बुधवार, 13 जुलाई 2011

'तीसरा' प्यार का अभिशाप


प्यार की सबसे बड़ी मुसीबत है अधिकार. प्यार हुआ नहीं कि अधिकार ने हाथ बढ़ा दिया. एक लड़के को लड़की से प्यार हो जाता है. लड़की भी लड़के के प्यार में डूब जाती है. दोनों को जैसे ही अपने-अपने प्यार की आश्वस्ति होती है लड़का चाहता है कि अब लड़की सिर्फ उसे ही प्यार करे और लड़की भी कुछ अलग नहीं चाहती. वह भी यही चाहती है कि उसका प्रेमी अब किसी को नज़र उठाकर भी न देखे. दोनों जब तक ऐसा करते हैं उन्हें प्यार से कोई शिकायत नहीं रहती है. लेकिन जैसे ही प्यार में किसी तीसरे का प्रवेश होता है प्यार टूट जाता है. यह तीसरा क्या है? यह तीसरा ही है जो दोनों को यह एहसास कराता है कि तुम सिर्फ एक-दूसरे के लिये नहीं हो. कोई और भी है, तुम्हारे लिये. ये जो तीसरा है यही तो प्रवाह है प्यार का. फिर चौथा है... पांचवा है... छठा है... और यह सिलसिला अनंत है. इसमें अनंतो-अनंत प्रेम कथाओं का अनंत प्रवाह है.... ऐसे में प्यार सिर्फ दो शरीरों में बंधकर कैसे रह सकता है. इसलिये प्यार को जब भी सोचो शरीर को हटाकर सोचो. तुम्हें अनंतो-अनंत प्रेम कथाओं की अथाह प्रेमाभूति होगी. लेकिन मुसीबत यह है कि हमें बिना शरीर के प्रेम करना ही नहीं आता. इसीलिये 'तीसरा' प्यार का अभिशाप है.
प्रमोद तिवारी

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

दिल्ली, बाई-ट्रेन

मेरी दिल्ली जाने की तैयारी थी। न जाने कहाँ से मैने यह बात दुनिया लाल को बता दी। दुनिया लाल मेरे मित्र हैं। उन्होंने पूछा, 'काहे से जा रहे हो...?' मैंने बता दिया, बाई-ट्रेन। बस, फिर क्या था... पूरा इलाका जान गया कि मैं बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहा हूँ।
मैं दूध लेने निकला था। चौराहे पर पन्ना लाल पनवाड़ी के पास रुक गया। उन्होंने एक जोड़ा पान मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं पान दबाकर आगे बढऩे ही वाला था कि वह बोले, 'भैया! सुना है, आप बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहे हो।' मैने कहा, 'हाँ ! लेकिन तुम्हें कैसे पता ...?'  वह बोले 'दुनिया लाल आये थे। कह रहे थे उन्होंने आपको बहुत समझाया... लेकिन आप माने ही नहीं।... क्या बात हो गई? जो आप बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहे हो...?'  मैं इसके पहले भी दुनिया लाल की दोस्ती से कई बार मुसीबत में पड़ चुका था। इसलिए कुछ कहे बगैर मक्खन सिंह की दुकान की ओर बढ़ गया।
मक्खन सिंह मानो मेरा ही इंतजार कर रहे थे। देखते ही चहक उठे, 'सुना है आप कौनो मंजन वाली अंताक्षरी में भाग लेने दिल्ली जा रहे हो बाई-ट्रेन?'  मैने कहा 'ये सब तो ठीक है लेकिन तुम्हें कैसे पता...?'  मक्खन ने बताया 'दुनिया लाल आये थे कह रहे थे। जिन्दगी में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि आदमी जरा-जरा सी बात में बाई-ट्रेन दिल्ली जाने लगे।' मैं झुल्ला गया... अमां दिल्ली जाना है। बाई-ट्रेन न जाऊँ  तो क्या स्कूटर स्टार्ट कर दूं...? फिर लगा मक्खन से उलझना बेकार है। जो कहना है दुनिया लाल से कहूंगा। मैं दुनिया लाल के घर की ओर लपक लिया। रास्ते में चचा राम केवल अपना सेलून खोल चुके थे। मैने सोंचा कटिंग करा लूं। सो, कुर्सी पर बैठ गया। चचा ने खटखटाई और शुरू हो गए।...'अखबार की खबर थी कि अटल जी दिल्ली-लाहौर बस चलवा रहे हैं।...' हाँ, मैने सहमति में अपना सिर हिला दिया। चचा का हौसला बढ़ा। वह बोले, 'फिर आप क्यों बाई-ट्रेन दिल्ली जा रहे हो...? दुनिया लाल की आप न माने लेकिन अटल जी का इशारा तो समझें...।'  मैं समझ गया दुनिया लाल आज कल में ही चचा से सिर घुटवा कर गए हैं। ...गंजा कहीं का।
अब मेरा बर्दाश्त जवाब देने लगी थी। मैं सीधे दुनिया लाल के घर की ओर लपका।...अबे! तूने पूरे मोहल्ले में यह क्या रब-रब फैला रक्खी है। दुनिया लाल बोले, यार मैं तेरा दोस्त हूँ, कोई दुश्मन नहीं। तू देख, पिछले एक हफ्ते में कानपुर-दिल्ली लाइन में क्या कुछ नहीं हुआ। लूट हुई, जहर खुरानी हुई ,  पटरी टूटी, डिब्बे उतरे, लोग जख्मी हुए, जान पर बन आई, ऐसे में मेरा क्या फर्ज है। आज तुझे मेरी बात समझ में नहीं आ रही। कल जब तेरी औलादें बाई-ट्रेन दिल्ली जाएंगी तब समझ में आयेगी। मैं दुनिया लाल की बातों से 'कनफ्यूज' हो गया। अब सोंचता हूँ, बाई-बस ही निकल जाऊँ।
प्रमोद तिवारी

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"सहारा समय" साप्ताहिक में यह लेख पूर्व में प्रकाशित हो चुका है.

सोमवार, 11 जुलाई 2011

चौथा कोना

रखैल बना लिया प्रेस क्लब को

क जुलाई बीत गई और कानपुर प्रेस क्लब का चुनाव फिर नहीं हुआ. अब इस शहर के पत्रकारों को चाहे वह खूंटा गांड़ कर प्रेस क्लब में जमे हुए लोग हों या उन्हें उखाडऩे के लिये आसमान में तने हुए लोग हों, किसी तरह की सामाजिक, न्यायिक और मानवीय नैतिकता की बात करने का कोई अधिकार नहीं बनता है. मैं भी अब हड़ चुका हूं. कानपुर प्रेस क्लब के चुनाव के सम्बन्ध में अपने उदगार व्यक्त कर-करके नाक कटाकर भ्रष्टा खाने वालों की जमात में कन्नौज की इत्र फुरैहरी लेकर आखिर कोई कब तक घूमेगा.
     इस बार जिस तरह से चुनाव घोषित करने के बाद पलटी मारी गयी है यह इस बात का प्रमाण है कि कानपुर के इतिहास की सर्वाधिक भ्रष्ट और बेशर्म कार्यकारिणी यही है. जो लोग आज ये हरकत कर रहे हैं इन्हें शायद यह नहीं मालूम कि प्रेस क्लब का भी एक इतिहास लिखा जायेगा. और जब पचास वर्षों में पांच कार्यकारिणियों के बड़े-बड़े पत्रकारों की चर्चा होगी तो आने वाली पीढिय़ां सभी को आला दर्जे का चोर कहेंगी. हो सकता है कि मैं भी न बच पाऊं. मुझे भी इस संस्था से जुडऩे का इनाम मिले? पूरा शहर देख रहा है. पूरा शहर जान रहा है. एक तरह से हंस रहा है. बावजूद इसके खुद को प्रेस क्लब का ओहदेदार बताने में किसी को शर्म नहीं आ रही है. ये तो रही उनकी बात जो आसन जमाये बैठे हैं. अब उनको क्या कहें जो चुनाव-चुनाव का शोर खूब मचाते हैं लेकिन संवैधानिक चुनाव की प्रक्रिया और रास्तों की तरफ बढऩे में बार-बार मुंह के बल औंधे हो जाते हैं. ये वो लोग हैं जो शीलू को न्याय दिलाते हैं, कविता को न्याय दिलाते हैं, दिव्या के लिये अखबार को तलवार बना देते हैं,  लेकिन अपने और अपनी जमात के अधिकारों के बलात हरण पर मिमियाया करते हैं. मुझे मेरे ही एक अनुज ने बताया कि चुनाव तो हो जाते लेकिन पुराने दिग्गजों ने नये क्रान्तिकारियों को यह समझाया कि अगर इस तरह चुनाव हो गये तो बड़ी मुश्किल से प्रमोद तिवारी को प्रेस क्लब से बाहर कर पाये हैं वो फिर जिन्दा हो जायेंगे.  मुझे समझ में ही नहीं आ रहा है कि मैं मर कब गया था. मेरा एक शेर है-
'चलिये चलें वहां जहां अपना शुमार हो,
पत्थर के शहर में नहीं होगा निबाह और.'   
मुझे लगा कि जिस प्रेस क्लब को सजाने और पत्रकार पुरम जैसी आवासीय योजना को अमल में लाने के बदले मेरी पीठ ठोकी जानी चाहिये थी उस पर खंजर उतारे गये, ऐसे लोगों के साथ क्याजीना, क्यामरना? जब प्रजा आपको राजा मानती ही नहीं है तो राजा बना रहने का मतलब क्याहै? लेकिन जिन्हें षडय़ंत्र से ही सब कुछ हासिल होता है वो प्रजा चाहे या न चाहे, किसी भी कीमत पर सत्ताधीश बने ही रहना चाहते हैं चाहे इसके लिये उन्हें अपना शीश कुत्ते के सामने ही क्यों न झुकाना पड़े.
अब सवाल यह जरूर उठता है कि जब आपको कोई मतलब ही नहीं है तो आप परेशान क्यों हैं? परेशान इसलिये हूं कि दुनिया की हर अनीति पर अपनी राय रखने और टीका-टिप्पणी करने की रोटी खाता हूं. परेशान इसलिये हूं कि जब कोई पत्रकार मारा जाता है तो यह प्रेस क्लब बजाय उसके लिये लडऩे के उलटा उसे नकली, दोयम दर्जे का और छुटभैया कहकर भगा देता है. परेशान इसलिये हूं कि प्रेस मालिकों में आपसी प्रतिस्पर्धा इस कदर है कि पत्रकार एक तरह से न सोच सकते हैं न लिख सकते हैं. कम से कम प्रेस क्लब ऐसा मंच हो सकता है जहां से कर्मशील पत्रकार अपने अधिकार, सुरक्षा और न्याय की आवाज बिना किसी दबाव के उठा सकते हैं, जिसे फिलहाल शहर के चन्द पत्रकारों ने अपनी बपौती मान लिया है और उसका उपयोग वे अपनी रखैल की तरह करते हैं.1
  प्रमोद तिवारी