मंगलवार, 25 अगस्त 2009






दुबई बोली जय हिन्द



हिन्दुस्तान के मुसलमानों, हिन्दुओं, सिक्खों, ईसाइयों मुझे बताओ दुबई में कौन रहता है. यहां भारत का तिरंगा किनके हाथों में है. यहां पाकिस्तान को आतताई मुल्क कहकर कौन धिक्कारता है. तोगडिय़ा, ठाकरे और वरुण तो यहां हैं नहीं. न ही शहाबुद्दीन, आजम खां या दारुल उलूम का फतवा जारी करने वाले मौलाना लोग हैं. अरब की धरती पर तो साजिया जावेद और फरहान जैसे लोग हैं. जो लखनऊ, बाराबंकी कानपुर जैसे शहर में से चंद रोज पहले पढ़ लिखकर दुबई गये हैं. नाम कमाने, शान कमाने, इनके आगे वे कठमुल्ले भी बौने हैं जो कहते हैं बंदे मातरम् गाना इसलाम के खिलाफ है. और ऐसे हिन्दुवादी नेता भी जो मुसलमानों की देशभक्ति पर सन्देह करते हैं. मैं तो दुबई में भारत की ६२वीं वर्षगांठ पर आयोजित कवि सम्मेलन में यह कहते हुए धन्य हो गया-हम तो पिंजरों को परों पर रात दिन ढोते नहींआदमी हैं हम किसी के पालतू तोते नहींदिल के बंटवारे से बन जाती है घर में सरहदेंसरहदों से दिल के बंटवारे कभी होते नहीं।मैं दुबई के बेहद खूबसूरत शेख राशिद ऑडोटोरियम के डायस पर बैठा हूं. मेरे सामने संयुक्त अरब अमीरात में भारत के राजदूत माननीय जनाब तलमी$जअहमद हैं उनके बगल में भारत के राष्ट्रपति के उपसचिव $जनाब फैज अहमद किदवई बिराजे हुए हैं. साथ ही पूरा प्रेक्षागार खचाखच भरा हुआ है. यहां कुछ ही पलों बाद शुरू होना है मुशायरा व कवि सम्मेलन. मेरे ठीक पीछे खूबसूरत मंच पर एक बैनर (बैकड्रॉप) चमचमा रहा है, जिस पर अंग्रेजी में लिखे का मैं हिन्दी अनुवाद कर रहा हूं-हमारी एसोसिएशन / भारत के ६२वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित / मुशायरा एवं कवि सम्मेलन में/ आपका हार्दिक स्वागत करती है. मैं सोच रहा हूं दुबई में भारत की आजादी का जश्न मनाने वाले हमारी एसोसिएशन के ये लोग कौन हैं..? मैं इनसे पहली बार मिल रहा हूं. ये हैं सा$िजया किदवई (प्रेसीडेंट), मोहम्मद तारीक सिद्दकी (वाइस प्रेसीडेंट), सैयद फरहान वास्ती (जनरल सेके्रट्री), इकबाल आफताब (संयुक्त सचिव), सफी नोमानी (ट्रेजरार), वसीम खान (कल्चरल सेके्रट्री), सैयद नदीम जैदी (वेलफेयर सेके्रट्री), उरफी किदवई (एडवाइजर) और सुब्रमणियम राजू (एडवाइजर) ये सारे के सारे हिन्दुस्तान के अलग-अलग शहरों से हैं. पक्के हिन्दुस्तानी. पक्के दुबई वाले. सामने बैठे श्रोतागण भी ज्यादातर हिन्दुस्तान के तमाम शहरों से हैं. इनमें पकिस्तान, बांग्लादेश, ओमान, जद्दा के भी लोग हैं. मैं अंदाजा लगाता हूं तो कुल मजमें में ९५ फीसदी लोग हिन्दुस्तानी हैं और तकरीबन सारे के सारे मुसलमान हैं. ये भारत के मुसलमान हैं जो दुबई में भारत की आजादी का जश्न मना रहे हैं. हमारी एसोसिएशन के लोग मेरे सहित डायस पर बैठे कवि और शायरों के सीने पर तिरंगा (बैच) टांक रहे हैं. निदा फा$जली, हसन कमाल, वसीम बरेलवी, मुन्नवर राना, मेराज फैजाबादी, कुंअर बेचैन, सरिता शर्मा, मंसूर उस्मानी, नईम अख्तर, नुसरत मेहंदी, असर इकबाल, उस्मान मीनाई, प्रज्ञा विकास सभी की छाती पर तिरंगा फहरा रहा है.डायस पर भारत के राजपूत माननीय तलमीज अहमद भारत की शान में मुसलमानों को मर मिटने का संदेश दे रहे हैं. शेरो-शायरी के मकसद 'मोहब्बतÓ को सारे मजहबों से ऊंचा दर्जा दे रहे हैं. और पूरा 'हॉलÓ तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज रहा है. मैं इस गडग़ड़ाहट को सुन रहा हूं-भारत माता की जय, बंदे मातरम, जय हिन्द.मुशायरा, कवि सम्मेलन समाप्त हो चुका है. मुझे कामयाबी की बधाइयां मिल रही हैं. जनाब अफजल सिद्दकी पाकिस्तान के अदबनवाज हैं. मुझे पाकिस्तान आने की दावत दे रहे हैं. फरहान मुझे अपने चचेरे भाई से मिलवाते हैं. वह ओमान बुलावे पर जरूर से जरूर आने का वायदा ले रहे हैं. मैं बहुत खुश हूं ही, मुझसे ज्यादा वसीम भाई खुश हैं. क्योंकि मैं दुबई में उनकी दम पर यानी 'रिस्कÓ पर आया हूं. मुन्नवर राना अब भाई के बजाय मेरे बाबा हो चुके हैं. वो भी बेहद खुश हैं क्योंकि दुआ जो असर लाई है मेरी कामयाबी की शक्ल में शारजाह में हवाई जहाज से उतरने ही मुन्नवर राना फरमाते हैं-प्रमोद भाई बाबा की दुआ है, इस बार दुबई आप फतह करेंगे. मुझे लगता है मेरा सोचा और बाबा का कहा हो चुका है. रात बीत रही है, मुशायरे और कवि सम्मेलन की कामयाबी का 'नशाÓ छाया हुआ है सभी पर..कोई नहीं सोया है. सुबह के पांच बजने को हैं. मेरे साथ हम कमरा बड़े भैया कुंअर बेचैन जी हैं. बेचैन जी वास्तव में बेचैन हैं, उनकी तबीयत खराब है. बुखार भी है और गले में खरास भी. बड़ी मुश्किल से वह सो पाये हैं. मैं चुपचाप कमरे से बाहर आ गया हूं. धीरे-धीरे कदम बढ़ाता कमरा नंबर २१५ के सामने जा खड़ा हुआ हूं. भीतर जगहार (लोग जाग रहे हैं) है. मैं दरवाजा नॉक करके कमरे में दाखिल हो चुका हूं. सामने बिस्तर पर वसीम भाई लेटे हुए हैं. बगल के बेड पर जदीद रंग का एक जिंदादिल बुजुर्ग मेरा$ज फैजाबादी भी जलवागीर है. मुशायरे की कामयाबी बगैर सोये अलसाये चेहरे पर पूरी ताजगी से दमक रही है. सामने होटल का इंचार्ज वसीम भाई से सवाल-जवाब कर रहा है. ये जनाब कोई खां साहब हैं. पाकिस्तान के रहने वाले हैं. वह जो अपना गांव बता रहे हैं वसीम भाई उस गांव के कई बुजुर्गोंके नाम गिना रहे है. बेहद आत्मीय बातचीत चल रही है. खां साहब पाकिस्तान की दशा पर रो रहे हैं. कह रहे हैं हिन्दुस्तान तो बहुत तेजी से तरक्की पर है. वसीम भाई हिन्दुस्तान की जम्हूरियत और आजादी की मिसाले दे रहे हैं. पाकिस्तान की हरकतों को दुनिया भर के मुसलमानों की दशा और दिशा को बरबाद करने का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. खां साहब के हाथ में पानी की एक बोतल है. यह बोतल वह खुद वसीम भाई को सर्व करने के लिए हाजिर हुए हैं. क्योंकि इसी बहाने वह हिन्दुस्तान के साथ पाकिस्तान में भी शोहरत की बुलंदियों पर टहलने वाले वसीम बरेलवी से गुफ्तगू फरमा सकते हैं. बात बढ़ गई है. खां साहब का गोरा चेहरा तमतमा रहा है. वसीम भाई जोश में हैं, पाकिस्तान खुद तो बरबाद हो ही गया है साथ में पूरी दुनिया को बरबाद कर देगा. जब तक बेवकूफ 'मुल्लोंÓ को अंधे कुंए के हवाले नहीं किया जाता पाकिस्तान के हालात नहीं सुधरेंगे. क्या हो रहा है मदरासों में! नॉन प्रोडेक्टिव एजुकेशन देकर मुसलमानों की कौन सी नस्ल तैयार की जा रही है..? किस काम के हैं मदरासों से निकले बच्चे..! सिर्फ उनके दिल ओ दिमाग में एक ही चीज घुसेड़ रहे हैं, ये काफिर है, वो काफिर है..सब काफिर हैं. केवल मुल्ला जी ही टोटल इसलाम हैं. मैं बरेलवी साहब की आंखों में अंगारे की चमक देख रहा हूं. खां साहब जो पहले हां में हां मिला रहे थे, अब खामोश हैं. उन्हें पाकिस्तान पर खींच-खींच पडऩे वाले बरेलवी जुमले जूतों की तरह लग रहे हैं. वह मौके की ताड़ में हैं. उन्हें मौका मिला. कमरे में बाबा (मुन्नवर राना) दाखिल हो रहे हैं. खां साहब सरक लिए. बिना कुछ कहे बिना. वसीम बरेलवी खां साहब से कह रहे हैं-अमां साहब पानी की बोतल तो दे जाओ. लेकिन खां साहब बिना मुड़े सीधे लिफ्ट में दाखिल. मैं सुन रहा हूं खां साहब की जेहनियत..इतनी गाली सुनने के बाद तो मैं पानी नहीं दूंगा. वैसे भी 'हुसैनोÓ को पानी भला कौन देता है. पानी की बोतल वसीम साहब को दिये बिना कमरे में मौजूद हम लोग हंस रहे हैं. कह रहे हैं और दो पाकिस्तान को गाली. वसीम भाई को प्यास लगी है. वह फिर से पानी की मांग कर रहे हैं.मैं दुबई से लौटकर हिन्दुस्तान की धरती पर आया हंू. अमौसी हवाई अड्डे से बाहर निकलकर अखबार खरीद रहा हूं. अखबार में खबर है दारुल उलूम के फतबे की..फतवा कह रहा है 'बंदे मातरम् Ó इसलाम विरोधी है. अब मैं मुखातिब हो रहा हूं फतवा बाज शरारती मुल्लाओं और खुराफाती हिन्दुत्व झाडऩे वाले तोगडिय़ों से आज पन्द्रह अगस्त है. आज मुझे आप हिन्दुस्तान समझ लें. मैं पूछ रहा हूं बंदे मातरम् को इस्लाम विरोधी बताने वाले मुल्लाओं से कि मेजर सलमान क्या मुसलमान नहीं है. उसने मादरेवतन के लिए जान कुर्बान कर दी अभी चंद साल पहले. क्या मां की शान में जान गंवाना 'बंदे मातरमÓ गाने वाले 'काफिरोंÓ से ज्यादा बड़ी 'काफिरीÓ नहीं हुई. फिर तो उसे इस्लाम की परिभाषा के अनुसार दो$जख में जाना चाहिए. लेकिन सलमान को जन्नत कैसे नसीब हो गई? सलमान तो जन्नतनशीं है या उस पर भी फतवाबाजों को कोई शक है. दुबई में जहां भारत माता की शान में हिन्दी, उर्दू कवियों ने मिलकर गीत गाये और उनके गीतों पर रात भर दुबई के मुसलमानों ने अपनी वाह-वाही के जयकारे लगाये, क्या येे सब इसलाम विरोधी हैं और अगर ये सारे के सारे इसलाम विरोधी हैं तो क्या केवल चार कठमुल्लों के चंद फतवों की कैद में है इसलाम. इसलाम की कैफियत अगर इतनी दकियानूसी होती तो वह पूरी दुनिया में न फैला होता.ठीक ऐसे ही मैं पूछ रहा हूं मोदियों, वरुणों, तोगडिय़ों और सिंघनों से कि दुबई में हिन्दुस्तान का तिरंगा किनके हाथों में है. वहां तो पाकिस्तान की भारत विरोधी हरकतों का मुंह तोड़ जवाब देते भाई फरहान वास्ती जैसे युवा मुसलमान और साजिया जैसी बेलौस लड़कियां मिलीं. न तो यह काम विनय कटियारों जैसे को करते देखा मैंने और न ही ठाकरों और शहाबुद्दीनों के कोई निशान मिले मुझे वहां..! मैंने सीधे-सीधे पूछा तो भारत से दूर बहुत दूर जन्नत सरीखी सुख सुविधाएं भोगते मुसलमानों ने मुझसे कहा-'जाकर कह दीजो 'फिरकापरस्तोंÓ से हम दुबई में पहले हिन्दुस्तानी हैं, बाद में मुसलमान. मैं समझता हूं १५ अगस्त जिंदाबाद के लिए इससे बेहतर कुछ भी नहीं.1

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