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शनिवार, 28 मई 2011

स्त्री सत्ता का पतन पुरुष सत्ता का बोलबाला

 
मनुष्य को अपने नाते-रिश्तेदारों की विरासत प्राणी-सृष्टि ने दी परन्तु विवाह संस्था ने उसे एक नया अर्थ दिया. जब तक मनुष्य मनुष्य में लैंगिक सम्बन्ध, उसके रक्त सम्बन्धों के व्यक्तिओं में भी बिना बाधा के चल रहे थे और उन्हें नैतिक समझा जाता रहा तब तक व्यक्तिगत पसन्दी ना पसन्दी का बहुत महत्व नहीं था परन्तु आगे चलकर व्यक्ति जैसे-जैसे अपनी पसन्द नापसन्द व्यक्त करने लगा वैसे-वैसे रक्त सम्बन्धों की लैंगिक व्यवस्था नष्ट होने लगी. यहीं से शुरु हुआ मातृसत्ता का पतन. महाभारत एवं ओरेस्तियन ट्रिलोजी एस्किलस में मानवी विकास क्रम का अदभुत चित्रण किया गया है.
एक पति-पत्नी वाली विवाह संस्था के अस्तित्व के पूर्व जो संस्थायें प्रचलित थी उनमें संतति की पहचान केवल मां की ओर से होती थी और मातृसत्ता का अस्तित्व था समय के साथ जब स्त्री पुरुष सम्बन्ध केवल पुरुष की पसन्दगी से निर्धारित होने लगे तो संतति का पिता निश्चित हुआ.
इसी कारण पितृसत्ता का जन्म हुआ. पुरुष अनेक स्त्रियों पर अधिकार जतलाने लगा उनकी वासनाओं का शिकार होने लगी. उन्होंने इससे बाहर निकलने के लिये कुछ की वासनाओं का बलि बनना मजबूरी में स्वीकार किया और एक पति-पत्नी विवाह शुरु हुआ परन्तु फिर भी स्त्री पर अन्य पुरुषों ने अधिकार जतलाना नहीं छोड़ा. यह अधिकार धीरे-धीरे एक दिन तक मर्यादित रहा और उन्हें पर पुरुष के आत्मसमर्पण की दुष्ट पद्धति में फंसा दिया. यह उनका आत्म स्वतंत्रता के लिये समझौता था. उसे कभी अतिथि कभी पति के मित्र के साथ लेटना पड़ता था. सुकरात (रोम का दार्श्रनिक) को पत्नी को उसके मित्र के साथ केटो की पत्नी को उसके मित्र के साथ लेटना पड़ा. महाभारत में कहा है कि संकट के समय अपनी पत्नी को निर्मल अंत:करण से मित्र को अर्पण करें. मातृसत्ता के काल में स्त्री परिवार की प्रमुख के साथ सामाजिक और धार्मिक जीवन के कानून बनाने वाली शक्ति भी थी उस काल इन नियमों के नाम मातृदेवताओं पर आधारित थे. ईश्वर के राजा आकाश और उसकी पत्नी पृथ्वी के पुत्र क्रानव से मनुष्य सृष्टि आरम्भ हुई. ऐसा ग्रीक और रोमन कहते हैं. इस युग में अराजकता और अव्यवस्था थी कानून और नियमों को बनाने के लिये पितृदेव प्रोमीथियस मनुष्य की ओर से आया विरोध ये प्रकृति देवताओं का प्रमुख धौस खड़ा हो गया. इसमें प्रकृति देवताओं की पराजय हुई समझौता हुआ जलपरी थीटिस का विवाह पिलियस नामक मनुष्य के ऊपर मनुष्य रूपधारी पुरुष देवता की विजय हुई. मातृसत्ता में मातृहत्या एक पाप माना जाता था. एक बेटे की मां ने अपने पति की हत्या की थी (प्रेमी के कारण) बेटे ने मां की हत्या कर दी परन्तु उसे मां की हत्या की अतएव उसे पापी माना गया क्योंकि मां का पति के साथ रक्त सम्बन्ध नहीं था. पितृसत्ता में मां एक सामान्य हो गयी है. यह सब ग्रीक और रोमन महाकाव्यों में लिखा है.1
नुष्य को अपने नाते-रिश्तेदारों की विरासत प्राणी-सृष्टि ने दी परन्तु विवाह संस्था ने उसे एक नया अर्थ दिया. जब तक मनुष्य मनुष्य में लैंगिक सम्बन्ध, उसके रक्त सम्बन्धों के व्यक्तिओं में भी बिना बाधा के चल रहे थे और उन्हें नैतिक समझा जाता रहा तब तक व्यक्तिगत पसन्दी ना पसन्दी का बहुत महत्व नहीं था परन्तु आगे चलकर व्यक्ति जैसे-जैसे अपनी पसन्द नापसन्द व्यक्त करने लगा वैसे-वैसे रक्त सम्बन्धों की लैंगिक व्यवस्था नष्ट होने लगी. यहीं से शुरु हुआ मातृसत्ता का पतन. महाभारत एवं ओरेस्तियन ट्रिलोजी एस्किलस में मानवी विकास क्रम का अदभुत चित्रण किया गया है.
एक पति-पत्नी वाली विवाह संस्था के अस्तित्व के पूर्व जो संस्थायें प्रचलित थी उनमें संतति की पहचान केवल मां की ओर से होती थी और मातृसत्ता का अस्तित्व था समय के साथ जब स्त्री पुरुष सम्बन्ध केवल पुरुष की पसन्दगी से निर्धारित होने लगे तो संतति का पिता निश्चित हुआ.
इसी कारण पितृसत्ता का जन्म हुआ. पुरुष अनेक स्त्रियों पर अधिकार जतलाने लगा उनकी वासनाओं का शिकार होने लगी. उन्होंने इससे बाहर निकलने के लिये कुछ की वासनाओं का बलि बनना मजबूरी में स्वीकार किया और एक पति-पत्नी विवाह शुरु हुआ परन्तु फिर भी स्त्री पर अन्य पुरुषों ने अधिकार जतलाना नहीं छोड़ा. यह अधिकार धीरे-धीरे एक दिन तक मर्यादित रहा और उन्हें पर पुरुष के आत्मसमर्पण की दुष्ट पद्धति में फंसा दिया. यह उनका आत्म स्वतंत्रता के लिये समझौता था. उसे कभी अतिथि कभी पति के मित्र के साथ लेटना पड़ता था. सुकरात (रोम का दार्श्रनिक) को पत्नी को उसके मित्र के साथ केटो की पत्नी को उसके मित्र के साथ लेटना पड़ा. महाभारत में कहा है कि संकट के समय अपनी पत्नी को निर्मल अंत:करण से मित्र को अर्पण करें. मातृसत्ता के काल में स्त्री परिवार की प्रमुख के साथ सामाजिक और धार्मिक जीवन के कानून बनाने वाली शक्ति भी थी उस काल इन नियमों के नाम मातृदेवताओं पर आधारित थे. ईश्वर के राजा आकाश और उसकी पत्नी पृथ्वी के पुत्र क्रानव से मनुष्य सृष्टि आरम्भ हुई. ऐसा ग्रीक और रोमन कहते हैं. इस युग में अराजकता और अव्यवस्था थी कानून और नियमों को बनाने के लिये पितृदेव प्रोमीथियस मनुष्य की ओर से आया विरोध ये प्रकृति देवताओं का प्रमुख धौस खड़ा हो गया. इसमें प्रकृति देवताओं की पराजय हुई समझौता हुआ जलपरी थीटिस का विवाह पिलियस नामक मनुष्य के ऊपर मनुष्य रूपधारी पुरुष देवता की विजय हुई. मातृसत्ता में मातृहत्या एक पाप माना जाता था. एक बेटे की मां ने अपने पति की हत्या की थी (प्रेमी के कारण) बेटे ने मां की हत्या कर दी परन्तु उसे मां की हत्या की अतएव उसे पापी माना गया क्योंकि मां का पति के साथ रक्त सम्बन्ध नहीं था. पितृसत्ता में मां एक सामान्य हो गयी है. यह सब ग्रीक और रोमन महाकाव्यों में लिखा है.1
भ्रष्टाचार की श्रेणी ऊपर से नीचे

सीमालिया-    ११ प्रतिशत
रूस-        २१ प्रतिशत
नेपाल-        २२ प्रतिशत
पाकिस्तान-    २३ प्रतिशत
बंगला देश-    २४ प्रतिशत
अर्जनटाईना-    २९ प्रतिशत
श्रीलंका-        ३२ प्रतिशत
भारत-        ३३ प्रतिशत
चीन-         ३५ प्रतिशत
ब्राजील-        ३७ प्रतिशत
द. अफ्रीका-    ४५ प्रतिशत
यू.ए.ई.-        ६३ प्रतिशत
फ्रांस-        ६६ प्रतिशत
अमरीका-    ७१ प्रतिशत
यू.के.-        ७६ प्रतिशत
जापान-        ७८ प्रतिशत
जर्मनी-        ७९ प्रतिशत
स्विटजरलैंड-    ८७ प्रतिशत
आस्ट्रेलिया-    ८७ प्रतिशत
कनाडा-        ८९ प्रतिशत
सिंगापुर-        ९३ प्रतिशत
न्यूजीलैंड-    ९३ प्रतिशत
डेनमार्क-        ९३ प्रतिशत

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

प्रथम पुरुष

नये जमाने के हिसाब से आवश्यक हैं कानून संशोधन 

हम मृत्यु से डरते हैं क्यों? क्योंकि हमको भुला दिया जायेगा। हमारे प्रियजन, संगी-साथी, समाज हमें भुला देगा इसीलिये हम मरने से डरते हैं। हम चाहते हैं कि हमें हमेशा याद रक्खा जाये। क्या यह सम्भव है यदि सभी लोग सभी को हमेशा याद रक्खें तो मस्तिष्क तो इन यादों से फट जायेगा। उसके पास और कुछ करने की जगह ही नहीं रहेगी। यह अस्वाभाविक है फिर भी हम यह आशा करते हैं। हमने श्री राम श्री कृष्ण के चरित्र निर्माण किये उनसे असाधारण कार्य कराये उनको अमरत्व दिया परन्तु उन्हें भगवान कहा मनुष्य नहीं। हम मशहूर होना चाहते हैं हम स्मारक बनवाते हैं अपनी याद को कायम करने को हम  ऐसा क्यों चाहते हैं मेरी  समझ में तो यह एक एहं है। अपने को श्रेष्ठ समझने का सच तो यह है कि आप ऐसा कार्य करें (दूसरों के लिये समाज के लिये) जिन्हें याद रक्खा जाये। उन कार्यों को आपको या आपके नाम को नहीं परन्तु हो रहा है उल्टा। महापुरुषों के नाम को याद रक्खा जा रहा है उनके कार्यों को नहीं। अतएव मृत्यु के जरिये नहीं वह तो एक दिन आनी ही है। इस जीवन में ऐसे कार्य करें जिन्हें हमेशा याद रक्खा जाये। हमको अवसर मिला है कि समाज हमें याद रक्खे। अच्छे विचार अच्छे कार्य कभी नहीं मरते। स्मारक, मन्दिर, मसजिद तो एक दिन ढह जायेंगे। वैसे भी इनका अस्तित्व सभी नहीं मानते परन्तु अच्छे कार्यों को कोई नहीं नकारता। कोई बात नहीं तुमको भुला दिया जाये परन्तु यह तो कहा जाये अच्छा इन्सान था। डर के मत जीओ मृत्यु तो उस अवसर का अन्त है जब हमारी कुछ करने की क्षमता शेष नहीं रहती, पेड़ की तरह जो फल नहीं दे सकता छाया नहीं दे सकता, नदी जो पानी नहीं दे सकती इत्यादि-इत्यादि। मृत्यु एक अवस्था है प्रत्येक कृति की (सृष्टि की) कुछ नहीं तो कम से कम अपनी वाणी से अपने कार्यों से किसी को दुखी न करें इस बात का एहसास रहे आपको।
हमने १९४७ में आजादी पायी संविधान बनाया परन्तु हमारा प्रशासन अंग्रेजों के बनाये कानूनों पर चल रहा है जो इतने पुराने है कि उनसे अपराधों और अपराधियों पर रोक लगाना और सजा दिलाना असम्भव है।
१. कुष्ठ रोग का इलाज अब सम्भव है परन्तु इसे लाइलाज बताकर तलाक मिल सकता है। १८६९ का कानून।
२. किसानों को कर्ज मिलने का कानून १८८४ का है।
३. फैक्ट्रीज एक्ट १९४८ का है।
४. गंगा व अन्य पुलों पर चुंगी १८६७ के कानून से लगती है।
५. सरकारी भवनों पर १८९९ का कानून लगता है।
६. पुलिस को चलाने का कानून १८६१ का है।
७. होटलों और रेस्टोरेंटों पर १८६७ का कानून लगता है।
८. देश का एक कानून कहता है कि १५ वर्ष की पत्नी से सहवास अपराध नहीं है और दूसरा कानून विवाह की उम्र १८ वर्ष स्त्री के लिये और २१ वर्ष पुरुष के लिये है।
हम देश को १०० वर्ष से भी पुराने कानून पर चला रहे हैं। लगता है हमारे कानून बनाने वाले अन्धे हैं बहरे हैं और जानबूझ कर कानूनों में सुधार नहीं करना चाहते हैं। ऐसे पुराने कानूनों से उनका स्वार्थ सिद्ध हो रहा होगा।
 चीन में न्याय व्यवस्था
हमारे यहां के एक टीम ने जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी थे एक चीन में एक आरोपी के मुकदमे की प्रक्रिया३ माह में पूरी करके उसे जेल में भेज देते हैं। अन्य सभी मुकदमे भी ६ माह में तय कर दिये जाते हैं। उनकी सभी अदालतें कम्प्यूटर के नेटवर्क से जुड़ी हैं। जज के सामने सभी सूचनाएं उपलब्ध रहती हैं। सभी सूचनाएं पर्दे पर उपलब्ध रहती है जिसे वादी, जज प्रतिवादी देख सकते हैं। कम्प्यूटर पर घटना के स्थान पर पाये गये उंगलियों के निशान, हथियार एवं गवाहों के बयान भी मुकदमे के समय उपलब्ध रहती है। चीन में क्रिमिनल अपराध केवल ६७ प्रतिशत हैं अन्य मुकदमे (सिविल एवं व्यवसाय सम्बन्धी) ६८ प्रतिशत हैं। जिनको बातचीत के द्वारा तय करने की कोशिश होती है। इसके लिये एक कमेटी होती है। न्यायालय इसे मान्यता देता है और अपने आदेश में लिखता है। वर्ष में लगभग एक करोड़ मुकदमे होते हैं जिसमें १० हजार सुप्रीम कोर्ट में। बहस समाप्त होने पर एक या दो दिन में मुकदमा तय हो जाता है बहस अधिक से अधिक १० दिन चलती है। अदालत का आदेश अधिक से अधिक पांच पन्नों का होता है अन्तिम आदेश केवल एक पेज का। भ्रष्टाचार के मुकदमे (सरकारी) बहुत कम होते हैं। उनका निर्णय ३ माह में पूरा हो जाता है। भारत उनकी प्रणाली से बहुत कुछ सीख सकता है और अपनी न्याय व्यवस्था सुधार सकता है।1

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

प्रथम पुरुष

जनसंख्या नियंत्रण के लिये आवश्यक हैं बेहतर स्वास्थ्य सेवायें
स्पष्ट है यदि आबादी कम करनी है तो जन्म दर घटानी है,यदि जन्म दर घटानी है तो नवजात शिशु मृत्यु दर घटानी है,शिशु मृत्यु दर घटाने के लिये मातृ एवं शिशु सेवाओं (स्वास्थ्य) को बेहतर बनाना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि जन्म देते समय या एक वर्ष के अन्दर कोई भी शिशु मरने न पाये जब ऐसा होगा तो विश्वास जगेगा कि हमारे पैदा कि ये हुए सभी बच्चे जिन्दा रहेंगे अतएव एक या दो पैदा करो  उन्हें अच्छी जिन्दगी दो। जरा सोचिए १००० पर ७० यानि १०० पर ७ अर्थात प्रत्येक १४ वां शिशु एक वर्ष से पहले मर जाता है इस स्थिति में आम आदमी का विश्वास कैसे जागेगा कि उसका पैहले पैदा हुआ बच्चा जिन्दा रहेगा दूसरा महिला शिशु को पैदा होने दे क्योंकि वह परिवार को अच्छे अच्छे स्वास्थ्य देने में सक्ष्म है महिला शिशु का स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर प्रथम अधिकार होना चाहिए। ऐसा न करके हम अपने और देश के विकास को रोक रहे हैं।
हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा का कारण
हम विशेषज्ञों की कमेटियां बनाते है वे कठोर परिश्रम करके रिपोर्ट बनाते हैं सुझाव देते है। परन्तु हमारे प्रशासन और राजनेता उस रिपोर्ट को कोई विशेष महत्व नहीं देते अपने स्वार्थ के सुझाव मान लेते हैं शेष को कूड़े में डाल देते हैं। वे केवल भविष्य की योजना वाले सुझाव  मानते है वर्तमान की समस्याओं के समाधान वाले सुझाव नहीं मानते यही हुआ भोर कमेटी की रिपोर्ट का जो १९४३ में बनायी गयी थी  उसमें ८ ब्रिटिश और १६ भारतीय सदस्य थे। उन्होंने १९४६  में रिपोर्ट दी उन्होंने गरीबी अशिक्षा, खराब, और कम आहार, सफाई के अभाव को उतना ही दोष दिया जितना स्वास्थ्य सेवा  और स्वास्थ्य कर्मचारियों के अभाव को उस समय एक तिहाई १७६५४ ग्रेजुएट डाक्टर और दो तिहाई २९८७० लाईसन्सियेट्स थे यही लाईसेन्सियेट्स अन्य प्राणी के चिकित्सकों के साथ ग्रामीण छात्रों को स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवायें दे रहे थे। उनकी यह बात तो मान ली कि डिग्री कोर्स ही चलाये जायें डिप्लोमा कोर्स बन्द करे परन्तु ६ सदस्यों के विरोध पर ध्यान नहीं दिया कि ग्रामीण  क्षेत्रों को स्वास्थ्य सेवा कैसे दी जायेगी। १९४६-१९५६ तक मेडीकल कालेज १९ से ४२ हो गये डिग्री वाले डाक्टर भी दुगने हो गये  परन्तु  ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति वैसी ही रही हमारे डाक्टर (१८०००) यू.के. गये उनकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा बचाने को वहां पर २५७२० (११') भारतीय डाक्टर है। हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की नीतियां उन डाक्टरों ने बनायी और प्रभावित की जो ब्रिटिश शासन से प्रभावित थे अवएव उनका दृष्टिकोण पश्चिमी था।
२००७ में डिप्लो कोर्स पुन: शुरू करने का सुझाव आया परन्तु नहीं माना गया आई.एम.सी.एक्ट १९५६ में अफ्रीका में की हुयी निकल आफीसर, मेडीकल असिसटेन्ट, अमरीका में फिजीशियन असिसटेन्ट, कनैडा में नर्स प्रेकटशिनर, चीन में ग्रामीण डाक्टरों ने कमी पूरी की है उन्हें तीन वर्ष का प्रशीक्षण दिया जाता है इनकी सेवायें किसी से कम नहीं पायी गयी है। हमारे प्रशासन की पश्चिमी मानसिकता अभी भी विरोध कर रही है विकासशील देशों की सफलता से सबक न लेकर वर्तमान की स्थिति को सुधारने के बजाए भविष्य की योजना ही बना रहे है। स्वास्थ्य का विषय भिन्न है।  बच्चा तो पैदा होते ही देख रेख मांगता है अन्यथा जीवन भर अस्वस्थ रहेगा। डिप्लोमा पास डाक्टर अन्य प्रणाली के चिकित्सक ही हमारी ग्रमीण जनता को सेवायें दे सकेगें।
चिकित्सा प्रणाली या स्वास्थ का मुख्य उद्देश्य है देश के प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ रखना है। स्पष्ट है इसके लिए हमे ऐसे डाक्टर चाहिए जो इस उद्देश्य को पूरा कर सके।
इससे यह भी स्पष्ट है कि हमारी मैडीकल शिक्षा और उसको देने वाले मैडीकल कालेज इस उद्देश्य को पूरा करने की क्षमता रखते हो उनका स्तर उनका पाठ्यक्रम उनकी परीक्षा उनका ज्ञान और कुशलता पढ़ाने वालों की तस्वीर एवं चरित्र एवं हमारी नीतिया इस उद्देश्य को पूरा करने में तन मन और धन से लगे रहे। खेद का विषय है ऐसा हो नहीं रहा है।1

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

प्रथम पुरुष

नियमों की पालन से बढ़कर मानवीय भाव 
 हमारी बहन की बेटी अपने पति के साथ कानपुर स्टेशन पर उतरी उसे दूसरे प्लेटफार्म पर जाना था ओवर ब्रिज पर कोई झगड़ा हो रहा था भीड़ इकट्ठा  हो गयी थी तमाम यात्री रेलवे लाइन क्रास करक प्लेटफार्म पर जा रहे थे वे भी उस कतार में शामिल हो गये एक इंजन खड़ा था पत्नी तो प्लेटफार्म पर चढ़ गई परन्तु पति इंजन से टकरा कर गिर गये और अचानक इंजन ये टे्र्रने के डिब्बों का धक्का लगा और वे टे्रन के नीचे फंस गये इंजन उन्हें घसीटता ले गया। उनके सिर में गम्भीर चोट लगी और खून बहने लगा वे टे्रक पर बेहोश पड़े थे सैकड़ों यात्री थे रेलवे के कर्मचारी भी पुलिस के आदमी थे पत्नी रोती रही गिड़गिड़ाती रही किसी ने भी पति को उठाने में मदद नहीं की किसी तरह फोन से सम्बन्धियों को सूचना भेजी तब उनको वहां से निजी अस्पताल ले गये परन्तु इतनी देर हो चुकी थी इतना खून निकल चुका था कि उनकी मृत्यु हो गयी। पुलिस के सिपाही ने कोई मदद नहीं की बल्कि पत्नी से कहता रहा किसी कागज पर हस्ताक्षर करने को। रेलवे के चिकित्सा विभाग स्ट्रैचर तक नहीं दिया, प्राथमिक चिकित्सा नही की। कई प्रश्न उठते हैं यात्रियों की गलती है टै्रक से क्रास करना परन्तु क्या इतनी बड़ी गलती है कि उन्हें मरने दिया जाए। टे्रन आने के लिए बारबार प्लेटफार्म क्यों बदले जाते है। यात्रियों में भगदड़ मच जाती है ट्रेन छूट न जाये। टै्रक क्रास करते हुए यात्रियों को रोका क्यों नहीं जाता है। टे्रन जब शन्ट कर रही थी तो रेलवे का कर्मचारी हरी और लाल झन्डी लेकर क्यों नहीं खड़ा था। रेलवे के अधिकारी और चिकित्सा अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी है रेलवे की तमाम सुविधाओं को भोगना और यात्रियों को मरने देना अपने कमरों से निकलकर प्लेटफार्म पर भी नहीं आते। समाज को भी क्या कहा जाये तो मरते हुए को उठाने में भी मदद नहीं करता । एक और पहलू है। हादसों में घायल लोगों का पुलिस केस बनाया जाता है जब तक यह प्रक्रिया नहीं हो जाती घायल का इलाज डाक्टर नहीं करते चाहे घायल की मृत्यु हो जाने की सम्भावना हो। यह गम्भीर विषय है आवश्यक है कि घायल को जिन्दगी बचाने को प्राथमिकता दी जाये। उसक ो अस्पताल तक शीघ्र पहुंचाने की जिम्मेदारी निर्धारित की जाये। निश्चित तौर पर रेलवे के प्रांगण में तो यह रेलवे की ही है। हर हादसा तो पुलिस केस के दायरे में नहीं आता। इसी कारण लोग घायलों की मदद देने से कतराते हैं कहीं फंसा न दिये जायें। व्यवस्था सुधारने की अत्यन्त आवश्यकता है। हमारा फोरेन्सिक नियम को आधुनिक बनाना चाहिए। यदि सरकारी महकमें अपने दायित्व को निभाने में सक्षम नहीं है तो निजी संस्थाओं की मदद ले। रेलवे सेवा में सबसे अधिक अच्छे अंगे्रज थे अतएव उसमें अधिकारियों की सुविधाओं का भण्डार लगा लिया यात्रियों को उनके हाल पर छोड़ दिया। आपका नाम प्रतीक्षा सूची में है अपने आप बर्थ  नहीं मिलेगी परन्तु पैसा देने पर मिल जायेगी चारों ओर यही सब हो रहा है।
अधिक आबादी का कारण सिर्फ अधिक जन्म दर नहीं है इससे जुड़े दो और कारण है एक अधिक मृत्यु दर और दूसरा नवजात शिशु मृत्यु दर (एक वर्ष के अन्दर) दूसरा यानी नवजात शिशु मृत्यु दर किसी भी देश प्रदेश के आकड़ें बताते है जहां जहंा नवजात शिशु मृत्यु दर है वही जन्म दर भी अधिक है। अपने अधिक ही देश में देखे मध्य प्रदेश में नवजात शिशु मृत्यु दर है ७० प्रति १००० इस प्रदेश में जन्म दर भी सबसे अधिक है २८ प्रति १००० उड़ीसा में दूसरे नम्बर पर शिशु मृत्यु दर ६९ प्रति हजार इसके विपरीत केरल में १२, तमिलनाडू में ३१, महाराष्ट्र में ३३ प्रति हजार इन प्रदेशों में जन्म दर भी कम है। देश   का औसत शिशु मृत्यु का ५३ प्रति हजार है गांवों में ५८ लड़कियों का औसत २ से ३ प्रतिहजार अधिक है इसी प्रकार गांवों  और शहरों में २८.९ प्रति हजार। 1
शेष अगले अंक में

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

प्रथम पुरुष

विचारों से ही व्यवस्थित होता है जीवन


विचारों के महत्व को समझना ही जीवन कला है। क्योंकि विचारों के ही कारण हम अनुभव कहते हैं।  अनुभवों से हमारा दृष्टिकोण बनता है। दृष्टिकोण पर हमारा कर्म आधारित है। कर्म हमारी आदत डालता है। आदतें हमारा संस्कार निर्माण करते हैं। हमारे द्वारा जो सूचनाएं इक_ी की जाती हैं एवं हमारे जो विकास या धारणा है वही हमारा भाग्य बनाता है। प्रत्येक विचार हम स्वयं पैदा करते हैं वह न तो अपने आप आते हैं न ही और कोर्ई पैदा करता है।  विचार हर तरह की ऊर्जा पैदा करते हैं। पौजिटिव एवं निगेटिव यानी प्लस या माइनस। हम जैसे विचार पैदा करेंगे वैसी है। ऊर्जा पैदा होगी वैसी ही ऊर्जा दूसरों को देंगे। वही ऊर्जा उनसे हमें मिलेगी। यानी पौजिटिव देंगे तो पौजिटिव मिलेगी। निगेटिव देंगे तो निगेटिव। जहरीली यानी टौकसिस, नकारात्मक, समय नरूर करने वाले विचार निगेटिव  ऊर्जा पैदा करते हैं। जैसे क्रोध, घृणा, बदला लेने वाले, जलन पैदा करना, डरना, घबड़ाना, असफलता की भावना, अविश्वास करना, गप्प लड़ाना, टी.वी. या अखबार मे ऐसी सूचना पाना जिनमें हमारा विचार हित नहीं है। इसके विपरीत आवश्यक विचार, सकारात्मक विचार, आवश्यक विचार उच्चस्तर के विचार पौजिटिव ऊर्जा पैदा करते हैं। अतएव सही विचारों को पैदा करने का अभ्यास करें अर्थात किसी बात को बढ़ाकर न देंखे अविश्वास न करें। जिम्मेदारी लें दूसरे को दोष न दें। किसी भी निर्णय पर न कूदे, हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है। या ऐसा ही हमेशा क्यों है न सोचे नकारात्मक पहलू न ढूंढे।
विचारों में न उलझे। बुरे विचार को अच्छा साबित न करें। व्यक्तियों पर ठप्पा न लगायें, किसी मक्खी की तरह हमेशा गन्दगी पर ही ध्यान न दें।
आशावादी और सभी को बराबरी का समझने वाले विचार पैदा करें उच्च स्तर के विचार हैं। देश का भला शान्ति पैदा करना, सामाजिक एवं आध्यात्मिक। स्पष्ट है पौजिटिव गुणात्मक , विचार लाभदायक है। निगेटिव  नकारात्मक हानिकारक। हमारे विचार हमारे नरवस स्नायु तंत्र या प्रणाली पर भी असर डालते हैं। वे औटोनोमस सिस्टम यानी सिम्पैथिटिक एवं पैरा स्म्पिैथिटिक नरवस सिस्टम पर अपना प्रभाव डालते हैं। जिसके कारणहमारे ग्लान्डस से निकलने वाले हारमोन की मात्रा के रिसाव में कमी या अधिकता आती है।
हमारे विचार  इमीयून सिस्टम को भी प्रभावित करते हैं। जिससे रोग निरोधक शक्ति क्षीण होती है। विचार इन सब पर हाइपोथैलमस के माध्यम से अपना प्रभाव डालते हैं। परन्तु सीधे-सीधे भी असर कर सकते हैं।
यह सब सिस्टम हमारे आंतरिक अंगों और उनके कार्यों को संचालित करते हैं। उनके कार्यों को सन्तुलित रखते हैं। निगेटिव विचार उनके कार्यों को असन्तुलित करते हैं। यही कारण है कि स्वस्थ शरीर होते हुये भी हमें तमाम बीमारियां जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, मानसिक रोग इत्यादि होते रहते हैं। अत: विचारों का महत्व अधिक है पौजिटिव विचार ही पैदा करें निगेटिव विचारों को रोकें आपको शान्ति और आनन्द मिलेगा।
आजकल खाद्य पदार्थों में मिलावट के प्रत्येक दिन समाचार आ रहे हैं। फलो में,शहद में, लगभग सभी खाने-पीने की चीजों में मिलावट हो रही है या उनको जल्द पका कर बेचने के लिये रसायनिक पदार्थ मिलाये जा रहे हैं क्योंकि हमारे नियम और सजा के प्राविधान बहुत कम हैं।
हमारे पास फल, सब्जी, मांस के तो कोई मानक भी नहीं हैं। अन्य खाद्य सामग्री में हम केवल बुकिंग मीडियम की जांच करते हैं। कोर्ट में भी यह साबित करना पड़ता है कि वह व्यक्ति के लिये हानिकारक है या नहीं। 1

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

स्वयं को जाने बिना कुछ भी जान पाना संभव नहीं है

स्वयं को जाने बिना कुछ भी जान पाना संभव नहीं है

वह व्यक्ति जो वस्तुओं से पूरी तरह जुड़ा हुआ है उन्हें प्राप्त करने के लिये कभी न समाप्त होने वाले संघर्ष में लगा रहता है। इसी प्रकार वह व्यक्ति जो सामाजिक एवं एक वर्ग या ग्रुप से जुड़ा रहता है। कहता है जो सबके साथ होगा वह उसके साथ भी होगा। यह सोच उसे घोर अन्धकार में ले जाती है। वह व्यक्ति जो सुरक्षा और शरण चाहता है वह स्वयं को बचाने के लिये दूसरों पर निर्भर है। वह अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कभी नहीं करता। समझ लो तुह्मारी सुरक्षा तुह्मारे ही हाथ में है। सुरक्षा को असुरक्षा और असुरक्षा को सुरक्षा समझने की गलती न करो। यदि तुम स्वयं को अच्छे तरह से नहीं जानते हो तो तुम कही भी सुरक्षित नहीं हो। स्वास्थ्य, परिवार वस्तुएं स्वयं के तत्व से भिन्न हैं वे सुरक्षा नहीं दे सकती हैं। परम सुरक्षा तुह्मारे स्वयं के ज्ञान, दृष्टि, व्यवहार एवं आचरण में है। इस नियम को भुलाने से तुम को दुख होगा। चोट  लगेगी। दूसरे का व्यवहार इसका कारण नहीं है।
 अमरीका का एक व्यक्ति जो बहुत अमीर था उसने अचानक अपना सब कुछ बेंच दिया अपनी गाड़ी तक और साधु बन जाता है। इसने स्वयं के उत्थान  के लिये एक नयी प्रणाली बनायी कुछ सूचक बना कर।
१. गुलाब का दिल अर्थात केन्द्र- अपने मन को विकसित करो क्योंकि तुह्मारे विचार तुह्मारी जिन्दगी के गुण या अवगुण निर्धारित करते हैं।
२. बाग का लाइट हाउस- मकसद/ध्येय के लिये जिन्दा रहना ही जिन्दा रहने का ध्येय है इसको जाननना और करना ही जिन्दगी का पूरक है।
३. नकारात्मक विचारों को मिटा नहीं सकते हैं परन्तु उनके स्थान पर सकारात्मक विचार ला सकते हो।
पांच तरीके-
- क्या होगा तुह्मारे विचार से उसकी स्पष्ट दृष्टि।
- उत्साहित करने को दबाव बनाओ।
- लक्ष्य प्राप्ति के लिये समय की सीमा रक्खो।
- लक्ष्य को लिखो।
- २-१ दिन नियम के अनुसार नकारात्मक विचारों को स्थान से हटाओ।
४. सूमो पहलवान- 'काईजिनÓ का अभ्यास करो बाहर से दिखने वाली सफलता। विकास की शुरुआत अन्दर  होने वाले विकास। सफलता से होती है। १० कार्यकलापों का अभ्यास करो (अलग से बताये हैं।)
५. केबिल का तार- इच्छा शक्ति एवं अनुशासन तुमको अपना मालिक बनाता है तुम सबसे सरल रास्ता चुनने के बजाय वह करने की हिम्मत पैदा करते हो जो तुह्में करना चाहिये।
६. स्टोप बाच एवं आवर ग्लास-  समय के महत्व को जानो वह चलता रहता है उसका सदुपयोग करो प्राथमिकताएं निर्धारित करो।
- भरपूर आनन्द की जिन्दगी का रहस्य।
- वर्तमान को गले लगाओ अभी इसी पल में रहो।
- कुछ पाने के लिये खुशी का बलिदान न करो।
- प्रत्येक दिन इस प्रकार रहो जैसे वह अन्तिम दिन है। वही तुह्मारे वर्तमान को बचायेगा और प्रसन्नता देगा।
- बच्चों के बचपने की तरह रहो।
- कृतज्ञता का अभ्यास करो।
- अपना भाग्य स्वयं पैदा करो।
- जीवन का परमम लक्ष्य दूसरों की स्वार्थ रहित सेवा करना है। प्रत्येक दिन कुछ दो। दूसरों के जीवन को उठाओ, प्रत्येक दिन नम्रता का अभ्यास करो जो कोई भी मांगे दो, सम्बन्धों को उच्च स्तर एवं प्रगाढ़ बनाओ।1

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

प्रथम पुरुष

औपचारिकता नहीं सार्थक प्रयासों से मिलेगी रोगों से निजात

संक्रामक रोगों का उन्मूलन करने के आधे अधूरे एवं अंश कालीन उपायो के फलस्वरूप वे आजतक फैलती रहती है सैकड़ो की मृत्यु होती है हजारों बीमार पड़े रहते है उनको जड़ से उखाडऩे के उपाय है परन्तु हम लीपा पोती करके सन्तुष्ट हो जाते हैं।
१. मलेरिया - हम कहते रहे मच्छर रहेगें मलेरिया नहीं रहेगा परन्तु नहीं माना कि जब तक मच्छर रहेंगे मलेरिया भी रहेगा डेंगू भी रहेगा उतएव पानी नालियों में गड्ढों में इक_ा न हो इसके उपाय नहीं किया पानी निकासी को मलेरिया प्रोग्राम से नहीं जोड़ा उनको पैदा होने के लिए अवसर मिलेगा तो वे पैदा होगें और मलेरिया फैलायेगें डेंगू भी बिना अच्छे डे्रनेज सिस्टम के इनका उन्मूलन सम्भव नहीं है।
२. मस्तिष्क ज्वार- देश के तमाम ६ हिस्सो में यह होता है मुख्य कारण है बाढ़ का पानी इक_ा होना और उसमें उग रहे धान के खेतो में इसके वायरस का पनपना। इस रोग में मृत्यु का प्रमुख कारण सांस की नली का चोक हो जाना यदि बीमार को तुरन्त अस्पताल पहुंचा दे और उसकी नाक और मुंह को खुला रखने के लिए रेसजीरेटर लगा दे तो उसकी मृत्यु नहीं होगी यह उपकरण महंगा नहीं है परन्तु यह भी प्रात्येक स्वास्थ्य केन्द्र में उपलब्ध नहीं है। बाढ़ का पानी खेतों में न भरे इसकी कोई दीर्घ कालीन योजना नहीं है पिछले १०० वर्षों से भूल हो रही है
३. आयोडीन- आयोडीन की कमी से घेंघा होना यह भी बाढ़ से जुडा हुआ है क्यों कि फसलों से आयोडीन धुल जाता है केवल नमक में आयोडीन मिलाने से तो यह बीमारी मिटेगी नहीं बाढ़ पर नियंत्रण करना होगा जिनको इसकी कमी नही है उनको अधिक आयोडीन हानिकारक भी है।
४. कै, दस्त, पेंचिस (गैस्ट्रोइन्राईटिस) यह भी बाढ़ से एवं पानी भरने से जुड़ी है क्योंकि इनको फैलाने वाले कीटाणू पैदा होते है पनपते है जितनी भी बीमारियां पानी जनित है उनरकी रोक थाम के लिये अच्छी से अच्छी पानी निकालने की योजना आवयक है क्योंकि इस पानी में मल मूत्र भी मिल जाता है।
५. परिवार नियोजन-  २ से अधिक बच्चे होने दो फिर नसबन्दी करा दो। शादी हो जाने दो फिर परिवार नियोजन की शिक्षा देगें यह तो आग लगने दो फिर बुझायेगें बच्चो की स्कूलों में परिवार नियोजन के बारे में या अपने शरीर के अंगो के बारे में बताया जाये यह बहस वर्षों से चल रही है। कहने को तो हम  कहते है। लड़की पढ़ती है तो परिवार पढ़ता है इसी प्रकार यदि शादी से पहले लड़का लड़की परिवार नियोजन समझेगे तो उनके साथ-साथ उनके मां बाप भी समझेगें उनको अपना परिवार हम दो हमारे दो तक सीमित रखना पड़ेगा यदि वे उनका अच्छा पालन पोषण नहीं कर पायेंगे तो उनकी नजरो में गिर जायेंगे उनसे आंखे चुरायेगें। अतएव स्कूलों में यह शिक्षा आवश्यक है। सेक्स शिक्षा से लड़कियों को विशेष्ज्ञ कर लाभ होगा वे अपने ऊपर होने वाले बलात्कार (रेप) और शादी से पहले या बाद में होने वाले अनचाहे गर्भ को रोकने में सक्ष्म हो जायेगी।
चिकित्सा के लिये दूसरे देशों में जाना एक पर्यटन उद्योग भी विकसित हो रहा है। अमरीका में ४.६६ करोड़ नागरिको का चिकित्सा बीमा नहीं है। पिछले ५ वर्षो में बीमा की राशि ९' बढ़ गयी है। कैनडा और योरूप में शैल्य चिकित्सा के लिए लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है और दर्द सहना पड़ता है भारत दिन की बाईपास सर्जरी अमरीका में होने वाली का केवल ७.७' खर्च होता है इसी प्रकार कूल्हा बदलना २०'  है यात्रा (हवाई) खर्च ठहने का खर्च मिलाने के बाद भी बहुत सस्ता है। भारत अफरीका एवं दक्षिण ऐशिया के कई देशों में स्वास्थ्य कार्य करताओं की हुत कमी है भारत में १००० पर ६ अमरीका में २.५६ डाक्टर है चीन में १.५० भारत में टीबी, मलेरिया एड्स, कुष्टरोग एवं अन्य छूत छात वाली बीमारियों के बहुत रोगी है। शिशु मृत्यु दर अधिक एवं औसर उम्र कम है अतएव चिकित्सा क्षेत्र में काम कररे वालों की जरूरत के अनुपात में बहुत कमी है। भारत में निजी क्षेत्र में चिकित्सा पर ७.५' को आय से भी अधिक खर्च करना पड़ता है अमरीका में ४४.६' भारत में ७५' को आय से भी अधिक खर्च करना पड़ता है अमरीका में ४४.६' को अवएव निजी क्षेत्र में विदेशों से इलाज कराने वालों की संख्या बढ़ेगी फलस्वरूप चिकित्सा और महंगी होगी जिसका बोझ देश के नागरिक उठा नहीं पायेगे। अतएव सरकार को चिकित्सा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं एवं मूलभूत सुविधाओं की कमी पूरी करने के सभी उपाय करने होगे अन्यथा  हमारे देश के नागरिक चिकित्सा के अभाव में बीमार रहेगें और मरते रहेंगे। विदेशियों को भी सुविधा देनी है सरकार ऐसी चिकित्सा पर टैक्स लगा सकती है या इसे लाभ न कमाने का स्तर दे सकती है।1

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

प्रथम पुरुष

विचारों और समय का तालमेल है सफलता का मूलमन्त्र
आपके मन में प्रतिदिन ६०,००० विचार आते हैं. परन्तु आप केवल ५ प्रतिशत याद रखते हैं. क्योंकि शेष ९५ प्रतिशत विचार प्रतिदिन एक से होते हैं. अतएव उन्हें भूल जाते हैं. दर्द आने वाले आनन्द का आभास देता है. दर्द एक प्रकार का अदभुत शिक्षक है. एक बच्चा दिन में ३०० बार हंसता है युवा पुरुष केवल १५ बार, क्योंकि उसको छोटी-छोटी बातें आनन्द नहीं देती. गलतियां हमें शिक्षा देती हैं यदि हम उनका ढंग पूर्वक सच्चे मन से विश्लेषण करें.
बाहर दिखने वाली सफलता की शुरुआत अन्दर होने वाली सफलता के साथ जुड़ी है. डर चेतना का नकारात्मक स्वभाव या विचार है. अतएव वे कार्य अवश्य करो जो तुमको डराते हैं या जिन्हें करने में तुह्में डर लगता है. फलस्वरूप डर चला जायेगा.
क्रियाकलाप धार्मिक व अन्य लाभदायक हैं. आपकी इच्छा शक्ति को अधिक मजबूत बनाने में एवं शान्ति देने में यह १० प्रकार के हैं:-
१. एकान्त में मौन बैठना.
२. शारीरिक योग करना.
३. अच्छा भोजन खाना.
४. अपार ज्ञान ग्रहण करना.
५. प्रकाशवान जीवन व्यतीत करना. प्रतिदिन किये गये कार्यों को लिखना नकारात्मक या गुणात्मक ऋणात्मक.
६. स्वयं का विश्लेषण करना गलतियां करना, अनुभव का सूचक है. अच्छा निर्णय लेना अनुभव से, अनुभव गलत निर्णय से आनन्द अच्छे निर्णय से.
७. प्रात: उठना सूर्य की किरणें शक्ति देती हैं. उत्साहित करती हैं. निद्रा का गुण मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण है. हंसना आनन्द का रस है.
८. संगीत मन उत्साहित करते हैं, प्रेरणा देते हैं, अनुशासन में रखते हैं. स्वयं से बात करना ऋणात्मक हैं.
९. सर्वांगसम/परस्पर अनुकूल आचरण- मेहनत, दूसरे का ख्याल, नम्रता, धैर्य, इमानदारी एवं हिम्मत.
१०. सदाचार- प्राथमिकताओं पर ध्यान देना पतली बातों या विषय पर नहीं.
बालू घड़ी (हावर ग्रास) हमको समय का उचित उपयोग करना सिखाता है बताता है. समय सबसे मूल्यवान वस्तु है जो कहता है प्राथमिकताओं पर ध्यान रखो जीवन को सरल बनाओ.
हमारे द्वारा किये गये तमाम कार्यों में से केवल २० प्रतिशत कार्य दीर्घकालीन फल देते हैं. ८० प्रतिशत से कुछ खास नहीं होता इसे २० का नियम कहते हैं.
जीवन में 'ना कहने की हिम्मत पैदा करो. हमेशा हां कहना कायरता है. बेईमानी है एक आसान रास्ता है  सबका अच्छा बना रहने का. मृत्यु के समय तुह्मारे क्या विचार होंगे क्या करना चाहोगे ऐसा ही हमेशा करने की आदत डालो. समय बरबाद करने वालों से बचो वे तुह्मारा समय चुरा रहे हैं. पहले की गयी गलतियों से सीखो. सेवा करना ही जीवन का चरम या अन्तिम उद्देश्य है.
तनाव दूर करने के उपाय:-
  • स्न किताबें या अन्य सामग्री पढऩे से ६८ प्रतिशत.
  •  सामाजिक कार्यों से ६२ प्रतिशत.
  •  संगीत सुनने से ६१ प्रतिशत.
  •  चाय या कॉफी पीने से ५४ प्रतिशत.
  •  टहलने के लिये जाने से ४२ प्रतिशत.
  •  हंसी चाहने से ३९ प्रतिशत.
  •  चिल्लाने से २५ प्रतिशत.
  •  विडियोगेम खेलने से.
  •  कोई भी खेल खेलने से.
  •  च्यिंगम चबाने से १७ प्रतिशत.
  • अपनी आवश्यकताओं की प्राथमिकता निश्चित करो.
  •  स्वयं व सभी से सम्भावित आशायें करो.
  •  सम्पूर्ण होने की कोशिश न करो, सर्वशक्तिमान नहीं हो.
  •  अपनी सीमाएं बनाओ और उनका पालन करो.
  •  अपनी भावनाओं को दूसरों से प्रगट करो, अन्दर बन्द न रखो.
  •  दूसरों को समझो, क्षमा करो, अपने को दोषी न समझो.
  •  उन व्यक्तियों से दूर रहो जो तुह्में तनाव देते हैं.
  •  जिन बातों या चीजों को बदल नहीं सकते स्वीकार करो.
  •  अपना पक्ष या व्यवहार बदलो दूसरे का नहीं.
  • सन्तुलित जीवन शैली अपनाओ काम के लिये.
दूसरे सम्बन्धों के लिये, हंसी खुशी के लिये, तनाव रहित होने के लिये अच्छा पौष्टिक भोजन और थोड़ा सा समय आध्यात्मिक चिन्तन के लिये.1

शनिवार, 29 जनवरी 2011

प्रथम पुरुष

बाकी है मैला ढोने की प्रथा का अन्त
सिर पर मलवा ढोने की प्रथा. नवम्बर २०१० को पूर्णत: समाप्त हो गयी सरकार की योजना के अनुसार परन्तु यह अधूरा सत्य है. आज भी रेलवे प्रशासन एवं उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकारा कि प्रथा पूर्णत: बन्द नहीं है. अन्य राज्य भी  झूठ बोल रहे हैं क्योंकि सफाई कर्मचारी आन्दोलन ने तमाम सबूत तस्वीरों सहित पेश किये हैं. उनके अनुसार आज भी देश में तीन लाख सफाई कर्मचारी यह काम कर रहे हैं. इसके लिये वह स्वयं एवं सरकार दोषी है.
अभी तक इस प्रथा को समाप्त करने को दो उपाय करे गये एक तो सूखे शौचालयों को फ्लश टाइप में बदलना और इस काम में लगे सफाई कर्मचारियों कि अन्य कार्य में लगाना. पहला उपाय  तो हो गया परन्तु उनको अन्य कार्य दिलाना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि सफाई कार्य (मैला ढोना) से जुड़े गन्दे काम का दाग मिटाना बहुत कठिन है. इसके लिये सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति करने की प्रणाली और नीतियों को बदलना होगा. अन्यथा यह प्रथा पूर्णत: समाप्त नहीं होगी. यद्यपि सूखे शौचालयों की संख्या कम हो गयी है परन्तु अभी भी उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और बिहार में २.४ लाख सूखे शौचालय हैं अतएव आवश्यक है हाथ के द्वारा सफाई करने की परिभाषा में अन्य गन्दे तरीकों से शौचालय आदि को साफ करना भी जोड़ा जाये. शहरों, कस्बों एवं गरीबों के क्षेत्रों में मलमूत्र बहा देते हैं बहाया जा रहा है यह न तो सेप्टिक टैंक से जुड़े हैं और न ही  जमीन के अन्दर गहरे गड्ढों से खुले नाले में बहाने से स्लेज और मलमूत्र नालों में ठहर जाता है जिसे सफाई कर्मचारी द्वारा हटाना पड़ता है फावड़े या हाथों से. एक ही जाति या सम्प्रदाय द्वारा यह काम करा जायेगा. इसके लिये इस कार्य को गन्दा और निम्नतम कार्य समझना भी छोडऩा होगा सभी जाति के व्यक्तियों को इस कार्य को करने के लिये आगे आना होगा. कुछ लोग अपने शौचालय साफ करने लगे हैं. किसी भी व्यक्ति से अन्य व्यक्तियों के मलमूत्र को अपने सर पर ढुलवाना सबसे बड़ा अपराध है उस व्यक्ति के मानवीय अधिकार छीनने का. वह जीवन भर बीमारियां झेलता है और महसूस करता है इन्सान नहीं है जानवर से भी गया बीता है. सफाई कर्मचारियों को भी अपनी सोच बदलना होगा. वह इसे अपना काम न समझे इस पर अपना हक न जतायें. वे पढ़े-लिखे और अन्य कार्यों में आयें. हम भी उनसे कोई कार्य कराने में न हिचके.
बाल्मीकि दलित नाम की जाति इसमें डोम, हेला, आदी अरुण दतिमार, माडिगा, रेली, पाखीज, चेकीलियार इत्यादि आते हैं का अस्तित्व समाप्त हो जाना चाहिये. वर्ण व्यवस्था की अब कोई जरूरत नहीं. अवसर सभी को कार्य क्षमता के अनुसार परन्तु सभी व्यक्ति बराबरी के माने.1

शनिवार, 22 जनवरी 2011

प्रथम पुरुष

समाज में जरूरी है अच्छे व्यवहार का पैमाना 


आप किसी भी समाज में रहें आपको हमेशा यह ध्यान रखना होगा   कि समाज मेंं सभी का स्थान बदल सकता है आपका स्थान दूसरा ले सकता है. समाज में किसी की स्थिति को अधिक धन या कम धन से नहीं नापा जायेगा. पश्चिम के देश या यूरोप के देश इतने आगे इस लिए बढ़ गये क्योंकि उन्होंने अच्छे व्यवहार के पैमाने बनाये और उनका पालन किया.
 उन्होने सबको बराबर का समझा माना और उसी प्रकार का व्यवहार किया जो अपने साथ करवाना चाहेंगे. १८७३ में विक्टोरियान ऐसीकेट (आचरण)पर किताब लिखी गयी. उसका अपूर्व स्वागत हुआ सभी ने पढ़ा उसमें लिखे गये आचरण के तरीकों को अपनाया उसमे सबसे मुख्य बात थी कि आप उनसे कैसे व्यवहार करें जिनके पास आप से कम धन है या निर्धन है प्रो. हिल (लेखक) ने कहा बात करते वक्त कभी भी यह संकेत न  हो कि तुम्हारे पास धन है (पर्याप्त) कम धन वाले के पास साधारण कपड़े (महंगे नहीं) या ऐसा सामान लेकर न जाओ जिससे धनी होने का बोध हो यदि मंहगी कार से जाओ तो उसके घर से दूर खड़ी करो. बातें करते समय ध्यान रखो कि तुम अपना सम्बन्ध महत्वपूर्ण या अमीर व्यक्तियों से न जोड़ो तुम इसका भी विवरण न करो कि तुम विदेश गये हो या पूरा देश  घूम रखा है क्योंकि इससे तुम वास्तव में महत्वपूर्ण नहीं हो जाते. अपने देश या अपने देश की संस्कृति का बढ़ चढ़ कर बखान न करो. स्वयं की तारीफ करने को तो रवीन्द्र नाथ टैगोर ने भी बुरा कहा था इसीलिए वेे राष्ट्रीयता के विरूद्घ थे. अच्छा व्यवहार ही इन देशों में रहने वालों की प्रथम आदत बन गयी और वे आगे बढ़ते गये क्योंकि बराबरी की समझ हमें कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढऩे को प्रेरित करता है.अच्छे व्यवहार ने व्यक्ति को देश के केन्द्र मे रखा अतएव वे वास्तव में कल्याण कारी आधुनिक और समृद्घि  शाली बन गये उन्होने प्रत्येक व्यक्ति की शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता ही क्योंकि वह केन्द्र में था और अब भी है इन देशों में डींग हाकने वाले,अपने धन या दौलत या अपनी शक्ति का बखान करने वाले नहीं मिलेंगे. उनके यहां झिड़कना, डांटना बुरी आदत है. इन देशों में जितने भी महत्वपूर्ण व्यक्ति हुए उनका परिवार साधारण था परन्तु शिक्षा और स्वास्थ्य के कारण जो उन्हें देश की सरकार ने प्राप्त  कराया वे उन्हें शिखर पर पहुंचाया. इन देशों में भ्रष्टाचार नगण्य है शून्य है क्योंकि मध्य वर्ग जो बहुत बड़ा है अच्छा व्यवहार करता है उसकी आदत है. इन देशों के प्रत्येक राजनीतज्ञ मध्यम वर्ग के  पास पहुचते हैं पहुचना चाहते हैं (मजदूर और पूंजीपति के पास नहीं) क्योंकि अच्छा आचरण कल्याणकारी योजनाओं को शक्ति देता है और अन्तत: सभी को मध्यवर्ग ये लाता है जिनकी जीवन शैली लगभग एक सी होती है.
 अमरीका में ३०० मिलियन कारें  हैं  जिनमें ४.७ मि. गरीबी रेखा के नीचे है इनमें २,९००० ऐसे है जिनके पास तीन या अधिक भी है. अमरीका में गरीबी रेखा के मांप दंड के वल भोजन की कैलोरीज पर नहीं आधारित है उसमें घर मकान कपड़ा भी आता है.
सार्वजनिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य मध्यम वर्ग के आच्छे आचरण की देन है और उसके फल स्वरूप देश कल्याणकारी योजनायें को प्राथमिकता देता है. हमारे देश में भौतिक बादता को बढ़ावा दिया जा रहा है अच्छा व्यवहार  पीछे ढकेला जा रहा है फल स्वरूप देश में कल्याणकारी योजनाओं नग्न है या असफल हैं भृष्टाचार चरम सीमा पर है जब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा नहीं मिलेगी कुछ नहीं होगा इसके लिए व्यक्ति को केन्द्र में लाना होगा व्यक्ति को केन्द्र में लाने के लिए अच्छा व्यवहार परम आवश्यक है. कल्याणकारी देश बनना इस सत्य पर आधारित है. 1

शनिवार, 15 जनवरी 2011

प्रथम पुरुष

भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं की अपारर्शिता 

 भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई ए. एस) की परीक्षा की पारदर्शिता एवं निष्पक्षता पर उठते सवाल. आर.टी.आई में पूछे गये प्रश्नों के उत्तर विरोध बास एवं छिपाने का संकेत करते हैं.
१. झूठे रोल नम्बरों की संख्या निरंतर बढ़ रही है वर्ष २००३ में ९२ थी २०१० में ४२४५ पहुंच गयी ४ लाख परीक्षार्थियों में अर्थात १.०६'
२. यू.पी.एस.सी कहती है कि कापियों की पुन: अवलोकन मूलांकन या जांच नहीं हो सकती है क्योंकि उन्हे नष्ट कर दिया जाता है. एक बार यह भी कहा कि पुन: मूल्यांकन किया गया परन्तु कोई गलती नहीं पायी गयी. कट आफ मार्क अर्थात निम्र अंको को प्राप्त करने की निर्धारित प्रक्रिया नहीं बतायी जाती, उनकी संख्या भी नहीं बताते , सही उत्तरों को सूची नहीं देते. अतएव मनमाने ढंग से उत्तीर्ण अभ्यार्थियों की सूची बनायी जाती है.
३.एक परीक्षाथी को २००८ को उत्तर दिया गया कि उसकी कापियों को दो बार पुन: मूल्यांकन किया गया कोई गलती नहीं पायी गई. उसी वर्ष दूसरे को उत्तर दिया गया कि सभी कापियां नष्ट कर दी गई है अत: पुन: मूल्यांकन सम्भव नहीं है अतएव ८० दिन बाद पुन: मूल्यांकन कैसे हुआ. एक परीक्षार्थी की कापी ही उपलब्ध नहीं हो सकी खो गयी. परीक्षार्थी द्वारा हस्ताक्षरित रजिस्टर की कापी मांगने पर उत्तर मिला कि उसे ६ माह में नष्ट कर देते हैं दूसरे से कहा गया २ वर्ष में नष्ट कर देते है.
४. रोल नं कम्पयूटर द्वारा बनाये जाते हैं अतएव २००४ से ६०००० रोल न. में से १२६४ साक्षात्कार के लिये चुने गये परन्तु केवल ११५४ पहुंचे.
५.यू.पी.एस.सी.परीक्षार्थियों द्वारा प्राप्त किये अंको को गुप्त रखती है इन अंको को देने की जानकारी गुप्त रखती है इन अंको को देने की प्रणाली बताने को भी गुप्त रखती है तमाम अस्थिर या परिर्वतन शील कारण बताती है.
६. ५०००० विद्यार्थियों की संख्या टी.एस.ए के जबाब मांग रही है. राष्ट्रपति ने भी प्रक्रिया में सुधार लाने को कहा. यू.पी.एस.सी नया पाठयक्रम ला रहा है क्या होगा तभी उसकी निष्पक्षता और पारदर्षिता पर विश्वास होगा.
मध्यम वर्ग के आधार शिला की कहानी-
मध्यम हमेशा सबसे महत्वपूर्ण रहा है गौतम बुद्घ ने भी मध्यम (बीच) पथ अपनाने को कहा राम भी मध्य में खड़े है अगल-बगल में सीता और लक्ष्मण मंच पर भी सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति मध्य में होता है,
स्वर्णपदक विजेता मध्य में खड़ा होता है अगल-बगल रजत और कांस्य विजेता जीतने वाले देश का झंडा भी बीच में सबसे ऊंचाहोता है पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी भी मध्य में होती है पेड़ों में भी सबसे ऊंची डाली मध्य में होती है. हाथ में बीच की अंगुली सबसे लम्बी होती है. चारो ओर मध्य का बोल-बाला है चक्र का केन्द्र भी मध्य में होता है.
मध्य वर्ग की उत्पत्ति अच्छे व्यवहार से हुई इसके पहले उच्च वर्ग राजा निम्र वर्ग या साधारण वर्ग को हमेशा तिरस्कार या जूते की ठोकर पर रखता था. मध्यम वर्ग इस तसवीर को बदल दिया आपकी माल हालत कुछ भी हो आप मध्यम वर्ग की श्रेणी में आने लगे. मुख्य पैमाना था आप दूसरों से कैसे व्यवहार करते है.1