये  लाखों की कमाई होती है। लेकिन न तो इस कमाई का और न ही किये जाने वाले खर्चों का कोई हिसाब प्रेस क्लब के पास है। और तो और प्रेस क्लब का कोई बैंक एकाउंट ही आज तक खोला गया है। कुल मिलाकर खाता न बही जो कही वो सही की तर्ज पर सारा खेल चल रहा है।

इसे कहते हैं असली अन्ना इफेक्ट जिस इफेक्ट की वजह से कानपुर प्रेस क्लब की निवर्तमान हठीली कमेटी की चूलें तक हिल गयीं और उसे आखिरकार प्रेस क्लब चुनाव की घोषणा करनी ही पड़ी भले खिसियाकर ही सही, और करते  भी क्योंनहीं आखिर उस समय प्रेस क्लब का माहौल भी तो शोले फिल्म जैसा ही हो गया था जब जय और वीरू सूरमा भोपाली के पास जाते हैं और कहते हैं बाकी तो सब ठीक है पर मुँह से ना न निकले और न निकलने पर सूरमा भोपाली की क्या गति होती है यह फिल्म देखने वाले सब लोग बाखूबी जानते ही हैं, बस फिल्म और प्रेस क्लब की हकीकत में मंगलवार के दिन फर्क यह था कि यहाँ जय वीरू भी दो नहीं कई थे और सूरमा भोपालियों का तो पूरा संगठन ही था दो को छोड़ कर तो ऐसे में चुनाव कराने के लिये न कहने का प्रश्न ही नहीं उठता था। अच्छा ही हुआ जो उठा भी नहीं वरना इन नये दिलजले-सिरचढ़े जय वीरूओं का भरोसा भी क्या न जाने सूरमा भोपालियों को क्या-क्या डॉयलाग सुनाते। खैर प्रेस क्लब में जो हुआ शालीनता की सीमा के भीतर ही हुआ जैसा कि पत्रकारिता जैसेपढ़े लिखे पेशे में होना चाहिए। यूं तो प्रेस क्लब के चुनाव को लेकर पिछले काफी समय से खबरनवीसों की जमात में अन्दर चूँ-चपड़ मची ही हुई थी, बस चूँ-चपड़ ही ज्यादा कुछ नहीं। कई बार प्रेस क्लब का चुनाव कराने की बात भी आई लेकिन उसमें होता यह रहा कि जब यह बात अध्यक्ष अनूप बाजपेयी और महामंत्री कुमार से बड़े उम्रदराज लोगों ने उठाई तो उन्हें यह कह कर कि बताओ भाई जी आप भी हमारे खिलाफ, अरे हम तो आप के ही छोटे भाई हैं कह कर मना लिया गया और जब यही बात छोटों ने कही तो उन्हें उनकी औकात बताई गयी। कुल मिलाकर हर बार चुनाव कराने की माँग पर नया पैतरा बदला गया पूरी की पूरी प्रेस क्लब समिति विशेष रूप  से अध्यक्ष और महामन्त्री चुनाव कराने के नाम पर कन्नी ही काटते रहे।
दरअसल प्रेस क्लब चुनाव कराने के लिए इस नये सफल संघर्ष की शुरुआत भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के समर्थन में 'चौथा कोना (जो कि हेलो कानपुर का साफ-साफ दो टूक बात कहने वाला नियमित स्तम्भ है) के नवीन मार्केट में दिये गये धरने के साथ ही हो गयी थी। यह धरना प्रमोद तिवारी की अगुवाई में शहर के तमाम ईमानदार पत्रकारों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के समर्थन में दिया था। इसी धरने के दौरान कुछ युवा पत्रकारों ने एक ऐसा प्रश्न उठा दिया जिसका जवाब देना प्रमोद तिवारी और उनके सहयोगियों के लिये बेहद जरूरी हो गया था।
यह प्रश्न कुछ इस तरह था- 'भइया भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का समर्थन तो कर रहे हैं लेकिन सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार तो प्रेस क्लब में ही हो रहा है। वर्षों से चुनाव नहीं कराये गये हैं। आने वाले पैसों और होने वाले खर्च का कोई हिसाब किताब  नहीं है न कोई कुछ सुनने वाला है न कोई कुछ बताने वाला है। बताइये इसके लिये कौन लड़ेगा?
वास्तव में यह वह जरूरी प्रश्न था जिसका जवाब देना इस धरने में शामिल उन सभी ईमानदार पत्रकारों के लिये उतना ही जरूरी था जितना कि खाना और पीना। इसलिये इस धरने में ही इस प्रश्न का जवाब देते हुये इस भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रेस क्लब की वर्तमान कमेटी को भंग कर चुनाव कराये जाने का अभियान छेड़ दिया गया।
अब इसके बाद चौथा कोना के धरने में पूछे गये सवाल का जवाब देने की बागडोर प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा बनाकर आदित्य द्विवेदी, सौरभ शुक्ल, सरस बाजपेई सहित कई युवा पत्रकारों के हाथों में दी गयी। इसके बाद कई मर्तबा प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनूप बाजपेयी और महामंत्री कुमार को प्रेस क्लब की आम बैठक बुलाकर चुनाव कराने के लिये कहा गया लेकिन किसी के कानों में जूं नहीं रेंगी प्रेस क्लब कमेटी के सारे मेम्बरान युवा पत्रकारों की इस जायज मांग को अनसुना ही करते रहे। युवा पत्रकारों ने बदलाव के लिये अपने पहले अस्त्र के रूप में एसएमएस  अभियान छेड़ कर  पूरे शहर के पत्रकारों को बदलाव के मैसेज भेजे गये। इस दरम्यान मुक्ति मोर्चा के अगुआकार सौरभ शुक्ल ने महामंत्री कुमार से कई बार बिना तनाव के ही चुनाव कराने को कहा लेकिन हर बार महामंत्री ने उन्हें चुनौती पूर्ण ठंग से ललकारा और कहा च्च्उखाड़ लो....जो उखाडऩा होज्ज्। अंतत: प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा ने १७ अप्रैल को शहर के सभी पत्रकारों सहित प्रेस क्लब को भी चुनाव के सवाल पर नगर निगम में वार्ता के लिये आमंत्रित किया बुलाया। इस आमंत्रण पर पूरे शहर के करीबडेढ़ सैकड़ा पत्रकार आये लेकिन प्रेस क्लब समिति की तरफ से केवल सरस बाजपेयी, इरफान और विनय गुप्ता ही मौजूद रहे। मालूम हो कि सरस बाजपेई बदलाव के पक्ष में चल रही मुहिम के भी पक्षधर हैं और प्रेस क्लब के वरिष्ठ मंत्री भी हैं। बाकी सारे पदाधिकारी कन्नी काट गये। प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा की आयोजित यह काल वाकई काफी हंगामादार रही। प्रेस क्लब कमेटी की मनमानी का जमकर विरोध हुआ। जबकि इस बैठक में गैर हाजिर प्रेस क्लब की अवैध हो चुकी समिति के अवैध पदाधिकारी प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा की इस सार्थक बैठक को अवैध तरीके सेअवैध बताकर अपनी खिसियाहट मिटाते रहे। बहाना था कि अगर मीटिंग प्रेस क्लब में होती तो आते नगर निगम में नहीं आयेंगे।
परिवर्तन के हामी पत्रकारों का यह कदम ९ साल से जमी प्रेस क्लब पर काफी भारी पड़ गया। उन्हें भनक लग गई कि इस बार न धमकी चलेगी न प्रार्थना। दरअसल युवा शक्ति ने एक गम्भीर निश्चय कर लिया था जिसकी भनक प्रेस क्लब के रूढ़ी पदाधिकारियों को लग गयी थी। यह निर्णय था 'आमरण अनशनÓ का। सौरभ शुक्ला आमरण अनशन की अनौपचारिक घोषणा कर चुके थे। जैसे-जैसे नगर निगम पत्रकारों का जमाव बढ़ता गया पुरानी कमेटी के पांव उखड़ते गये। अभी बैठक पूरी तरह से शुरू भी हो पाती कि महामंत्री कुमार ने फोन के जरिये एक दिन बाद यानी कि १९ अप्रैल को आम सभा की बैठक करके चुनाव घोषित करने का वायदा कर दिया। इस वादे के साथ यह बैठक स्थगित कर दी गयी। सारे शहर के पत्रकारों के मोबाइल मुक्ति मोर्चा के विजय अभियान के सन्देश से भर गये। जय-जय करते हुये १९ अप्रैल की आम सभा का इन्तजार शुरू हो गया। लेकिन बात यहीं नहीं थमी। प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने आम सभा में पहले १७ अप्रैल को अपनी कार्य समिति की बैठक बुला ली और बैठक में ही १ जुलाई को चुनाव घोषित कर दिया और चुनाव कराने के विधि विधान के बारे में जिम्मेदारियों भी सौंप दी। प्रेस क्लब कार्य समिति की बैठक में प्रेस क्लब कमेटी के चुनाव कराने के लिये हामी भर दी। तय हुआ कि कमेटी भंग कर शहर के सभी अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों से एक-एक पत्रकार को लेकर २३ अप्रैल तक एक ग्यारह सदस्यीय कार्यकारी कमेटी बनाई जायेगी। हर संस्थान के संपादकों से मिलकर ग्यारह सदस्यीय कमेटी बनाने की जिम्मेदारी दो पत्रकारों महेश शर्मा और राजेश नाथ अग्रवाल को सौंपी गयी है।

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

कवर स्टोरी

अहिंसा
परमोधर्म:
भारतीय दर्शन में मनुष्य के लिये काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह ये पाँच महाशत्रु बताये गये हैं जो मनुष्य के भीतर ही रहते हैं और संसार की सभी बुराइयों का मूल हैं। और इन पाँच शत्रुओं में से क्रोधया हिंसा तो मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अगर मनुष्य हिंसा को वश में कर ले उस पर विजय पा ले तो समस्त विश्व में शांति और प्रेम का विस्तार होगा और हर जगह खुशहाली होगी। जैन धर्म में भी इन पाँचों को मनुष्य का शत्रु ही बताया गया है और अहिंसा के सदाविचार पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया गया है जो आज हमारे लिये सबसे बड़ी आवश्यकता है।
समस्त विश्व को शान्ति,अहिंसा प्रेम का ज्ञान देने वाले जैन  धर्म की महत्ता आज इस वैर वैमनस्याता और कलह भरी दुनिया में शान्ति चाहने वाले बखूबी जानते हैं। आज के परिवेश में हमें जैन धर्म के उपदेशों और मान्यताओं की ही परमावश्यकता है जो हमें त्याग और अहिंसा की अनमोल नीति और ज्ञान देता है। जैन धर्म भारत के प्रचीन धर्मों में से ही एक है। ऐतिहासिक तथ्यों को देखने पर पता चलता है कि अगर भारत को विश्वगुरु कहा जाता है तो वह अक्षरश: सत्य ही है। इसकी वजह भी बिल्कुल स्पष्ट है क्योंकि यही वह पुण्य प्रतापी धरती है जहाँ से कई मौलिक और श्रेष्ठ मान्यताएँ, परम्पराएँ और दर्शन निकले जो कालान्तर में इतने ज्यादा प्रभावी और उपयोगी हुए कि धर्म के रूप में स्थापित हो कर सामने आये। वैसे पुरातन हिन्दु ग्रन्थों के अनुसार धर्म का अर्थ है च्धार्यति इति धर्म:ज् जो धारण किया जाय अर्थात जिसका निर्वहन और वहन किया जाय वही धर्म है। भारत की धरती से विश्वशान्ति और समृद्धि के लिये जिन धर्मों का उद्गम हुआ उनमें से एक महत्वपूर्ण और विश्व को शांति का संदेश देन वाला जैन धर्म भी है।
 जैन धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है । च्जैनज् उन्हें कहते हैं  जो च्जिनज् के अनुयायी हों। च्जिनज् शब्द बना है च्जिज् धातु से। च्जिज् माने-जीतना। च्जिनज् माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं च्जिनज्। जैन धर्म अर्थात च्जिनज् भगवान का धर्म। जैन धर्म का परम पवित्र और अनादि मूलमंत्र है-
णमो अरिहंताणं॥
णमो सिद्धाणं॥
णमो आयरियाणं॥
णमो उवज्झायाणं॥
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
एसो पंच णमोकारो॥
सव्व पावपणासणो॥ मंगलाणं च सव्वेसिम॥
पदमं हवई मंगलं॥
अर्थात अरिहंतों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, सर्व साधुओं को नमस्कार। ये पाँच परमेष्ठी हैं।
 जैन मतावलम्बियों का अभिमत है कि जैन धर्म की भगवान महावीर के पूर्व जो परम्परा प्राप्त है, उसके वाचक निगंठ धम्म (निर्ग्रन्थ धर्म), आर्हत् धर्म एवं श्रमण परम्परा रहे हैं। जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ जी के समय तक च्चातुर्याम धम्मज् था। धर्म साधक अत्यन्त ऋजु,प्रज्ञ एवं विज्ञ थे। वे स्त्री को भी परिग्रह के अंतर्गत समझकर बहिद्धादान में उसका अन्तर्भाव करते थे। भगवान महावीर ने छेदोपस्थानीय चारित्र (पाँच महाव्रत, पाँच समितियाँ, तीन गुप्तियाँ) की व्यवस्था की।
जिसमें ब्रह्मचर्य व्रत का अलग से उल्लेख किया है। पूज्यपाद ने महावीर के विभाग-युक्त चारित्र का स्वरूप बताया है। ये विभाग महावीर स्वामी के पहले नहीं थे। जैन धर्म के चौबिस तीर्थंकरों में से महावीर स्वामी का महत्व इस दृष्टि से भी अलग है कि उन्होंने उग्र तपस्या करके संघर्षों को सहज रूप से झेलने का एक मानदंड स्थापित किया तथा आत्मजय की साधना को अपने ही पुरुषार्थ एवं चरित्र से सिद्ध करने की विचारणा को लोकोन्मुख बना कर भारतीय मनीषा को नया आयाम दिया।  महावीर स्वामी का जन्म दिन चैत्र शुकल  त्रयोदशी को महावीर स्वामी जन्म कल्याणक  पर्व के रूप में मनाया जाता है । जैन ग्रन्थों के अनुसार भगवान् महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व (आधुनिक गणना के अनुसार २७ मार्च) चैत्र शुक्ल त्रयोदशी उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र सोमवार कुन्डल पुर (बिहार) में हुया था। पूरे विश्व में जैन धर्मावलम्बी महावीर स्वामी का जन्म दिवस बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।1

रविवार, 10 अप्रैल 2011

कवर स्टोरी

श्री राम
आपदामपहर्तारं दातारां सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्री रामं भूयो-भूयो नमाम्यहम।।
नीलाम्बुज श्यामल कोमलांङ्गम सीतासमारोपितवामभागम।
पाणौमहासायक चारुचापं नमामि रामं रघुवंश नाथम।।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम केवल हिन्दुओं के आराध्य ही नहीं बल्कि स्वयं भारत की अखंड पहचान हैं,भारत और भारतीयों का अस्तित्व हैं। बिना राम के भारत और भारतीयता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। राम भारत के कण कण में बसे हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम मानवता की पहचान हैं। इसीलिये भारतीय परम्पराओं में रामराज्य की बात कही गयी है। जिसके पीछे का सार्थक तर्क यह है कि जहाँ राम का नाम है वहां शुभ, मगंल, सुख, शान्ति, ज्ञान और समृद्धि ही होगी। अमंगल और अशुभ जैसा कुछ भी होगा ही नहीं।

राम महज एक नाम नहीं है बल्कि एक मंत्र है। एक ऐसा मंत्र जो हर भारतीय के हृदय में बसा हुआ है। राम केवल हिन्दुओं के आराध्य ही नहीं हैं बल्कि स्वयं में एक सम्पूर्ण संस्कृति और मानवता को स्वयं में समाये हुये हमारे लिये एक जीवन्त उदाहरण भी हैं। इसीलिये उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। क्योंकि उनका सम्पूर्ण जीवन चरित्र ही समस्त मानव समाज के लिये एक ऐसा उदाहरण है जिसपर चलकर ही विश्व शान्ति और वसुधैव कुटुम्बकम् की पुरातन भारतीय मान्यता और विचार को सार्थक और यथार्थ किया जा सकता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाले नव संवत्सर की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने धरती पर अवतरण किया।
पौराणिक मान्यता के अनुरूप श्री राम का जन्म त्रेतायुग में इक्ष्वाकुवंश में हुआ था। स्वयं मानस में तुलसीदास जी ने इस बात की पुष्टि की है 'नौमी तिथि मधुमास पुनीता, भये प्रकट क्रपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारीÓ। हमारी हिन्दू परम्परा में भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं माना गया है। कहने का मतलब यह है कि हिन्दू परम्परा के अनुसार मनुष्य स्वयं परमपिता परमेश्वर का ही एक अंश है। इसीलिये हिन्दू मान्यताओं में हर देवी-देवताओं का अवतरण दिवस मनुष्यों के जन्म दिवस की ही भांति निश्चित किया गया है और इसके पीछे तमाम सार्थक तर्क भी हिन्दू ग्रन्थों में दिये गये हैं। जैसा कि आधुनिक इतिहासकारों में भी मर्यादा पुरुषोत्तम के जन्म की अवधि को लेकर अभी भी मतैक्य नहीं हो पाया है।
इसकी भी एक वजह है। दरअसल राम स्वयं अनादि हैं अजन्मा हैं। उनका जन्म हुआ ही नहीं। वे तो स्वयं समस्त पृथ्वीवासियों की मनोकामनाओं की परिणित स्वरूप इस धरती पर अवतरित हुए थे। भारतीय पुराणों के अनुसार समय काल की गणना  कल्प के अनुसार होती है।  एक कल्प में १४ मन्वन्तर होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर का अलग मनु होता है। अब तक ६ मन्वन्तर (पहले स्वायम्भुव, दूसरे स्वारोचिष, तीसरे उत्तम, चौथे तामस, पांचवे रैवत और छठवें मनु) वर्तमान में सातवें वैवस्वत मनु का काल चल रहा है। इस काल में भी २६ महायुग समाप्त होने के बाद वर्तमान महायुग के तीन युग समाप्त होकर अब कलयुग चल रहा है। भारतीय पुराणों के अनुसार चार युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग) का एक महायुग होता है। महायुग सौरमान से ४३ लाख २० हजार वर्ष का होता है। एक सहस्त्र महायुगों का एक कल्प होता है। भारतीय मान्यता के अनुसार सृष्टि रचयिता ब्रह्मा का एक दिन एक कल्प का होता है और रात्रि भी एक कल्प की होती है और सात सौ बीस कल्प का ब्राह्मवर्ष माना गया है। इस प्रकार सौ ब्राह्मवर्ष स्वयं ब्रह्मा की आयु मानी गयी है।
भारतीय पौराणिक काल की गणना के अनुसार कलयुग का आरम्भ महाभारत के युद्ध के पश्चात माना जाता है। यानी ईसा से लगभग ३१ सौ वर्ष पहले। इस सम्बन्ध में डा. पुसल्कर  की किताब वैदिक ऐज में वैवस्वत मनु का समय महाभारत से १७ सौ १० वर्ष पूर्व कहा गया है। इतिहासकारों का एक वर्ग पुराणों में इक्ष्वाकुवंश की नामावली को देखकर मिथ्या अनुमान करता है कि राम कृष्ण के बाद हुये थे। अग्निपुराण के २६वें अध्याय में स्पष्ट किया गया है कि राम के पुत्र लव तथा इनके पुत्र पद्म हुये। पद्म के पुत्र ऋतुपर्ण और ऋतुपर्ण के अक्ष्वापाणि हुये। अक्ष्वापाणि के पुत्र शुद्धोधन तथा इनके पुत्र बुद्ध हुये। इस नामावली में केवल प्रमुख राजाओं का ही वर्णन है। बुद्ध का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष से कुछ अधिक पहले हुआ था। हालांकि यह समय काल भी अभी तक विवादित ही है। इस प्रकार राम का आविर्भाव कलयुग में आता है। पुराणों और हिन्दू ग्रन्थों में कृष्ण के देहावसान से कलयुग का प्रादुर्भाव बताया गया है।
इस आधार पर मर्यादा पुरुषोत्तम के आविर्भाव की यह गणना अतार्किक और मित्था ही है।  कुल मिलाकर जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम अजन्मे हैं, अनादि हैं। इसलिये उनके  धरती पर  अवतरण के काल का निर्णय करना इतना सरल नहीं है। इसके पीछे भी एक तर्क है। हिन्दू परम्परा में पूर्वजों का इतिहास लिखने की वैसी परम्परा कभी नहीं रही है जैसा कि वर्तमान में इतिहास लिखा जाता है। जो भी ऐतिहासिक तथ्य वंशावलियां राज्यकाल इत्यादि मिलते भी हैं वो भी पुराणों और प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में कथानक के रूप में ही लिखे गये हैं। इसके पीछे भी एक सार्थक तर्क  हिन्दू परम्परा की यह मान्यता 'बीती ताहि विसार दे आगे की सुधि लेÓ मतलब जो बीत गया है उससे अगर मानवीय, आध्यात्मिक व धार्मिक विकास की कोई सीख मिले तो उसे तो हमें अपने मन-मस्तिष्क में औरों को देने, उसे आगे बढ़ाने के लिये रखना चाहिये।
बाकी सबको भूत समझकर विसार देना चाहिये। सबसे बड़ी बात यह है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने  इस धरती पर कब अवतार लिया यह काम इतिहासकारों का है। उनके अवतरण के सही-सही समय की जानकारी मिल जाने का मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र और उनके लिये हमारी श्रद्धा और महत्ता पर  कोई फर्क न तो अब तक पड़ा है और न ही आगे भी पड़ेगा।
श्री राम अनादिकाल से समस्त भारतीयों के हृदय में वास कर रहे थे, आज भी कर रहे हैं और हमेशा ही निश्चित रूप से करते ही रहेंगे। क्योंकि ऐसी कोई स्थिति है ही नहीं जो राम हमसे अलग हो सकें और हम राम से। यूं तो हिन्दू धर्म में राम से पूर्व और राम के बाद भी तमाम अवतार हुये। लेकिन उन सब में राम का महत्व बिल्कुल अलग है। हिन्दू धर्म में अवतारों की महत्ता का साहित्यिक तरीके से वृत्तांत बताने की परम्परा है।  मजे की बात यह है कि राम कथा ही सभी भारतीय भाषाओं में कही गयी। चाहे वह संस्कृत में आदि कवि बाल्मीकि कृत अखण्ड रामायण हो, तेलगू में बुद्धराज कृत रंगनाथ रामायण हो, उडिय़ा में शारलादास कृत विकंला रामायण हो, कन्नड़ में बत्तलेश्वर कृत तोरबे रामायण हो, गुजराती में भलण कृत रामायण हो,  अवधी में तुलसीदास कृत रामचरित मानस हो या अन्य तमाम भारतीय भाषाओं में लिखी गयी अलग-अलग रामायण काव्य। इसकी वजह सीधी और सपाट है और वह यह कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र ही कुछ इस तरह का है कि उससे ज्यादा आदर्श और मर्यादित इस संसार में और कुछ हो ही नहीं सकता। जो हमें मूल रूप से यही सिखाता है किसत्य मार्ग पर चलते हुये दूसरों के लिये जियो। क्योंकि मानव जीवन समस्त जीवों के कल्याण के लिये ही मिला है।
हिन्दू ग्रन्थों और राम काव्यों के नजरिये से देखा जाये तो मर्यादा पुरुषोत्तम अपने भक्तों के लिये बहुत सरल हैं। अपने नाम से लेकर अपनी मर्यादा सभी में। लेकिन अध्यात्मिकता की कसौटी पर राम अपने आप में सब कुछ समेटे हुये हैं।
शंकर, ब्रह्मा सहित अन्य देवी-देवताओं ने भी समय-समय पर भगवान राम की स्तुति की है। तुलसीदास जी की रामचरित मानस में यह उल्लेख आता है कि शंकर-सती एक बार सीता हरण के बाद आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। नीचे जंगल में माँ सीता की  खोज में भटक रहे श्री राम को देखकर अनायाश ही भगवान शंकर ने पूर्ण श्रद्धा से भगवान राम को प्रणाम किया और उनके हृदय में भाव जगा-'हरि लोचन छवि सिन्धु निहारी, कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारीÓ। साथ चल रही पार्वती को शंका हुई कि शंकर तो जगत के ईश्वर हैं परन्तु उन्होंने नृप सुत को सच्चिदानन्द कहकर प्रणाम क्यों किया। तब भगवान शंकर ने पार्वती को रामकथा का वृत्तांत बताते हुये कहा- 'सोइ मन इष्ट देव रघुवीराÓ। इसके अलावा भी जब श्रीराम लंका पर चढ़ाई करने के लिये समुद्र किनारे पहुंचे तब विद्वानों ने उनसे समुद्र के किनारे शिवलिंग का निर्माण कर विधिवत पूजन करने का उपाय बताया। श्रीराम ने ऐसा ही किया और उस शिवलिंग का नाम रामेश्वर रखा। साथ मौजूद वानर सेना और अन्य लोगों के पूछने पर उन्होंने रामेश्वर का अर्थ बताया- राम के ईश्वर हैं जो, अर्थात शिव। कैलाश पर्वत पर पार्वती के साथ विराजे भगवान शिव से भगवान राम के रामेश्वर नाम का वर्णन सुनकर नहीं रहा गया और उन्होंने पार्वती से कहा कि वास्तव में राम आदर्श हैं और स्वयं भगवान शिव ने पार्वती को रामेश्वर का भावार्थ यह कहकर बताया कि राम ईश्वर हैं जिसके वही रामेश्वर और इसके साथ ही समस्त देवी-देवताओं ने राम द्वारा स्थापित रामेश्वर शिवलिंग पर पुष्पों की वर्षा की।
रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड में वर्णित है कि शंकर पार्वती जी से कहते हैं कि जिसका मन राम के चरणों में अनुरक्त है वही सर्वज्ञ है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है, वही पृथ्वी का भूषण है, पंडित है और दानी है, वही धर्म परायण है। रामभक्ति संजीवनी जड़ी है तथा श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही इसका अनुपान है। इसके मनोरोग नष्ट होते हैं। 'रघुपति भगति सजीवन मूरी, अनुपान श्रद्धा मति पूरी'। जब विमल ज्ञान के जल से प्राणी स्नान कर लेता है तब प्राणी के हृदय में रामभक्ति छा जाती है। राम की भक्ति के बिना सुख नहीं है। 'राम विमुख न जीव सुख पावै' और 'हिम से अनल प्रकट बस खोई, विमुख रामसुख पाव न कोई'। हरि भक्ति बिना संसार रूपी समुद्र से नहीं तरा जा सकता है। यह मानस का अटल सिद्धान्त है। 'बिनु हरि भजन भव तरिअ यह सिद्धान्त अपेल'।
भारत में प्राचीनकाल से ही यह विषय बहस का रहा है कि भक्ति श्रेष्ठ है या ज्ञान। श्रीमद भागवतपुराण में भक्ति को श्रेष्ठ माना गया है। अध्यात्म में स्थिति तथा तत्व ज्ञान द्वारा परमात्मा का नित्य दर्शन हो वही ज्ञान कहा जाता है। तत्व ज्ञानी उद्धव तथा तत्वज्ञान हीन गोपियों का संवाद साहित्य का प्रिय विषय रहा। वहीं रामचरित मानस में भक्ति मार्ग की श्रेष्ठता को महिमा मंडित किया गया है। लेकिन भक्ति और ज्ञान में भेद नहीं किया गया है। भेद वस्तुत: कृतिम है। ज्ञान कहने, समझने में कठिन है तथा साधन करने में भी कठिन है। यदि संयोगवश ज्ञान प्राप्त भी हो जाये तो इसे सुरक्षित रखने में अनेक विघ्न आते रहते हैं। 'कहत कठिन, समुझत कठिन, साधन कठिन विवेकÓ।
मर्यादा पुरुषोत्तम को समझने और उनकी कृपा पाने के लिये ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। बल्कि उनकी कृपा पाने में ज्ञान तो काफी हद तक बाधक ही है। क्योंकि  ज्ञान का आधार बुद्धि जो दोषमुक्त नहीं है जबकि भक्ति का आधार हृदय है। जो दोषमुक्त हो सकता है। यदि हृदय में भक्ति का भाव और वास हो ठीक वैसे ही जैसे कि कबीरदास जी ने अपने दोहे में कहा है कि- 
आठ पहर चौंसठ घड़ी मेरे और न कोय, नैना माहीं तू बसे नींद को ठौर न होय।।
जब भक्त की यह स्थिति हो जाती है तभी वह राम को समझ सकता है। जिसका सीधा सा मतलब है कि राम को समझने के लिये सब कुछ विसारना पड़ता है। क्योंकि जहाँ राम हैं वहाँ और कोई नहीं,और कोई हो ही नहीं सकता। इसी लिये राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं,भगवान हैं जीवन के आधार हैं। जब राम की कृपा मिल जाती है तो उसके बाद फिर कोई अन्य आवश्यकता नहीं रह जाती है।1

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

कवर स्टोरी

जय जिनेन्द्र ॐ  नमोंकार
मुख्य संवाददाता


भारतीय संस्कृतिमें जैन धर्म का अपना एक विशेष महत्व है। युगों युगों से समूचे विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले जैन धर्म का आधार है सत्य अहिंसा और प्रेम। आज के आधुनिक परिवेश में समूचा विश्व जब ईष्र्या,अंतरकलह और आपसी झगड़ों की आग में जल रहा है उस समय इन तमाम दुखों से निजात पाने के लिये जैन धर्म के यही आधार मूल विचारों के अनुपालन की बेहद जरूरत है यही विचार हमें सही मायने में परमशान्ति की अनमोल धरोहर दे सकते हैं और हम आपस में मिल कर भाई-चारे के साथ रह कर अपना भविष्य और जीवन संवार सकते हैं।

पवित्र पावन गंगा नदी के तट पर स्थित उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगर कानपुर के आनन्दपुरी स्थित नवीन  जिनालय में २४ वर्षों के लम्बेइंतजार के बाद श्री १००८ श्री मज्जिनेन्द्र जिनबिम्ब पंचकल्याण प्रतिष्ठा एवं गजरथ महोत्सव सहित विश्वशान्ति महायज्ञ के साथ तीर्थकर श्री आदिनाथ जी एवं श्री शान्तिनाथ भगवान की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा रविवार ०६ मार्च से प्रारम्भ हो कर शनिवार १२ मार्च तक परमपूज्य दिगम्बराचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज के संसथ आर्शीवाद से परमपूज्य अध्यात्मिक संत वास्तु विशेषज्ञ, जिन मन्दिर जीर्णोद्वारक मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी महाराज एवं संघस्थ क्षल्लक द्वय महाराज के ससंघ सानिध्य में संघस्थ बाल ब्रह्मचारी संजय भैया के साथ सम्पन्न हुआ।
 नमोकार, जय जिनेन्द्र व जय महावीर स्वामी के पुण्य मंत्रों के साथ उच्चारण के साथ  जैन मतावलम्बियों व भक्तजनों ने आनन्दपुरी का पूरा माहौल ही भक्तिमय बना दिया। पूरे धार्मिक अनुष्ठान के दौरान एकदम से बदल गये पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण को सहज ही महसूस किया जा सकता था। जनरलगंज दिगम्बर जैन बड़ा मन्दिर से पूजा अर्चना और  नमोंकार के यशस्वी उद्घोष के साथ निकली घट यात्रा में शहर और दूर-दराज से आये हजारों श्रद्धालु शामिल हुये। जय जिनेन्द्र जय महावीर स्वामी के जयकारे के साथ जैन भक्तों ने मंगल घट यात्रा निकाली। केसरिया वस्त्र और सिर पर कलश लिये भक्तों के समूह से शोभायात्रा की शोभा और भी बढ़ती नजर आयी। नयागंज, घंटाघर, टाटमिल होते हुये मंगल घट शोभा यात्रा आनन्दपुरी स्थित जिनालय के पास बनी अयोध्यानगरी पहुंची। यहां पहुंचने पर मंगल घट यात्रा का भक्तों ने बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। मंगल घट यात्रा के साथ चल रहे सजे-धजे हाथियों की कतारें शोभा यात्रा की शोभा में चार चांद लगा रही थी।
 आनन्दपुरी अयोध्यानगरी में पहुंच कर मंगल घट यात्रा ने पहला पड़ाव डाला। जैन धर्म में अयोध्या नगरी का विशेष महत्व है क्योंकि जैन मान्यतानुसार भगवान आदिनाथ ने अयोध्या के महाराज नामिराज के घर जन्म लिया था। इसी मान्यतानुसार जैन भक्तों ने आनन्दपुरी महाशान्ति यज्ञ स्थल में भव्य अयोध्यानगरी का निर्माण किया।
घट यात्रा के अनन्दपुरी अयोध्या नगरी पहुंचने के बाद पाण्डाल शुद्घि, मण्डप मण्डल शुद्घि, मण्डप मण्डल प्रतिष्ठा मंगल घटक, दिग्बंधन, पात्र शुद्घि सरलीकरण, इन्द्र प्रतिष्ठा, नादी विधान अभिषेक शन्तिधारा मंगल कलश शान्ति कलश दीपक स्यापन और धार्मिक निर्देशानुसार सम्पन्न किया गया। पाश्र्वनपाथ स्तुति और शास्त्र सभा के बाद शाम को पाश्र्वगायिका अनुराधा पौंडवाल की भजन संध्या का कार्यक्रम रखा गया जिसमें भगवान के  भजनों ने रसास्वादन किया। पंच कल्याण उत्सव के दूसरे दिन जैन संस्कार गर्मकल्याण की धार्मिक किया सम्पन्न हई जिसमें नित्यमह अभिषेक शान्तिधारा पूजन, श्री शान्ति नाथ महामण्डल विधान, और फिर अयोध्या नगरी से नवीन मन्दिर तक घट यात्रा निकाली गयी, नवीन मन्दिर में वेदी शिखर शुद्घि, वेद शिखर प्रतिष्ठा, शुद्घि संस्कार के पश्चात माता की गोदभराई  सीमांतनी गर्भकल्याणक, नामिराम दरबार का सोलह स्वप्न दर्शन का फलोदेेश नीत नृत्य माता की सेवा, छरवन कुमारियों द्वारा माला का भेंट समर्पण आदि का मंचन किया गया।
पंचकल्याण के तीसरे दिन दैनिक नित्य कर्म पूजन के पश्चात यागमण्डल विधान पूजन क्रिया सम्पन्न करने के बाद गर्भकल्याणक पूर्वरूप, सौधर्म इन्द्रसभा, तत्व चर्चा, धनपति कुबेर, द्वारा अयोध्यानगरी पर रत्न वृष्टि, माता की सेवा सोलह स्वप्न के साथ ही गर्भ कल्याणक की आन्तरिक क्रियाओं को धार्मिक मंचन किया गया।
पंचकल्याणक के चौथे दिन मंगलघटक नित्यमह अभिषेक शान्तिधारा पूजन के पश्चात तीर्थ कर बालक का जन्म और जन्मोत्सव पर बधाई अयोध्या नगरी मैतीन प्रदक्षिण शचि का गर्भ ग्रह में प्रवेश, सहत्र नेत्र दिव्य दर्शन, ऐरावत हाथीपर अदि कुमार को पाण्डुक शिला की ओर ले जाना, पाण्डशिला पर तीर्थंकर बालक का १००८ कलशों से जन्माभिषेक बालक आदि कुमार का पालना झूलाना बाल क्रीड़ा के मनोहारी दृश्यों का धार्मिक मंचन किया गया।
पंचकल्याण महोत्सव के पांचवे दिन दैनिक नित्य पूजा कर्म के बाद महाराजा नाभिराय का राजदरबार, राज्याभिषेक भेंट समर्पण, राज्य संचालन, ब्राह्मी सुन्दरी को शिक्षा नीलांजना नृत्य, आदि कुमार को वैराग्य भरत बाहुबली को राज्य सौंपना लोक तांत्रिक देवों  द्वारा अनुशंशा, वैराग्य स्तुति, वैराग्यमय दृश्य, का वैराग्यपद उपदेश दिव्य देशना का धार्मिक मंचन किया गया।
पंच कल्याण महोत्सव के छठवें दिन दैनिक नित्य कर्म पूजा कर्मकाण्ड के बाद नवप्रभात की नई किरण के साथ भगवान आदिनाथ की कैलाश पर्वत से निर्वाण प्राप्ति भगवान के अवशेषों का विषर्जन, सिद्घ गुणारोपण, सिद्घ पूजन, मोक्षकल्याण पूजन एवं विश्वशान्ति के महायज्ञ पूजन के धार्मिक मंचन के बाद जिनबिम्ब स्थापना कलशरोहण व ध्वजारोहण के बाद श्री १००८ जितेन्द्र भगवान की स्थापना की गई तथा गजरथ महोत्सव मनाया गया। और शाम को नवीन जिनालय में सैकड़ो भक्तों ने भगवान की आरती की।
पंचकल्याणक महोत्सव के सातवें दिन दैनिक नित्य कर्म धार्मिक अनुष्ठान के बाद मंगलाष्टक दिगबंधन रक्षामंत्र ज्ञान कल्याणक की अन्तरंग कियाओं का प्रारम्भ श्री जी की स्थापना मंत्राराधना, आघिवासिनी, तिलकदान,  मुखोद्घाटन, नेत्रोन्मीलन प्राण प्रतिष्ठा,सूरिमंत्र कवलो ज्ञानोत्पत्ति भव्य सयोशरण में दिव्य देशना, तत्व चर्चा तत्पश्चात ज्ञानकल्याणक पूजन जिनबिम्ब स्थापना मुनि श्री की दिव्य देशना के धार्मिक अनुष्ठान के बाद शाम को आरती प्रवचन के साथ जिनायल के पंचकल्याण धार्मिक अनुष्ठान का समापन किया गया। पंचकल्याण धार्मिक अनुष्ठान के पश्चात आनन्दपुरी जिनायल को भक्तों के दर्शनलाभ के लिए पूर्ववत खोल दिया गया।1

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

कवर स्टोरी

पाउच को वनवास


मुख्य संवाददाता
व्यापारी तो यहां तक कह रहे हैं कि यह प्रतिबन्ध देश की अर्थ व्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित करेगा। इस मौके पर तमाम व्यापारी नेता भी इन उद्यमियों की सहानुभूति बटोरने में लगे हैं और सरकार से इस मामले में कुछ राहत देने की मांग कर रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जी.एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली की पीठ ने १७ फरवरी को दिये गये अपने अन्तिम फैसले में पूरे देश में पान-मसाला, गुटखा और तम्बाकू के अन्य उत्पादों के प्लास्टिक पाउच में बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबन्ध लगाने का आदेश दिया है. सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद व्यापारियों खास कर तम्बाकू गुटखा, पान-मसाला और पैकेजिंग उद्योग से जुड़े उद्यमियों के बीच काफी हो हल्ला मचा हुआ है। व्यापारी कह रहे हैं कि इस प्रतिबन्ध से पान-मसाला और पैकेजिंग उद्योग पूरी तरह से चौपट हो जायेगा और इन उद्योगों  में लगे लाखों कामगारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जायेगा। बेरोजगारी से अपराध भी बढ़ेंगे और साथ इन उद्योगों से होने वाले सैकड़ों करोड़ रुपये राजस्व का नुकसान भी केन्द्र और प्रदेश सरकारों को होगा। जिससे देश भर में चलने वाले विकास कार्यक्रम भी प्रभावित होंगे। इतना ही नहीं बहुत से व्यापारी तो यहां तक कह रहे हैं कि यह प्रतिबन्ध देश की अर्थ व्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित करेगा। इस मौके पर तमाम व्यापारी नेता भी इन उद्यमियों की सहानुभूति बटोरने में लगे हैं और सरकार से इस मामले में कुछ राहत देने की मांग कर रहे हैं।
कानपुर किराना व्यापारी नेता अवधेश बाजपेयी के मुताबिक इस प्रतिबन्ध से सुपाड़ी, कत्था, इलाइची, लौंग, केसर, पिपरमेंट से जुड़े व्यापारी बुरी तरह से प्रभावित होंगे क्योंकि इनकी कुल बिक्री की अस्सी प्रतिशत खपत पान-मसाला उद्योग को ही होती है। और पान-मसाला की कुल बिक्री का लगभग नब्बे प्रतिशत से ज्यादा पाउच पैकिंग में ही बिकता है. जहां तक प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के पर्यावरण और स्वास्थ्य के नजरिये का है तो दोनों नजरियों के लिहाज से सिगरेट और बीड़ी दोनों पान-मसाला से ज्यादा खतरनाक हैं.  इन पर भी प्रतिबन्ध लगना चाहिये केवल मसाले के पाउच पर ही नहीं.
वहीं पैकेजिंग उद्योग से जुड़े कपूर पैकेजर्स और क्वालिटी लैमिनेटर्स सहित अन्य उद्यमियों का कहना है कि कानपुर में पैकेजिंग का काम करने वाले पैकेजर्स टिके ही हैं मसाला पाउच की पैकिंग पर। ऐसे में मसाले के पाउच पर प्रतिबन्ध लगने से पैकेजिंग का उद्योग पूरी तरह से समाप्त हो जायेगा क्योंकि फिलहाल इसकी पैकिंग का कोई भी विकल्प उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं पैकेजिंग उद्योग पर छाये इस संकट से इस काम में लगे हजारों कामगार भी बेरोजगार हो जायेंगे। इसके अलावा जो सबसे बड़ा संकट है वह यह है कि अभी भी अधिकांश पैकेजर्स के पास लाखों रुपये का पैकिंग पाउच रखा है जो इस प्रतिबन्ध के बाद बेकार हो गया है। लाखों रुपये की यह चोट हमीं पैकेजर्स को ही सहनी पड़ेगी।
दरअसल पान-मसाला और पैकेजिंग उद्योग से जुड़े व्यापारी जिस तरह से अपनी परेशानी और चिन्ता बता या जता रहे हैं वह पूरी सच्ची है नहीं। जहां तक बात है पान-मसाला उद्योग के चौपट होने की तो सर्वोच्च न्यायालय ने इन उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया बस इनके प्लास्टिक पाउच की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाया है और इससे पहले भी पान-मसाला बिना पाउच पैकिंग के बिकता रहा है। अब जहां तक बात है कि पैकेजिंग उद्योग की तो पाउच बिक्री पर ०७ दिसम्बर २०१० को प्रतिबन्ध लगाने के समय कोर्ट ने पैकेजर्स को उन्हीं से प्राप्त स्टाक और खपत के आंकड़ों के आधार पर ही इस दौरान कोई अन्य विकल्प तलाशने और मौजूदा स्टाक को पूरी तरह खपाने के लिये पर्याप्त करीब दो माह का समय भी दिया था। लेकिन इस दौरान न तो मसाला उद्यमियों ने और न ही पैकेजर्स ने इस ओर ध्यान दिया और न ही दिसम्बर में दिये गये इस प्रतिबन्ध के आदेश को गम्भीरता से लिया।
शायद इसकी वजह अकूत दौलत और मुनाफे वाले इस उद्योग के उद्यमियों की यह ऐंठू सोच ही थी कि ऐन-केन प्रकारेण यह फैसला बदल जायेगा। लेकिन आम आदमी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का हितैषी होने का प्रमाण देते हुये सर्वोच्च न्यायालय की इस पीठ ने राम जेठ मलानी, पी.एच. पारिख, अभिषेक सिंहवी जैसे धुरंधर अधिवक्ताओं की दलीलों के बाद भी अपना सही फैसला आखिर तक नहीं बदला।
यह पहला मौका नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से प्लास्टिक की पैकिंग व प्लास्टिक के उत्पादों पर प्रतिबन्ध लगाया गया हो और व्यापारियों ने खुद के चौपट होने की दुहाई दी हो। इससे पहले देशी शराब के पाउच पर प्रतिबन्ध लग चुका है। इसके अलावा चुनाव प्रचार में प्लास्टिक के झण्डों, बैनरों और होर्डिंग पर भी इस तरह का प्रतिबन्ध लग चुका है। ऐसा नहीं कि देशी शराब के पाउच पर प्रतिबन्ध होने से शराब पाउच के पैकेजर्स के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया हो या देशी शराब बिकनी बन्द हो गयी हो या फिर पालीथिन से निर्मित चुनाव प्रचार सामग्री पर प्रतिबन्ध लगने से सामग्री बनाने वाले बर्बाद हो गये हों या चुनावों में प्रचार सामग्री का इस्तेमाल होना बन्द हो गया। हो सब कुछ पहले की ही तरह चल रहा है। पाउच की जगह देशी शराब शीशी बोतल में बिक रही है और चुनाव प्रचार में नेता जी अब पालीथिन की बजाय कागज और कपड़ों के झण्डों, बैनरों में छापे जाने लगे हैं। न तो कुछ बदला न बदहाल हुआ अगर कुछ हुआ तो यह कि एक माध्यम की जगह दूसरे वैकल्पिक माध्यम ने ले ली। न्यायालय भी तो यही कह रहा है कि प्लास्टिक पाउच की जगह दूसरा विकल्प तलाशो और ऐसा भी नहीं कि दूसरे विकल्प मौजूद ही न हों।
पैकेजिंग उद्योग से जुड़े अहमदाबाद के उद्यमी दीपक सिंधवी का कहना है कि मसाला पाउच के विकल्प के रूप में उन्होंने नया प्लास्टिक मैटेरियल बनाया है जो कि इकोफ्रेन्डली होने के साथ-साथ पूर्ण रूप से रिसाइकिल किया जा सकता है। इसको रिसाइकिल करने पर हमें इसका ९५ प्रतिशत कार्बन और बाकी का आक्सीजन और नान टाक्सिक बायोमास के रूप में वापस मिल जायेगा। इस वैकल्पिक मैटेरियल में मक्के और अन्य खाद्य पदार्थों से प्राप्त प्राकृतिक फाइबर इस्तेमाल किया गया है। दीपक के इस नये मैटेरियल को इंडियन इंस्टीट्यूट आफ पैकेजिंग मुम्बई ने मान्यता देने के साथ ही इसे पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित बताया है।
ऐसे में सीधी सी बात यह है कि इस प्रतिबन्ध को लेकर हो-हल्ला मचाने और आसमान सर पर उठाने की बजाय विकल्पों की तलाश की जाये तो ज्यादा बेहतर है। इससे मसाला और पैकेजिंग उद्योगों का स्थायित्व भी बरकरार रहेगा और सर्वोच्च न्यायालय का मान भी।1

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

कवर स्टोरी - ' दौरे का दौर '

माया की दौड़ से अफसरशाही को दौरा
मुख्य संवाददाता

इस बार पहले से ही यह माहौल बन गया है कि यह दौरे चुनाव के मद्दे नजर किये जा रहे है। चार साल तक बहज जी क्या करती रहीं? यह प्रश्न हर चार लोगों के बीच हर चौराहे और चाय की दुकान पर चर्चा का विषय बना है। रही सही कसर शशांक शेखर, फतेहबहादुर और नेतराम की तिकड़ी पूरी किये दे रही है।

उडऩ खटोले पर सवार बहन जी जब कानपुर से उड़ गयी तो चर्चा में केवल एक बात की थी कि 'सारे घर में बदल डालूंगी लेकिन छह घंटे बाद जब फैक्स आये तो पता चला कि बहन जी के देखने-कहने,अधिकारी के नोट करने और फिर लखनऊ से उसका आदेश बनने के बीच और भी बहुत कुछ हो जाता है। मतलब हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और।
एक फरवरी से बहज जी के बहुप्रचारित दौरे का आठ फरवरी तक कानपुर में पहला चरण पूरा हो गया। बहन जी के इस बार यह दौरे वह धमक बनाने में कायमाब नहीं हो रहे हैं  जिसके लिए वे जाने जाते थे।  पूर्व निर्धारित इन दौरों को औचक निरीक्षण का नाम देकर निलम्बन बर्खास्तगी और स्थानान्तरण की चाबुक चला कर जहां वह ब्यूरोक्रेसी  को और ज्यादा दुम हिलाऊ बना लेती थीं। वहीं इस बार पहले से ही यह माहौल बन गया है कि यह दौरे चुनाव के मद्दे नजर किये जा रहे है। चार साल तक बहज जी क्या करती रहीं? यह प्रश्न हर चार लोगों के बीच हर चौराहे और चाय की दुकान पर चर्चा का विषय बना है। रही सही कसर शशांक शेखर, फतेहबहादुर और
नेतराम की तिकड़ी पूरी किये दे रही है। दौरे के वास्ते दिखने और दौरे के बाद गाज गिरने वालों की सूची में फेरबदल का ऐसा जाल तैयार होता है जिसमें सब कुछ प्रायोजित और पहले से तय का माहौल बन रहा है। मुकेश मेश्राम, पी.वी. सिंह, ओ.एन.सिंह, प्रहलाद सिंह, मुत्तू स्वामी, रामस्वरूप.... जैसे कुछ नामों को बहन जी की कार्यशैली पर कसकर देख लिया जाये तो शायद आगे चलकर यह दौरे विवादों के जनक, भ्रष्टाचार के कारण पूर्वाग्रह से ग्रसित और जातिवादी  शतरंज पर मोहरों की उठापटक से ज्यादा कुछ नहीं माने जायेंगे। जो मुलायम सिंह आज यह कह रहे हैं कि 'बहन जी दिन भर टी वी देखती हैं और रुपये गिनती है  उन्हें शायद कल और भी मसाला मिल जाये। कानपुर में अगर कुछ गड़बड़ था विकास कार्य अधूरे थे सी एम की सिक्योर्टी टाइट नहीं थी, क्राइम कन्ट्रोल नहीं है, या अधिकारियों का पर्यवेक्षण शिथिल है इसलिए कमिश्नर अमित घोष दोषी  है, लेकिन डी एम मुकेश मेश्राम क्यों नहीं? कानपुर में पिछले एक सालों में बढ़े क्राइम को अगर पैमाना बनाया जाये और आई जी विजय कुमार से लेकर डी आई जी अशोक मुत्था जैन जिम्मेदार हंै, और इनका स्थानान्तरण कर दिया जाये तो पी.पी.सिंह का क्या होना चाहिए, जिन्होने दिव्या काण्ड में खुले आम सच्चाई को दबाकर निर्दाेषों को झूठ बन्दकर फर्जी गुडवर्क दिखाकर  मीडिया को अपनी हनक का शिकार बनाकर पूरी सरकार की छवि को धक्का पहुंचा दिया। नीलम काण्ड से लगाकर दर्जनों घटनाओं में उन्होंने न केवल अपने वरिष्ठ अधिकारी के नाते मिले वैधानिक अधिकारों का दुरूपयोग किया बल्कि घटिया जातिवादी टिप्पणियां खूले आम कर माया सरकार को बदनाम किया। मुत्तुस्वामी जहां जायेगा जिला बर्बाद कर देगा तो पी.पी. सिंह जहां जायेगा क्या करेगा?
सजारी गांव के  फ्लैट सही नहीं बने थे, ऊपरी मंजिल पर पानी नहीं पहुंच रहा है या केडीए ने कानपुर को बर्बाद कर दिया है तो वो ओ.एन.सिंह जो मात्र १५ दिन पूर्व आये थे जिम्मेदार हैं तो उन रामस्वरूप का क्या किया जाये जो ढाई साल तक केडीए को लूटते रहे?
मुस्तफा की लगाई एक-एक सील खोलकर नगर के नियोजित विकास का अन्तिम संस्कार कर गये। जानकारों और प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो बहन जी के सामने नाम रामस्वरूप का नोट करने को कहा गया लेकिन फैक्स ओ.एन.सिंह का आ गया।
भग्गीनिवादा में रातोंरात बनी सी.सी.रोड नाली, शौचालय कुछ भी बहन जी की नजरों से नहीं बचा उनकी मुखमुद्रा और नाराजगी की गाज एस.डी.एम. प्रहलाद सिंह पर गिरनी तय मानी जा रही थी। फैक्स आया तो वे पाक साफ थे। अगर मान भी लिया जाये कि अपनी ऊंची पहुंच सीधी पहचान के बल पर स्वयं के तहसील मुख्यालय पर निवास करने छापा निरीक्षण जांच नियमित करने आदि के चलते बच गये तो फिर बीडीओ को क्यों छोड़ा गया?
सीडीओ को दौरे के चौबीस घंटे बाद केवल नगर देहात में इन्टरचेंज का क्या मतलब? वास्तविकता तो यह है कि अगर कानपुर नगर के एक दर्जन अम्बेडकर गांवों को देख लिया जाये तो चन्डाली, चीतामऊ (बिल्हौर) कुरौली (ककवन) गोविन्दपुर (शिवराजपुर) हृदयपुर  (चौबेपुर) घाटमपुर को छोड़ दिया जाये तो शेष गांवों में बगैर नाक बन्द करे नहीं खड़ा हुआ जा सकता है। इन गांवों में भी हैलीपैड से लगाकर थोड़े से हिस्से को चमाचम कर दिया गया था। ठीक वैसे ही जैसे टीवी के मरीज को लिपिस्टिक पावडर लगाकर टनाटन दिखा दिया जाये। अम्बेदकर गांवों के अलावा तो किसी गांव में प्रशासन के पास झाकनें का भी वक्त नहीं है।
यह असलियत तब देखने को मिल रही है, जब छह माह पहले ही फरवरी में उनका कार्यक्रम तय हो गया था। पिछले छह माह से प्रशासन को अम्बेदकर गांवों के अलावा कुछ याद नहीं है। एक पैर से खड़ा होकर वह गांवों को चमचमाने में लगा है। तहसील अस्पताल ब्लाक स्कूल तो उसी हफ्ते ठीक कराये गये। रंगरोगन, फाइलें कबाड़ हटाना....। शायद इसलिये क्योंकि इससे ज्यादा समय तक इन्हे ठीक रखा ही नहीं जा सकता था।
लेकिन मुख्यमंत्री की अगुवानी में आला अफसरानों ने जो भी फौरी व्यवस्थायें करीं वो महज सरकारी धन की बर्बादी ही तो थीं। अम्बेडकर ग्राम सम्र्पक मार्ग के लिये आनन-फानन में बनायी गयी सड़क ने तो मुख्यमंत्री के गांव से पलटते ही दम तोड़ दिया।अगर उनका काफिला एक बार फिर इसी सड़क से गुजर जाता तो इस सड़क में जबरन भरे गये गड्ढों से वो भी रू-ब-रू हो जातीं।
इससे पहले बस्ती मण्डल के दौरे में आयुक्त अनिल कुमार को केवल इसलिये निलम्बित कर दिया गया क्योंकि अंतिम समय तक सीएम का कार्यक्रम डिस्क्लोज नहीं किया गया था कि वे मुख्यालय पर उतरेंगी या चालीस किलोमीटर दूर गांव में जब वे गांव में उतरी तो अनिल कुमार अगवानी के लिए मौजूद नहीं थे। बस फिर क्या था उनकी ईमानदारी, जनसामान्य के लिए हर समय सहज-सुलभता सब कुछ खाक हो गयी, और वे प्रतीक्षा सूची में डाल दिये गये।1

शनिवार, 29 जनवरी 2011

कवर स्टोरी

यही है गणतंत्र...?
मुख्य संवाददाता

किसी भी देश के लिए उसका  संविधान ही उसकी असली पहचान होता है और उस देश के लोगों के लिए उनका अपना संविधान ही असली राष्ट्रीय धर्म होता है जिसे हर देशवासी को धारण करना होता है अपने जीवन में उतारना होता है. सनातनी सूक्ति के अनुसार भी धर्म की यही मान्यता है.

इस बरस हम अपना ६२वां गणतन्त्र दिवस मना रहे हैं. ६२  वर्षों का सफर थोड़ा नहीं होता है इतने वर्षों के सफर में बच्चे जवान हो जाते हैं जवान बूढ़े और बूढ़े  जन्नतनसीं हो जाते है और इस बीच में नयी पीढ़ी  भी जन्म लेकर बूढ़ी होने को हो आती है. २६ जनवरी १९५० में  देश के गणतन्त्र घोषित होन के बाद से ले कर अब तक के इस  लम्बे सफर के बावजूद सही मायने में देश गणतन्त्र की असल परिभाषा से अभी भी दूर ही है.
दरअसल छोटी-छोटी रियासतों में बंटे हिदुस्तान को एक-एक कर व्यवस्थित राज्यवार सूत्र में पिरोने के महत्वाकांक्षी उद्देश्य की पूर्ति और देश में नव संविधान  की स्थापना की खुशी में हमने २६ जनवरी १९५० को पहला गणतन्त्र दिवस मनाया था. इसी दिन भारत के प्रथम राष्ट्रपति  राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पद की  शपथ ली थी. इसी वर्ष  से २६ जनवरी को गणतन्त्र दिवस के रूप में  मनाने की घोषणा की थी. देश सेवा की शपथ इस दिन केवल प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने ही नहीं  ली थी बल्कि हिन्दुस्तान के समूचे आवाम ने ही ली थी. २६ जनवरी को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाने की घोषणा भी अकेले राष्ट्रपति ने ही नहीं  की थी हिन्दुस्तान की समूची आवाम ने ही की थी. तब से लेकर आज हम गणतन्त्र दिवस मना रहे हैं. देश ने १९५०  या कहें आजादी वर्ष १९४७ से लेकर आज तक कई मंजर देखे हैं कई अच्छे बुरे दौरों से गुजर कर     आज अजीब से दो राहे पर खड़ा है आये  दिन होने वाली जनतन्त्र विरोधी घटनाओं को देख कर लगता है कि देश के भीतर ही संविधान का माहौल बनाया जा रहा है. वहीं  संविधान जिसे हासिल करने  की   खुशी में हमने गणतन्त दिवस को राष्ट्रीय त्यौहार की तरह मनाने के लिये एक स्वर  में स्वीकृति दी थी उसको माना था.राजनेताओं से लेकर अफसर शाही और हर ऊंची पहुंच वाला व्यक्ति संविधान निर्माण के बाद से लेकर अब तक संविधान को अपने अपने निजी स्वार्थी और लाभ की खातिर अपने तरीके से जोडऩे तोडऩे और बदलने में जुटा हुआ है.
दरअसल किसी भी देश के लिए उसका  संविधान ही उसकी असली पहचान होता है और उस देश के लोगों के लिए उनका अपना संविधान ही असली राष्ट्रीय धर्म होता है जिसे हर देशवासी को धारण करना होता है   अपने जीवन में उतारना होता है. सनातनी सूक्ति के अनुसार भी धर्म की यही मान्यता है.
'धार्यति इति धर्म: इसका मतलब ही यह है कि मजहब और सम्प्रदाय संविधान के बाद में कोई और लेकिन अफसोस इस बात का है कि मुल्क को आजाद होने के ६४ वर्षों बाद भी हम अपने बीच से क्षेत्रवाद, सम्प्रदायवाद, भाष्यवाद, नक्सलवाद, और  न जाने कितनी ऐसी बुराइयां जो देश के लोगों को आपस में ही बांट कर देश की अस्मिता और अखण्डता के लिए खतरा पैदा कर रही है को अपने बीच से नहीं मिटा पा रहे हैं. अगर यह कहा जाय कि पिछले लम्बे अर्से से हम गणतन्त्र दिवस के दिन गणतन्त्र उत्सव मनाने की महज औपचारिकता ही पूरी कर रहे हैं या महज एक लकीर हो पीट रहे है तो गलत नहीं होगा. इतने दिन गुजर जाने के बाद भी आज भी राजनेता राज्यों की सीमाओं के झगड़े,नदी के पानी के झगड़ों से ले कर न जाने कितने छोटे-मोटे झगड़ों में देश की आवाम को उलझाये हुये हैं. वह भी नितान्त अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थों  की वजह से अगर हमें वास्तव में गणतन्त्र मनाना है तो हमें एक बार फिर एक साथ खड़े हो कर ठीक २६ जनवरी १९५०  की तरह ही एक बार फिर अपने संविधान की इज्जत करने और उसका अक्षरश: अनुसरण करने की न केवल सौगन्ध खानी होगी बल्कि उसे निभाना होगा अपने जीवन में उतारना होगा. और यह सब अभी से करना होगा क्योंकि जागने के लिए कभी देर नहीं होती है जब जागो तभी सवेरा होता है और जब हम इस नये सवेरे को नई सुबह को अपने बीच में लायेंगे तभी असल मायनों में पूरे मन से सच्चा गणतन्त्र दिवस मना पायेंगे. आज हमारे लिये जो सबसे जरूरी सोच है वह है जय हिन्द की सोच.1