चौथा कोना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चौथा कोना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 11 जुलाई 2011

चौथा कोना

रखैल बना लिया प्रेस क्लब को

क जुलाई बीत गई और कानपुर प्रेस क्लब का चुनाव फिर नहीं हुआ. अब इस शहर के पत्रकारों को चाहे वह खूंटा गांड़ कर प्रेस क्लब में जमे हुए लोग हों या उन्हें उखाडऩे के लिये आसमान में तने हुए लोग हों, किसी तरह की सामाजिक, न्यायिक और मानवीय नैतिकता की बात करने का कोई अधिकार नहीं बनता है. मैं भी अब हड़ चुका हूं. कानपुर प्रेस क्लब के चुनाव के सम्बन्ध में अपने उदगार व्यक्त कर-करके नाक कटाकर भ्रष्टा खाने वालों की जमात में कन्नौज की इत्र फुरैहरी लेकर आखिर कोई कब तक घूमेगा.
     इस बार जिस तरह से चुनाव घोषित करने के बाद पलटी मारी गयी है यह इस बात का प्रमाण है कि कानपुर के इतिहास की सर्वाधिक भ्रष्ट और बेशर्म कार्यकारिणी यही है. जो लोग आज ये हरकत कर रहे हैं इन्हें शायद यह नहीं मालूम कि प्रेस क्लब का भी एक इतिहास लिखा जायेगा. और जब पचास वर्षों में पांच कार्यकारिणियों के बड़े-बड़े पत्रकारों की चर्चा होगी तो आने वाली पीढिय़ां सभी को आला दर्जे का चोर कहेंगी. हो सकता है कि मैं भी न बच पाऊं. मुझे भी इस संस्था से जुडऩे का इनाम मिले? पूरा शहर देख रहा है. पूरा शहर जान रहा है. एक तरह से हंस रहा है. बावजूद इसके खुद को प्रेस क्लब का ओहदेदार बताने में किसी को शर्म नहीं आ रही है. ये तो रही उनकी बात जो आसन जमाये बैठे हैं. अब उनको क्या कहें जो चुनाव-चुनाव का शोर खूब मचाते हैं लेकिन संवैधानिक चुनाव की प्रक्रिया और रास्तों की तरफ बढऩे में बार-बार मुंह के बल औंधे हो जाते हैं. ये वो लोग हैं जो शीलू को न्याय दिलाते हैं, कविता को न्याय दिलाते हैं, दिव्या के लिये अखबार को तलवार बना देते हैं,  लेकिन अपने और अपनी जमात के अधिकारों के बलात हरण पर मिमियाया करते हैं. मुझे मेरे ही एक अनुज ने बताया कि चुनाव तो हो जाते लेकिन पुराने दिग्गजों ने नये क्रान्तिकारियों को यह समझाया कि अगर इस तरह चुनाव हो गये तो बड़ी मुश्किल से प्रमोद तिवारी को प्रेस क्लब से बाहर कर पाये हैं वो फिर जिन्दा हो जायेंगे.  मुझे समझ में ही नहीं आ रहा है कि मैं मर कब गया था. मेरा एक शेर है-
'चलिये चलें वहां जहां अपना शुमार हो,
पत्थर के शहर में नहीं होगा निबाह और.'   
मुझे लगा कि जिस प्रेस क्लब को सजाने और पत्रकार पुरम जैसी आवासीय योजना को अमल में लाने के बदले मेरी पीठ ठोकी जानी चाहिये थी उस पर खंजर उतारे गये, ऐसे लोगों के साथ क्याजीना, क्यामरना? जब प्रजा आपको राजा मानती ही नहीं है तो राजा बना रहने का मतलब क्याहै? लेकिन जिन्हें षडय़ंत्र से ही सब कुछ हासिल होता है वो प्रजा चाहे या न चाहे, किसी भी कीमत पर सत्ताधीश बने ही रहना चाहते हैं चाहे इसके लिये उन्हें अपना शीश कुत्ते के सामने ही क्यों न झुकाना पड़े.
अब सवाल यह जरूर उठता है कि जब आपको कोई मतलब ही नहीं है तो आप परेशान क्यों हैं? परेशान इसलिये हूं कि दुनिया की हर अनीति पर अपनी राय रखने और टीका-टिप्पणी करने की रोटी खाता हूं. परेशान इसलिये हूं कि जब कोई पत्रकार मारा जाता है तो यह प्रेस क्लब बजाय उसके लिये लडऩे के उलटा उसे नकली, दोयम दर्जे का और छुटभैया कहकर भगा देता है. परेशान इसलिये हूं कि प्रेस मालिकों में आपसी प्रतिस्पर्धा इस कदर है कि पत्रकार एक तरह से न सोच सकते हैं न लिख सकते हैं. कम से कम प्रेस क्लब ऐसा मंच हो सकता है जहां से कर्मशील पत्रकार अपने अधिकार, सुरक्षा और न्याय की आवाज बिना किसी दबाव के उठा सकते हैं, जिसे फिलहाल शहर के चन्द पत्रकारों ने अपनी बपौती मान लिया है और उसका उपयोग वे अपनी रखैल की तरह करते हैं.1
  प्रमोद तिवारी

चौथा कोना

'पत्रकार' मधुमक्खी का  छत्ता है, शहद की बोतल नहीं

कानपुर में डीआईजी प्रेम प्रकाश ने जब जागरण समूह के मालिकानों पर अमर्यादित हमला किया था उस व$क्त कई पत्रकार दोस्तों ने मुझसे पूछा था कि अगर आप उस समय मौके पर होते तो क्या करते...? वैसे तो यह कोई सवाल नहीं, फिर भी अगर मैं मौके पर होता तो मुझे डीआईजी को यह नहीं बताना पड़ता कि मैं कौन हूं..., पहली बात! वह मुझे उसी दिन से जानता जिस दिन से कानपुर के चार्ज पर होता. अगर पहले से परिचय होता तो पैदा हुई गलत$फहमी आसानी से दूर हो जाती. और अगर डीआईजी की मंशा ही हमलावर होती तो मैं दस मिनट के अन्दर पूरे शहर के मीडिया को मौके पर इक_ा (Ikaththa) कर लेता, फिर देखता... कौन दोषी पुलिस वालों को बचा पाता...? खुद मायावती भी चाहकर कुछ न कर पातीं. मनोज राजन ने वही किया जो मेरा जवाब था. वह भी चाहता तो सबसे पहले अपने चैनल के आकाओं को फोन करता. अपनी और शलभ की इज्जत और जान की $िफक्र करता. लेकिन नहीं, उसने वही किया जो एक जुझारू पत्रकार को करना चाहिये. उसने अपनी 'ताकत' को आवाज दी. पत्रकार की ताकत उसके अफसर नहीं उसकी कलम और कैमरा होता है.
अपने पत्रकार दोस्तों को आवाज दी. फलस्वरूप पलक झपकते राजधानी को समूची पत्रकार बिरादरी सड़क पर उतर आई. इसके बाद क्या हुआ...सबको पता है. 'वर्दीधारी गुंडे' निलम्बित हुए. सरकार ने पहली बार सार्वजनिक रूप से पत्रकारों के उत्पीडऩ को बर्दाश्त न करने का अल्टीमेटम दिया. $जरा सोचिए अगर पत्रकारों ने सड़क छाप दबाव न बनाया होता, सारे चैनल तत्काल चीखने न लगते तो क्या होता...?
ये दोनों शलभ और मनोज उकड़ू बने हजरतगंज थाने में रात काटते और सुबह जमानत के लिये घर परिवार वाले दौड़ते-भागते...परेशान होते. यह तब होता जब कोई विशेष साजिश न होती. मुझे तो शक है कि शलभ और मनोज उसी दवा माफिया के निशाने पर आ चुके हैं जिन्होंने सिल-सिलेवार तीन डाक्टरों का आसानी से कत्ल कर दिया. तीनों कत्लों में अफसरशाही और सत्ताशाही की संलिप्तता किसी से नहीं छुपी है. तीन शूटर अंदर है तीन डाक्टर मारे जा चुके हैं और दो मंत्रियों की कुर्सी जा चुकी है. यानी नौकरशाही, सत्ता और अपराधी तीनों एक साथ एक ही नाव पर. और नाव भी वो जो भ्रष्टाचार की नदी में हिचकोले मार रही हो. इन माफियाओं को डर है कि राजधानी की इस 'जय-वीरू' की जोड़ी के पास दवा के घपले से लेकर डा. सचान की हत्या तक की छानबीन में ऐसे-ऐसे तथ्य, साक्ष्य और सबूत मौजूद हो सकते हैं जो इस खूनी श्रंखला की आखिरी कड़ी साबित हो. और यह आखिरी कड़ी उस चेहरे को बेनकाब कर दे जो जनता के सामने अफसर, मंत्री या परम समाजसेवी के रूप में आदरणीय है...?
राजधानी लखनऊ में अपराधियों, सत्ताधारियों और नौकरशाही में कितना मजबूत गठजोड़ है इसका पर्दाफाश हो चुका है. एक के बाद एक तीन डाक्टर मारे गये, कोई शक. तीनों हत्याओं की घटनाओं को लीपापोता गया, कोई शक. तीनों शूटर भाड़े और विश्वास पर बुलाये गये, कोई शक. नहीं न, फिर हम यह शक क्यों न करें कि कल राजधानी में आईबीएन-७ के शलभमणि त्रिपाठी और मनोज राजन त्रिपाठी की हत्या का कुचक्र भी रचा गया हो सकता है.
अंत में अपनी ही बात दोहरा रहा हूं. मीडिया मालिक शहद की बोतल होते है लेकिन मीडिया मधुमक्खियों का छत्ता होता है माई डियर सिस्टर.1
प्रमोद तिवारी

सोमवार, 27 जून 2011

चौथा कोना

चुनाव से भागे 'चोर'

आदरणीय लोकेश शुक्ल के पुत्र युवा पत्रकार रितेष शुक्ल के शुभ विवाह में कानपुर के पत्रकारों का अच्छा खासा जमाव था. जब अखबार वाले होंगे तो अखबारों और पत्रकारों की ही चर्चा होगी. तो शुरू हो गई प्रेस क्लब की चर्चा. मैंने सौरभ शुक्ला से पूछा- १ जुलाई को चुनाव है न...! अरे कहां भैया, सब फिर टांय...टांय फिस्स हुआ जा रहा है. कह दिया गया है चुनाव नहीं होंगे. सौरभ का यह जवाब मुझे चौकाने वाला था और कानपुर के जिम्मेदार पत्रकारों को धिक्कारने वाला भी. प्रेस क्लब की मौजूदा कार्यकारिणी अगर अब भी चुनाव टालकर नवीन मार्केट में बनी रहना चाहती है तो लगता है परिवर्तन और संवैधानिकता चाहने वालों को सड़क पर उतरना होगा.
 पिछली बार जब अन्ना जी के समर्थन में मैं तम्बू लगाकर प्रेस क्लब के नीचे बैठा तो युवा पत्रकारों ने मेरे धरने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उसी धरने से मुहिम चली और घनघोर दबाव में प्रेस क्लब के महामंत्री कुमार ने १ जुलाई को चुनाव कराने की घोषणा कर दी. इसके बाद पत्रकारों के बीच आपसी क्या राजनीति हुई मुझे नहीं पता लेकिन इतना अवश्य पता है कि परिवर्तन की अगुवाई कर रहे नये पत्रकारों को डराकर, बरगलाकर, फुसलाकर, रिरियाकर खामोश रहने को राजी कर लिया गया है.
शर्म आनी चाहिये ऐसे लोगों को जो खुद को पत्रकार कहते हैं और एक असंवैधानिक, भ्रष्ट और अराजक संस्था के साथ सार्वजनिक रूप से व्यभिचार करते हैं. १० साल बाद भी अगर चुनाव कराने में दग रही है. तो इसका मतलब है इस पूरे गिरोह ने जमकर भ्रष्टाचार किया है. १० बरस तक लाखों रुपये आये-गये और प्रेस क्लब जैसी संस्था के पास बैंक एकाउंट नहीं है. एक बूढ़ा अन्ना पूरे देश से भ्रष्टाचार मिटाने को मरा जा रहा है और यहां की जवान पत्रकारिता भ्रष्टाचारियों से डरकर किसी पिल्ले की तरह या कूं-कूं कर रही है या दुम हिलाती है. लगता नहीं कि ये गणेश शंकर विद्यार्थी की नगरी है.

आमरण अनशन पर बैठने की तैयारी
परिवर्तन चाहने वाले पत्रकारों ने प्रेस क्लब चुनाव की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठने की ठानी है. अनशनकारियों की मांग होगी-
स्न जिला प्रशासन के हस्तक्षेप और देख-रेख में प्रेस क्लबचुनाव.
स्न पिछले दस साल का पाई-पाई का हिसाब.
स्न हिसाब न देने पर जांच और उचित कार्रवाई हो.
चैनलों पर लोकल सेंसरशिप
उत्तर प्रदेश में इस समय मीडिया पर सरकार का पूरा दबाव है. यहां कानपुर में पिछले दिनों शहर के तीन-चौथाई हिस्से में अचानक 'सहारा समय' का प्रसारण गायब हो गया. पता किया तो सूत्रों ने बताया कि लखनऊ के आदेश पर स्थानीय प्रशासन ने केबल आपरेटर को डंडा दिखा दिया है- 'सहारा समय' कहीं नजर नहीं आना चाहिये. और सहारा गायब. स्थानीय सहारा समय कार्यालय से उनके चैनल के गायब होने के बारे में पूछा तो सूत्रों की जानकारी की पुष्टि हुई. बताया गया कि सहारा समय पर अघोषित सेंसर इसलिये लागू था कि चैनल कांग्रेसी व्यापारी संजीव दीक्षित के मामले में ऐसा पर्दाफाश जिसके बाद यह कहना बहुत आसान हो जाता कि संजीव दीक्षित को सरकार के इशारे पर साजिशन फंसाया गया है. चैनल के पास इस बात के पक्के सबूत थे. इधर पिछले हफ्ते कानपुर में 'आईबीएन-७' का अता-पता नहीं चला. अभी राष्ट्रीय चैनल के स्थानीय प्रतिनिधि संयोगवश एक समारोह में मिले तो चर्चा का विषय यही राष्ट्रीय चैनलों का स्थानीय अपहरण ही रहा. 'आईबीएन-७' के अवरुद्ध या छुपे-छुपे प्रसारण की वजह का हम कानपुर के पत्रकार कुछ कयास ही लगाते कि शलभ और मनोज पर सार्वजनिक रूप से भरे बाजार में किसी फिल्म गुण्डे की तरह दो पुलिस अफसरों का दौड़ा-दौड़ाकर हमलावर होना बताया गया कि डा. सचान की आत्महत्या को आत्महत्या न मानकर दोनों मीडिया मैनों ने अपनी 'हत्या' का सामान जुटा लिया है। शलभ और मनोज राजन ने जब अपनी तथ्यपरक विश्लेषणात्मक पत्रकारिता से टीवी स्क्रीन पर यह साबित कर दिया कि डा. सचान की आत्महत्या झूठ है, सच तो हत्या और हत्यारों के बीच कहीं गुम है तो सरकार बौखला गई और इसी बौखलाहट में उसके 'दो गुण्डों' ने शलभ और मनोज को ठिकाने लगाने की ठान ली. मैंने घटना की अगली भोर मनोज और शलभ से बात की दोनों अपनी मुट्ठी भींचे हुये हैं. अच्छा लगा न वे हताश हैं, न निराश हैं, न डरे-सहमे हैं बल्कि अब और प्रतिबद्धता के साथ सच कहने को आकुल हैं. लेकिन अभी भी इन दोनों पत्रकारों की जान खतरे में है. क्योंकि डा. सचान कांड का असली नायक अभी भी अपनी चालें चल रहा है. जेल में मौते इसका प्रमाण हैं.1
प्रमोद तिवारी

शनिवार, 18 जून 2011

चौथा कोना

 लादेन की पुत्रवधू को बीवी बना दिया

मै न्यूज़24 का नियमित दर्शक हूँ और चैनल के कुछ पत्रकारों से भी मेरी दोस्ती है. यूज़24 पर गलतियाँ होते रहती है. लेकिन इस बार ब्लंडर हुआ है. आश्चर्य है कि इस ब्लंडर को किसी ने नहीं पकड़ा और दो बार कार्यक्रम को उसी ब्लंडर के साथ चलाया गया.
बहरहाल आपको कार्यक्रम में हुए ब्लंडर के बारे में बतलाते हैं. न्यूज़24 ने ओसामा बिन लादेन और उसकी बीवियों से संबंधित स्पेशल रिपोर्ट चलायी. स्टोरी की हेडिंग कुछ इस तरह से थी -
स्न हम तुम एक कमरे में बंद थे
स्न और चाभी खो गयी .
स्न प्रोमो और स्लग का अंदाज कुछ ऐसा था -
स्न जब लौटता था लादेन
स्न किसी भी लड़ाई से
स्न तो बंद हो जाता था कमरे में
स्न अपनी बीवी के साथ ..........
यहाँ तक तो सब ठीक था. लेकिन ओसामा बिन लादेन के साथ उसकी बीवी के तौर पर जिस महिला की तस्वीर लगायी गयी थी वह दरअसल ओसामा बिन लादेन की बीवी की तस्वीर नहीं है. यह गलत तस्वीर बाकायदा आधे घंटे तक दिखाई गयी.
ओसामा की तस्वीर के साथ न्यूज़24 के महान प्रोड्यूसर ने किसी दूसरी महिला की तस्वीर लगा दी. यह महिला कोई और नहीं ओसामा बिन लादेन के बेटे 'ओमर लादेन' की ब्रिटिश पत्नी जेन फेलिक्स ब्राउन है. इस नाते वो ओसामा बिन लादेन की पुत्रवधू हुई. लेकिन न्यूज़24 के प्रोड्यूसरों ने पुत्रवधू को बीवी में तब्दील कर दिया और धड़ल्ले से कार्यक्रम को चलाते रहे. पहले 9
बजे प्राईम टाइम में कार्यक्रम चला. फिर इसका रिपीट टेलीकास्ट दूसरे दिन 3.30 बजे किया गया.
लेकिन दो बार कार्यक्रम दिखाने के बावजूद किसी ने इस ब्लंडर को नहीं पकड़ा. एक दर्शक के नाते मुझे न्यूज़24 की इस हालत पर अफ़सोस भी हो रहा है
और तरस भी आ रहा है. मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि सुनील झा जैसे लोग जिन्हें अनुराधा प्रसाद ने चैनल की कमान सौंप रखी है वो क्या कर रहे हैं?
न्यूज़24 पर गलतियाँ पर गलतियाँ हो रही है और जिनकी जि़म्मेदारी बनती है उनके कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही.1
हरि शंकर शाही

शनिवार, 14 मई 2011

चौथा कोना

लबड़-सबड़ नही चलने वाला...

कानपुर प्रेस क्लब के चुनाव तब तक साफ-सुथरे ढंग से नहीं होंगे जब तक 'चुनाव प्रक्रिया' तटस्थ और न्याय का मान रखने वालों के हाथो नहीं होगी। ९ बरस बाद चुनाव को राजी हुई प्रेस क्लब कमेटी इन दिनों काफी राहत महसूस कर रही होगी। क्योंकि परिवर्तन पर आमादा प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा ने आगामी चुनाव प्रक्रिया में पुरानी कमेटी के पदाधिकारियों और कार्यकारिणी के सदस्यों को शामिल करने में अपनी सहमति जता दी। यह सहमति इस बात का संकेत है कि प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा में भी ऐसे लोग प्रभावी हैं जो गैर संवैधानिक पुरानी कमेटी के वफादार हैं। प्रेस क्लब मुक्ति मोर्चा के अगुवाकारों में से एक ने पिछले पिछले अंक का चौथा कोना पढ़कर एक वरिष्ठ पत्रकार से कहा- 'चुनाव अधिकारी कवीन्द्र कुमार तो तटस्थ हैं।' अब बताइये मुक्ति मोर्चा का अगुवाकार भ्रम में है। उसे पुरानी कमेटी के सबसे वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य तटस्थ लग रहे हैं। महोदय यह भूल गये हैं कि उनके तटस्थ चुनाव अधिकारी ने गत चुनाव में उन पत्रकारों को प्रेस क्लब की सदस्यता से वंचित करवा दिया था जो किसी समाचार पत्र में नौकरी नहीं कर रहे थे। प्रमोद तिवारी, दिलीप शुक्ला, धीरेन्द्र अवस्थी जैसे पत्रकार प्रेस क्लब के लायक नहीं थे। अब कोई इन अगुवाकारों से पूछे कि कवीन्द्र कुमार जी आज-कल किस अखबार में हैं...? इलेक्ट्रानिक मीडिया के   लोगों को प्रेस क्लब वाले पत्रकार मानते नहीं। इस तरह कवीन्द्र कुमार तो अपने ही बनाये षडय़ंत्री नियम के तहत प्रेस क्लब के सदस्य भी नहीं रहने वाले। फिर कवीन्द्र कुमार  को किस आधार पर चुनाव अधिकारी बना दिया गया और अगर बना भी दिया तो किसके मत से। किसकी सहमति से।  जबकि चुनाव तिथि घोषित होने के बाद अधिकारिक तौर पर कोई भी गम्भीर पहल, कार्रवाई, बैठक या विचार-विमर्श कहीं हुआ ही नहीं। ये मुक्ति मोर्चा शायद एक प्रदर्शन के बाद चुनाव घोषित हो जाने से अतिरेक में है। मैंने जोश-खरोश के साथ पुरानी कमेटी को उखाड़ फेंकने वाले एक युवा साथी से प्रेस क्लब की ताजा गतिविधियां के बारे में पूछा तो वह हताश सा लगा। ऐसा लग रहा था कि मानो मैं उसका सारा खेल बिगाड़े दे रहा हूं। तो मेरे नये पत्रकार दोस्तों मेरी एक बात गांठ बांध लो...। ये जो पुरानी कमेटी है इसमें कोई मेरे दुश्मन लोग काबिज नहीं थे। ये सब भी तुम्हाारे जितने ही मेरे प्रिय और अजी$ज हैं और रहेंगे। यह तो प्रेस क्लब में उनके कामकरने का ढंग था जिसकी वजह से मैं उनका आलोचक और विरोधी हो गया हूं। वह भी केवल प्रेस क्लब तक ही। वरना कोई मेरा भाई है, कोई भतीजा, कोई भांजा है। और कोई मामा। सिर्फ कहने भर के सम्बोधन नहीं हैं ये वाकई नाते-रिश्तेदारी वाले सम्बोधन हैं...। वैसे एक बात बता दूं इस बार $जरा कठिन होगा चुनाव में लीपना-पोतना...।  पता चला है साप्ताहिक अखबारों को, छोटे अखबारों को, इलेक्ट्रानिक मीडिया को और स्वतंत्र पत्रकारों को सदस्यता मिलेगी पर मताधिकार नहीं...। प्रेस क्लब को यह सब करने से पहले बताना होगा किकिस बिना पर वह सदस्यता देगा और किस बिना पर नहीं। यह बड़ा मुद्दा होगा और इसे पारदर्शी बनाना होगा। इसके साथ ही पुरानी कमेटी नौ बरस का लेखा-जोखा तैयार करे। लाखों रुपये का आय-व्यय का हिसाब है... जिसका कोई खाता बही यानी बैंक एकाउंट नहीं है। यह भी बताये कि उसने ९ बरस तक चुनाव क्यों नहीं कराये।   इन वर्षों में एक बार भी आमसभा या विशेष सभा क्यों नहीं बुलाई गई। इस तरह के ढेरों सवाल हैं।
ये सारे सवाल प्रेस क्लब के चुनाव में उठेंगे और नये उम्मीदवारों व उसके बाद कमेटी को इन सवालों के जवाब मांगने होंगे। कम से कम पत्रकारों को तो अपनी संस्था के भ्रष्टाचार को साफ करने में संकोच नहीं करना चाहिए।1
प्रमोद तिवारी

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

चौथा कोना

फिरने लगा 'पानी' पर पानी
लगने लगी जंग पर 'जंग'

कानपुर प्रेस क्लब के चुनाव के लिये जारी जंग पर पानी भी फिरने लगा है और जंग भी लगनी शुरू हो गई है। जो लोग अन्तिम सांस तक प्रेस क्लब को अभंग देखना चाहते थे उसके पद और पदलाभ को अपनी बपौती मान बैठे थे, उन सारे के सारे लोगों ने धीरे-धीरे नयी कमेटी के चुनाव की बागडोर अपने हाथो में मैनेज कर ली है। जो युवा पत्रकार लोग परिवर्तन के लिये मुट्ठी  ताने थे वे हाथ खोलकर खारिज प्रेस क्लब के मठाधीशों से घुल मिल गये  लगते हैं। तभी तो तकरीबन पुरानी कमेटी ही सदस्यता सूची की जांच करेगी, पुरानी कमेटी ही तय करेगी कि चुनाव किसकी देख-रेख में होगा और पुरानी कमेटी ही यह भी बतायेगी कि पत्रकार कौन है और कौन नहीं...। और अगर ऐसा ही कुछ हुआ तो यह बदलाव केवल किसी बोतल के लेबल बदलने जैसा ही होगा... बस! न शराब बदलेगी और न ही बोतल...। वैसे भी यह बात पत्रकारों की कौम को खुद समझनी चाहिये कि जिन लोगों ने घोर अलोकतांत्रिक तरीके से कानपुर के समूचे पत्रकार जगत की भावनाओं को वर्षों चिढ़ाया और खिझाया है वही लोग अब नये लोकतंत्र की रचना करेंगे। सौरभ शुक्ला! यह नाम इस चुनाव में परिवर्तन का चेहरा बनकर उभरा है लेकिन अब उनका कहना है कि वह अकेले क्या कर सकते हैं? इसका सीधा सा अभिप्राय है कि उनकी भूमिका अब शिथिल है। उनकी बातचीत में 'यथास्थितिवाद' का पूरा पुट है। उनका कहना है कि जब अखबार की ओर से महेश शर्मा, सरस बाजपेयी, इरफान, राजेश द्विवेदी के नाम स्क्रीनिंगकमेटी के लिये भेजे गये हैं तो हम 'अखबार' से थोड़े ही लड़ सकते हैं...? वैसे मेरी जानकारी में स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्यों को हिन्दुस्तान, अमर उजाला या दैनिक जागरण के बोर्ड आफ डायरेक्टरों ने अपना प्रतिनिधि घोषित नहीं किया है। रही बात अखबार से लडऩे या न लडऩे की तो इस मुगालते में भी किसी पत्रकार को नहीं होना चाहिये कि वह किसी अखबार से लड़ भी सकता है।  खुद पीछे पलट कर देखें... प्रेस क्लब के चुनाव हों... इसके लिये जब-जब शहर के युवा क्रान्तिकारियों से कहा गया तो सभी ने एक ही जवाब दिया- भैया! नौकरी बचाएं कि प्रेस क्लब की राजनीति करें। आखिर घर गृहस्थी और बीवी बच्चे भी तो हैं...। इन्हीं जवाबों के कारण ही मैंने हिन्दुस्तान, अमर उजाला, जागरण और राष्ट्रीय सहारा के सम्पादकों और प्रबन्धकों से सीधी बात की। सभी से निवेदन किया कि वे अपने अधीनस्थों में यह विश्वास जगाये कि प्रेस क्लब की सक्रियता से नौकरी या अखबार का कोई मतलब नहीं है। मैं समझता हूं जो बदलाव हुआ उसमें सभी अखबारों के उच्च पदस्थ लोगों की सहमति शामिल है। अब इस सहमति का मान-सम्मान बनाये रखना, उसे बढ़ाना और प्रेस क्लब की खोई प्रतिष्ठा को वापस लाना, किसी और का नहीं आम पत्रकारों का काम है। यह मौका है 'आत्मशुद्धि' का और इसके लिये मठों और उनके धीशों को धो-धाकर कोने में खड़ा करना होगा।
सरस बाजपेयी, महेश शर्मा, राजेश द्विवेदी, इरफान, कवीन्द्र  कुमार, इन सभी लोगों पर समय से चुनाव न होने का दोष है। फिर ये लोग नये चुनाव कराने के अधिकारी कैसे हो सकते हैं। ये चुनाव लड़ तो सकते हैं लेकिन चुनाव करा कैसे सकते हैं। 'चुनाव आयोगÓ की संरचना ध्यान में होनी चाहिये। क्या सत्ताधारी दल कभी चुनाव आयोग की भूमिका अदा कर सकता है...? या तो चुनाव संचालन में शामिल  लोग चुनाव न लडऩे का फैसला करें... या फिर चुनाव लडऩा है तो चुनाव संचालन की प्रक्रिया से खुद को अलग रखें। खुद सोचिये! अगर कानून बनाने वाले, अपराध करने वाले और फैसला सुनाने वाले चेहरे एक ही हैं तो प्रेस क्लब के नाम पर न्याय और सच्चाई का इतना तूफान क्यों ... और अगर ऐसा ही फेने वाला तूफान उठाना था तो मेरे जैसे किनारे खड़े पत्रकार को बीच में लाने की आवश्यकता ही क्या थी...?
वैसे मैं अनावश्यक ही खुद को बीच में समझ रहा हूं। सच बात तो ये हैं कि जब तक कमेटी भंग नहीं हुई क्रान्तिकारियों ने मुझे पल-पल की खबर दी और राय मशविरा किया। जैसे ही कमेटी भंग हुई उसके बाद क्या चल रहा है इसकी जानकारी देना किसी ने भी मुनासिब नहीं समझा...।  खैर! कोई बात नहीं...
मैं झूम के गाता हूं
कमजर्फ जमाने में,
इक आग लगा ली है
इक आग बुझाने में।
यह कहने वाला भी तो मैं ही हूं।1
          प्रमोद तिवारी

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

चौथा कोना

अभी काम पूरा नहीं हुआ है


अगर प्रेस क्लब को वाकई अनीतियों व पुरानी कब्जे की बीमारी से उबारना है तो आम पत्रकारों को चुनाव की नकेल अपने हाथ में लेनी होगी। जो लोग कल तक चुनाव न कराने की गोटें बिछा रहे थे अब आप अगर उन्हें नये चुनाव की गोटें सजाने का अवसर देंगे तो यह बदलाव भी एक छद्म परिवर्तन से आगे नहीं बढ़ेगा। इसलिये भंग चुनाव समिति का एक भी सदस्य चुनाव प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहिये। अगर ऐसा हुआ तो समझो चेहरे बदलकर नयी षडय़ंत्री समिति अंगड़ाई ले रही है।

लगभग ९ बरस बाद कानपुर प्रेस क्लब नीयतखोर कार्य समिति के चंगुल से मुक्त हुआ। परिवर्तन के पक्षधर कुछ पत्रकारों ने हिम्मत दिखाई और खुद को अजेय समझने वाले मठाधीशों को पलक झपकते  औंधा कर दिया। एक जुलाई को नये चुनाव घोषित हुये हैं। प्रेस क्लब से मेरा सीधा नाता रहा है। मेरे ही महामंत्रित्व काल में इस मंच ने प्रेस क्लब का पुनरुद्धार कराया और 'पत्रकारपुरम आवासीय योजना को मूर्त रूप दिया।
मैं जब महामंत्री बना इसके पहले की समिति भी वर्षों से हमारे बुजुर्ग पत्रकारों के नेतृत्व में काम कर रही थी। चुनाव तब भी अटके हुये थे। समय पर नहीं हो रहे थे। उन दिनों मैं जागरण का मुख्य संवाददाता हुआ करता था और चुनाव कराने में मैंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। शैलेन्द्र दीक्षित 'आज के  सम्पादक थे और पूर्णत: मेरे साथ थे। इतना गहरा सम्बन्ध होने के बावजूद आज मेरा प्रेस क्लब से नाता इसलिये नहीं है क्योंकि जो समिति अभी तक काबिज थी उसने मुझे प्रेस क्लब का सदस्य होना भी स्वीकार नहीं किया था। यह वह समिति थी जिसके अध्यक्ष से लेकर कार्यकारिणी के कई सदस्य तक मेरे साथ, मेरे नेतृत्व में मेरे विश्वासपात्र बनकर वर्षों से पत्रकारिता कर रहे थे। कुछ तो इनमें ऐसे थे( थे क्या..., हैं...) जब सामने पड़ते हैं तो आज भी कहते हैं कि उनकी कुल पत्रकारिता की हैसियत मेरी ही वजह से है। ये वे लोग हैं जो शायद मुझे इस धरती का सबसे मूर्ख व्यक्ति समझते हैं। मैं कानपुर के प्रेसक्लबिया पत्रकारों और उनकी राजनीति के बारे में क्या कहूं। खुद सोचिये जिस महामंत्री से हिसाब लेना था, चार्ज लेना था उसे सदस्य तक नहीं बनाया। मुझे सदस्य न बनाने का आधार बनाया गया मेरी तत्कालीन बेरोजगारी। मैं उन दिनों किसी अखबार में नौकरी नहीं कर रहा था। कितना बचकाना और षडय़ंत्री 'क्लाज बनाया था इन लोगों ने जबकि दिलीप शुक्ला, कमलेश त्रिपाठी, अम्बरीष, विष्णु त्रिपाठी सरीखे कितने ही गैर नौकरी वाले पत्रकार उक्त चुनाव प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका अदा कर रहे थे। सच कहूं... दो हजार दो से पहले जो भी पत्रकार मेरे दोस्त भाई या हितैषी बने फिरते थे। प्रेस क्लब के गत चुनाव के बाद मैंने उनकी दिली रिश्तों की फाइल बंद कर दी है। अब चूंकि यहीं रहना है इसलिए व्यवहार में सभी से मिलना जुलना रहता है... बस। हां, इधर जो नये युवा पत्रकार मैदान में आये हैं, मेरा सरोकार उन्हीं से है। और यह परिवर्तन किन्हीं पुराने, वरिष्ठों या क्रान्तिकारियों की वजह से नहीं हुआ है।  नये युवा पत्रकारों की अकुलाहट से हुआ है।
   तो नये मित्रों तुम्हारे लिये मेरा एक खुला सन्देश है- तुम्हें सजग रहना है। क्योंकि भ्रष्ट, अकर्मण्य और डरे हुये वरिष्ठ अभी भी अपना जाल बुनना बन्द नहीं करेंगे। वे फिर से नये मुखौटों से प्रेस क्लब पर अपना कब्जा रखने का षडय़ंत्र रचेंगे।  क्योंकि प्रेस क्लब आर्थिक भ्रष्टाचार का पुराना व स्थापित अड्डा रहा है और आज भी है। कोशिश होगी, बोतल बदले, शराब नहीं। तभी तो आम सभा के डर से कार्यसमिति ने अपने घुटने टेक कर नये चुनाव की घोषणा की। इसका सीधा सा अर्थ है कि नये चुनाव की प्रक्रिया का निर्धारण आम पत्रकारों से नहीं होगा।
इसे वही लोग अंजाम देंगे जो या तो इस समिति में काबिज थे या फिर इतने डरपोक और उदासीन कि ९ बरस तक चुपचाप 'प्रेस क्लब का भ्रष्ट आचार सहते रहे। अगर प्रेस क्लब को वाकई अनीतियों व पुरानी कब्जे की बीमारी से उबारना है तो आम पत्रकारों को चुनाव की नकेल अपने हाथ में लेनी होगी। जो लोग कल तक चुनाव न कराने की गोटें बिछा रहे थे अब आप अगर उन्हें नये चुनाव की गोटें सजाने का अवसर देंगे तो यह बदलाव भी एक छद्म क्रांति से आगे नहीं बढ़ेगा। इसलिये भंग चुनाव समिति का एक भी सदस्य चुनाव प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहिये। अगर ऐसा हुआ तो समझो चेहरे बदलकर नयी षडय़ंत्री समिति अंगड़ाई ले रही है।1
प्रमोद तिवारी

रविवार, 10 अप्रैल 2011

चौथा कोना

अन्ना हजारे के समर्थन में चौथा कोना का धरना
गणेश शंकर विद्यार्थी की कर्मभूमि रहे कानपुर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन पर बैठे अन्ना हजारे के समर्थन में पत्रकारों का धरना आयोजित हुआ। इस धरने को च्चौथा कोनाज् ने आयोजित किया था। नवीन मार्केट के शिक्षक पार्क के इस धरने में कानपुर के सभी अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों और छायाकारों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। धरने का नेतृत्व शहर के जाने माने  कवि एवं  पत्रकार प्रमोद तिवारी जी ने किया। धरने के मध्य अपने संक्षिप्त उद्बोधन में प्रमोद जी ने आपातकाल के दिनों की याद दिलाते हुए नयी पीढ़ी के पत्रकारों से कहा कवि  दुष्यंत कुमार ने जयप्रकाश नारायण को जेहन में रख कर एक शेर कहा था । एक बूढ़ा आदमी है इस मुल्क में या यूँ कहो कि इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान हैं । आज यही पंक्तियाँ बुजुर्ग युवा समाजसेवी अन्ना हजारे के किरदार को भी उजागर करती हैं ।  कानपुर के सभी सजग पत्रकारों से आग्रह है कि अन्ना हजारे द्वारा जन लोकपाल बिल को लागू कराये जाने की मांग को लेकर किये जा रहे आमरण अनशन को समर्थन देने के लिए चौथा कोना के एक दिवसीय धरने में शामिल होकर अपनी ईमानदार भूमिका का संकल्प दोहराए और कत्र्तव्य पथ पर आगे बढे!  उन्होंने स्वरचित पक्तियां  भी कहीं.
उठा लाओ कही से भी उजाले की किरण कोए
अंधेरो की नहीं अब धमकियाँ बर्दाश्त होती हैं !
उजाले के लिए जलते हैं जो दीपक खुले दिल से,
तजुर्बा है मेरा उनके हवाएं साथ होती है ।
शहर में पत्रकारों और समाजसेविओं  के  मध्य चर्चित रहे इस धरने में  वर्तमान प्रेस क्लब के वरिष्ठ मंत्री सरस बाजपेयी शामिल रहे। इसी प्रकार कानपुर के राष्ट्रीय सहारा के स्थानीय सम्पादक नवोदित जी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी।  नयी दुनिया साप्ताहिक समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ कमलेश त्रिपाठी और राष्ट्र.भूमि के संवाददाता  प्रवीन शुक्ला भी उपस्थित रहे। लगभग एक सौ पच्चीस से अधिक पत्रकारों ने इस धरने में भाग लियाण्
यद्यपि इस कार्यक्रम की सूचना कानपुर के सभी बड़े अखबारों को पूर्व में दे दी गयी थी, किन्तु अखबारी व्यस्तता और अन्य कारणों से उपस्थित न हो सके लोगों अपनी असमर्थता को स्पष्ट किया जो इस धरने के महान उद्देश्य के लिए सफलता की बात कही। जैसा कि सर्वविदित है कि कानपुर प्रेस क्लब का चुनाव विगत सात सालों से नहीं हुआ है और इस संस्था में तमाम गड़बडिय़ा व्याप्त हैं। इस समस्या पर भी इस धरने में दबी जबान से बात शुरू हुयी जो अंतत: मुखर हो गयी। पत्रकारों और छायाकारों में इस संस्था के चुनाव न करवाने पर रोष है, जो अन्ना हजारे के लोकपाल बिल को लागू करवाने के माध्यम से उजागर हो गया। किन्तु प्रमोद तिवारी सहित वरिष्ठ पत्रकरों ने इस के लिए अगला संघर्ष शुरू करने के लिए उनके मध्य नेतृत्व तैयार करने के लिए रास्ता तलाशने का मार्ग दिखाया।1
अरविन्द त्रिपाठी
( लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

चौथा कोना

'हेलो कानपुर '
को मिला
'हेलो हिन्दुस्तान '


प्रमोद तिवारी
हम 'हेलो कानपुर' निकालकर खुश हैं। पिछले दिनों (२० फरवरी ) इन्दौर एक कवि सम्मेलन में जाना हुआ तो वहां 'हेलो हिन्दुस्तान' के दर्शन हुये। ठीक कानपुर की तरह इन्दौर में भी 'हेलो हिन्दुस्तान' करने वाला कोई और नहीं एक युवा पत्रकार ही निकला। नाम है प्रवीण शर्मा। व्यावसायिक वृतांत के अनुसार नई दुनिया समूह में शर्मा जी स्थानीय सम्पादक की कुर्सी पर थे। हटे या हटाये गये यह तो कहने-सुनने भर की गुंजाइश है पर नौकरी छोड़कर तिलमिलाये प्रवीण ने 'हेलो हिन्दुस्तान' के नाम से एक राष्ट्रीय पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और चिकने-चिकने ६० पृष्ठों पर सारगर्भित सामग्री परोसकर ५ वर्ष पार कर लिये। मेरी तरह ही यह प्रगति के नाम पर नवीन समाचार यह है कि पिछले चार महीनों से हेलो हिन्दुस्तान के नाम से इन्दौर में सांध्य दैनिक की भी शुरुआत हो चुकी है। यह सब आपको इसलिये बता रहा हूं कि हेलो कानपुर (साप्ताहिकी) और सांध्य दैनिक बड़ा चौराहा का प्रकाशन भी कुछ इसी तरह की परिस्थितियों और 'पात्र' के जरिये हुआ था। मैं जिस कार्यक्रम (कवि सम्मेलन) में आमंत्रित था उसका आयोजक 'हेलो हिन्दुस्तान' ही था। शानदार स्वागत, जानदार कवि व शायर एवं दमदार प्रस्तुतियों से वाकई एसी 'काव्य वर्षा' हुई कि श्रोता ही नहीं कविबन्धु भी एक दूसरे को सुन व देखकर पानी-पानी हो गये। खुद मैं भी। कवि सम्मेलन से ज्यादा 'हेलो हिन्दुस्तान' की महिमा और गरिमा देखकर उसकी डायस पर मौजूद होकर। जहां तक अखबार व प्रकाशित सामग्री का प्रश्न है अपना 'हेलो कानपुर' किसी तरह से कमजोर नहीं है। लेकिन जिस व्यवस्थित ढंग से प्रवीण शर्मा अपना अभियान चला रहे हैं उससे उम्मीद लगती है कि हिन्दी में एक नया 'मीडिया ग्रुप' जन्म ले रहा है। प्रवीण के साथ इन्दौर के धनाढ्य, राजनीतिक और गणमान्य जन कंधे से कंधा मिलाये, मुस्कराते और दम बांधते-बंधाते मिले। जबकि हम कानपुर में 'हेलो...' करते-करते कांखे जा रहे हैं। अब ज्यादा क्या कहूं मेरे और प्रवीण के अभियान में साधन और सौजन्य में अगर अन्तर बताऊं तो फिलहाल यही  कह सकता हूं जितना अन्तर इन्दौर शहर और कानपुर शहर की व्यवस्था  में है उतना ही अन्तर हेलो हिन्दुस्तान और हेलो कानपुर की अवस्था में है। जबकि न तो इन्दौर से कम 'इन्द्र' कानपुर में हैं और न ही ईमानदार शब्द प्रहरी। फिर भी निराशा या हताशा होने की कोई बात नहीं है। क्योंकि अभी 'हेलो कानपुर' की 'हेलो' जारी है...।